कोष प्रवाह विवरण का महत्व व उपयोग का लाभ - Importance, Uses or Advantages of Funds Flow Statement

कोष प्रवाह विवरण का महत्व व उपयोग का लाभ - Importance, Uses or Advantages of Funds Flow Statement


कोष प्रवाह विवरण एवं निश्चित अवधि में कार्यशील पूँजी में हुए परिवर्तनों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। इस विवरण की सहायता से ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये जा सकते हैं जिनका समाधान चिद्वे अथवा लाभ-हानि खाते के आधार पर नहीं किया जा सकता। इस विवरण से व्यवसाय के प्रबन्धकों, स्वामियों, ऋणदाताओं, भावी विनियोजकों तथा शोधकर्ताओं को अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध होते हैं। संक्षेप में कोष-प्रवाह विवरण निम्नलिखित दृष्टिकोणों से एक उपयोगी तकनीक है।


(1) प्रबन्ध के लिए महत्व (Importance for Management ) कोष प्रवाह विवरण प्रबन्ध के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। प्रबन्ध को संस्था के हित में विभिन्न प्रकार के निर्णय लेने पड़ते है तथा नितियों का निर्माण करना पडता है।

ये निर्णय / नितियाँ कोष प्रवाह विवरण के विश्लेषण के आधार पर तय की जाती है। प्रबन्ध के लिए कोष प्रवाह विवरण के महत्व को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है।


(1) वित्तीय विश्लेषण (Financial Analysis) कोष प्रवाह विवरण को तैयार करने की कोई बाध्यता नहीं होती है, फिर भी सस्था के प्रबन्धक द्वारा इसे तैयार किया जाता है। प्रबन्धक द्वारा इस विवरण को तैयार करने के मूल में संस्था की वित्तीय स्थिति का विश्लेषण प्राप्त करना होता है। कोष के स्त्रोत विभिन्न वर्षो में कौन-कौन से रहे है तथा कोष का प्रयोग किन-किन साधनों में किया गया है ? संस्था की कार्यशैली में वृद्धि हुई या विगत वर्ष की तुलना में कमी आई है। उसके पीछे कौन-कौन से कारण रहे है ? इनका विश्लेषण केवल कोष-प्रवाह विवरण के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।


(2) वित्तीय विनियोजन एवं बजट (Financial Planning and Forecasting of Budget) कोष प्रवाह विवरण के द्वारा संस्था को विभिन्न स्त्रोतो एवं कोषों के उपयोग मदों की विस्तृत जानकारी मिलती है। शुद्ध कार्यशील पूँजी की कितनी आवश्यकता होगी, इसका अनुमान लगाने हेतु विगत वर्षो के परिवर्तनों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाता है। कोष-प्रवाह विवरण के द्वारा वित्तीय नियोजन में सहायता मिलती है। भविष्य में स्थायी सम्पत्तियों के क्रय, कार्यशील पूँजी की आवश्यकता, ऋणों का भुगतान आयकर एवं लाभांश के भुगतान हेतु आवश्यक रोकड का पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस हेतु किन-किन साधनों से फण्ड का आगमन होगा ? जैसे- पूँजी का निर्गमन, स्थायी सम्पत्तियों का विक्रय, संचालन से रोकड़ प्राप्त, आदि। फण्ड की प्राप्तियों के आधार पर यह ज्ञात होता है कि संस्था के आन्तरिक स्त्रोतों से कितने फण्ड मिलेंगें तथा कितने फण्ड बाह्य स्त्रोतों से जुटाने पड़ेगे। अतः प्रबन्धकों को कोष-प्रवाह विवरणों की सहायता से वित्तीय नियोजन एवं बजट बनाने में आवश्यक मदद मिलती है।


(3) भावी मार्ग-दर्शन (Future Guidance) - कोष-प्रवाह विवरण विगत वर्षो की सूचनाओं की सहायता से बनाये जाते है। इसके आधार पर भावी योजनाएं बनायी जाती है तथा भविष्य के लिए वित्तीय नीतियों का निर्माण किया जाता है।


(4) तुलनात्मक अध्ययन में सहायक (Helpful in comparative study) कोष प्रवाह विवरण का निर्माण दो समयाविधियों के आर्थिक चिट्टों के आधार पर किया जाता है, जिसमें तुलनात्मक अध्ययन में सहायता मिलती है। यद्यपि प्रत्येक संस्था में वित्तीय वर्ष के अन्त में लाभ-हानि खाता एवं आर्थिक चिट्ठा तो अनिवार्य रूप से तैयार किया जाता है। परन्तु इन दोनों वित्तीय विवरणों के आधार पर व्ययों, सम्पत्तियों एवं दायित्वों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता है, वास्तविकता यह है कि इनका तुलनात्मक अध्ययन केवल कोष-प्रवाह विवरण द्वारा ही किया जा सकता है।


