सीमान्त धारणा का महत्व , सीमान्त विश्लेषण की आलोचनायें - Importance of Marginal Assumption, Criticisms of Marginal Analysis
सीमान्त धारणा का महत्व , सीमान्त विश्लेषण की आलोचनायें - Importance of Marginal Assumption, Criticisms of Marginal Analysis
1. उपभोग के क्षेत्र में
2. उत्पादन के क्षेत्र में
3. विनिमय के क्षेत्र में
4. वितरण के क्षेत्र में, तथा
5. राजस्व के क्षेत्र में।
सीमान्त विश्लेषण की आलोचनायें
1. सीमान्त विश्लेषण की विभिन्न मान्यतायें अव्यावहारिक हैं जैसे -
(a) यह विश्लेषण यह मानता है कि मूल्यों के सूक्ष्म परिवर्तन के उत्तर में माँग व पूर्ति निरंतर परिवर्तित होती हैं। परन्तु व्यवहार में यह बात लागू नहीं होती है।
(b) वस्तु की सभी इकाइयों को समान रूप मानना ठीक नहीं है। व्यवहार में वस्तु की विभिन्न इकाइयों समान नहीं होती है।
(c) इसी प्रकार व्यक्ति सदैव विवेकपूर्ण तरीके से कार्य नहीं करता है। फैशन, रीति-रिवाज व भावनायें असे विवेक का मार्ग छोड़ने के लिए विवश कर देती हैं।
(d) आय को स्थिर मान लेना व आवश्यकतायें अपरिवर्तित समझना ठीक नहीं है।
2. सीमान्त विश्लेषण का प्रयोग व्यष्टि अर्थशास्त्र में ही सम्भव होती है। अतः इसका क्षेत्र सीमित हो गया है।
3. टिकाऊ वस्तुओं में उपयोगी नहीं जिनका प्रयोग निरंतर नही होता है वहाँ सीमान्त विश्लेषण उपयोगी नहीं हो पाता है। उदाहरण के लिए, पंखा, रेडियो इत्यादि टिकाऊ वस्तुये तो एक पूर्ण इकाई के रूपय में ही खरीदी जा सकती है। अतः उनके मूल्यों में परिवर्तन होने पर इनको टुकड़ों में नहीं खरीदा जा सकता।
4. मापना कठिन सीमान्त उपयोगिता, उत्पादकता व सन्तुष्टिया त्याग का ठीक-ठीक माप करना सम्भव नहीं है। उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक विचार है। यह व्यक्ति के विचारों पर निर्भर है। यह समय, स्थान के साथ बदलती रहती है अतः सीमान्त उपयोगिता की माप कठिन होती है।
5. सत्यता का अभाव सीमान्त विश्लेषण विभिन्न मान्यताओं पर आधारित होने से इसमें सत्यता की कमी पायी जाती है।
उन सभी आलोचनाओं के बाद भी सीमान्त विश्लेषण का अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान है। उपभोक्ता व्यवहार के आधुनिक सिद्धांत को जानने के लिए तटस्थता वक्र विश्लेषण भी संक्षेप में देखा जा सकता है।
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