(5) ऋणों को प्राप्त करने में सहायक (Helpful in Procurement of Loans ) कोष प्रवाह विवरण वित्तीय विवरणों का अन्त परीक्षण करता है।

इसकी सहायता से विनियोजकों एवं ऋणदाताओं को संस्था की पूर्ण विस्तृत जानकारी एवं शोधन क्षमता का ज्ञान हो जाता हैं, इसके आधार पर ये संस्था को ऋण देने का निर्णय शीघ्रता से कर सकते है। अतः कोष प्रवाह विवरण ऋण प्राप्त करने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।


(6) अर्जनों का विश्लेषण (Analysis of Accruals) व्यावसायिक लाभों का किस प्रकार उपयोग किया गया ? व्यवसाय में पर्याप्त लाभ होने पर भी कोष पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध क्यों नहीं हैं? इन प्रश्नों का उत्तर कोष-प्रवाह विवरण द्वारा ही सम्भव है।


(2) अंशधारियों के लिए महत्व (Importance for Shareholders) अंशधारी कोष-प्रवाह विवरण से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते है।


1) संस्था में वित्त प्रबन्धन किस प्रकार किया जा रहा है? 


2) संस्था में उनका हित सुरक्षित है या नहीं?


3) लाभांश का भुगतान लाभों में से हो रहा है या पूँजी में से ?


4) संस्था में कार्यशील पूँजी की क्या स्थिति है?


5) संस्था में लाभों की प्रवृति क्या है? 


6) संस्था संचालन (Operation) से अधिक कोष प्राप्त कर रही है या अन्य साधनों से ?


उपर्युक्त तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर संस्था के अंशधारी, प्रबन्धकीय कुशलता की जांच कर सकते हैं।


(3) ऋणदाताओं एवं विनियोक्ताओं के लिए महत्व (Importance for Creditors and Investors)


ऋणदाता व विनियोक्ता इस विवरण की सहायता से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं-


(I) संस्था की कार्यशील पूँजी में कमी या वृद्धि का अनुमान लगाकर भावी प्रवृति का विश्लेषण कर सकते हैं।


(II) संस्था की सामान्य क्रियाओं से चालू कोष उत्पन्न करने की क्षमता का अनुमान लगा सकते हैं।


(III) प्रदान किये जाने वाले ऋण की रकम सुरक्षित है या नहीं तथा ऋण पर ब्याज समय से मिलता रहेगा या नहीं ?


(iv) भविष्य में आय की क्या सम्भावना है ?


उपर्युक्त तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर ऋणदाता व विनियोजक संस्था में विनियोजन करने या न करने का निर्णय ले सकते है। कुछ वित्तीय संस्थाएं तो ऋण देने से पूर्व कोष प्रवाह विवरण विशेष रूप से मांगती हैं।


(4) अन्य फर्मों के लिए महत्व (Importance for Other Firms) समान उद्योग में सलंग्न अन्य फर्मों के कोष प्रवाह विवरण के तुलनात्मक अध्ययन से एक फर्म अपने वित्तीय प्रबन्ध में कमियाँ ज्ञात कर सकती है तथा सुधार के लिए ठोस कदम उठा सकती है ।


(5) सरकार के लिए महत्व (Importance for Government)


कोष प्रवाह विवरण से सरकार को उद्योगों में प्रयुक्त पूँजी के विभिन्न स्त्रोतों का ज्ञान होता हे जिससे सरकार को पूँजी नियन्त्रण में सहायता मिलती है। संचालन लाभों का अध्ययन कर सरकार विक्रय मूल्य नीति के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है। (6) अर्थशास्त्रियों के लिए महत्व (Importance for Economics)


व्यवसाय की वित्तीय स्थिति के विश्लेषण में तो इस विधि का प्रयोग किया ही जाता है, आजकल अर्थशास्त्रियों ने भी अर्थव्यवस्था में उदित हुए कोषों की गणना में इस विधि का उपयोग प्रारम्भ कर दिया है। केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (C.S.O.) ने क्षेत्रीय कोष प्रवाह की संगणना में इस विधि का प्रयोग किया है।


इस प्रकार स्पष्ट हैं कि कोष प्रवाह, चिड्डे तथा लाभ-हानि खाते की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं प्रदान करता है। यही कारण है कि अमेरिकन कम्पनियों के लिए चिट्टे तथा लाभ-हानि खाते के समान ही वित्तीय स्थिति में परिवर्तनों का विवरण (Statement of Changes in Financial Position) - सम्पूर्ण साधनों (Total resources) की अवधारणा पर आधारित कोष-प्रवाह विवरण एक आवश्यक विवरण बना दिया गया है। भारत में यद्यपि कम्पनियों के लिए इस प्रकार की कोई अनिवार्यता नहीं है, फिर भी भारत के चार्टड लेखापालों के संस्थान (Institute of Chartered Accountants of India) द्वारा सिफारिश की गई है कि वार्षिक लेखों के साथ वित्तीय स्थिति में परिवर्तन का विवरण भी प्रकाशित किया जाए।