महादेव देसाई के शब्दों में - In the words of Mahadev Desai

महादेव देसाई के शब्दों में - In the words of Mahadev Desai


"गांधी जी ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे बालक एवं बालिका को संपूर्ण मानव बनाया जा सके। गांधी जी के अनुसार शिक्षा को क्रांतिकारी होना चाहिए। उनके शिक्षा में योगदान को एम. एस. पटेल ने इस रूप में अभिव्यक्त किया है, गांधी जी का शिक्षा दर्शन अपनी योजना में प्रकृतिवादी है अपने उद्देश्य में आदर्शवादी है और अपनी पद्धति एवं कार्यक्रम में प्रयोजनवादी है।" उनकी शिक्षा बाल केन्द्रित है जिसमें बच्चों की रुचियों के अनुसार पाठ्यक्रम में विषयों का निर्धारण किया गया है।


गांधी जो वास्तव में आदर्शवादी थे। उनके अनुसार ज्ञान का उद्देश्य उत्तम चरित्र का निर्माण करना है। उनका सर्वोदय का सिद्धांत आदर्शवादी विचारधारा का ही पर्याय है।

गांधी जी का शिक्षा दर्शन अपनी योजना और कार्यपद्धति में प्रयोजनवादी मान्यता पर आधारित है क्योंकि उन्होंने अपने पाठ्यक्रम में समन्बय विधि को महत्व दिया है।


संक्षेप में गांधी जी का शिक्षा दर्शन वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुकूल है। हुमायूँ कबीर के शब्दों में गांधी जी की राष्ट्र को बहुत सी देनों में से नवीन शिक्षा के प्रयोग की देन सर्वोत्तम है।


वर्तमान परिस्थिति में बेसिक शिक्षा का महत्व


1. निर्धन ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण विधि - 

भारत एक गरीब देश है। यहाँ शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार जरूरी है। निर्धनता शिक्षा के प्रचार और प्रसार में बाधक बनी बैठी है। इसके लिए बेसिक शिक्षा ही एकमात्र साधन है जिसके माध्यम से लोगों को शिक्षा प्रदान की जा सकती है। 


2. बेसिक शिक्षा मातृ-भाषा के माध्यम से शिक्षा देती है - ग्रामीण जनता को अपनी मातृभाषा का ही भरोसा होता है। यह शिक्षा मातृभाषा पर आधारित है। इसलिए ग्रामीण जनता इसके माध्यम से विचारों को आसानी से ग्रहण और व्यक्त कर सकती है।


3. यह शहर और गाँव के भेद को दूर करती है - बेसिक शिक्षा शहर और गाँव के बीच के अवरोध को दूर करेगी। यह शिक्षा शहर के लोगों द्वारा देहात के लोगों को हीन दृष्टि से देखने की प्रवृति को समाप्त कर उनके बीच की विषमताओं को समाप्त करने में सफल हो सकती है।


4. श्रम को महत्व - शिक्षा में श्रम को महत्वपूर्ण स्थान देकर गांधी जी ने भारतीय समाज की आर्थिक दशा को सुधारने का नया तरीका निकाला है।


5. समाज और विद्यालय के बीच संबंध - बेसिक शिक्षा समाज और विद्यालय के बीच संबंध स्थापित करती है। समाज के प्रमुख व्यबसाय को क्राफ्ट के रूप में विद्यालय में महत्वपूर्ण स्थान देने से समाज और विद्यालय में एकरूपता आ जाती है।


सफल मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधि बेसिक शिक्षा एक सफल मनोवैज्ञानिक विधि को प्रोत्साहन देती है। इसमें बालक को क्रियाशील रखा जाता है। अन्य विषयों का सम्बन्ध क्राफ्ट से जोड़ देने पर उनमें भी सरसता आ जाती है। यह शिक्षा उद्देश्यपूर्ण क्रियाओं पर आधारित है। 


गांधीजी के शिक्षा दर्शन का मूल्यांकन


गांधीजी की शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय देन है। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय जीवन को दृष्टि में रखते हुए वातावरण के अनुसार ऐसी शिक्षा योजना प्रस्तुत की जिसको कार्यरूप में परिणित करने से भारतीय समाज में एक नया जीवन आने की संभावना है। उनके शिक्षा दर्शन का अध्ययन करने से हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि गांधी जी हृदय से आदर्शवादी थे। अपने आदर्शों को लाभकारी तथा फलदायक बनाना चाहते थे।

उनकी शिक्षा दर्शन में प्रकृतिवादी, आदर्शबाद एवं प्रयोजनवाद की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। आदर्शवाद गाधी दर्शन का आधार है तथा प्रकृतिवाद एवं प्रयोजनवाद उसके सहायक है। गांधीजी के शिक्षा दर्शन को हम आदर्शवाद इसलिए कहते हैं क्योंकि वह जीवन के अंतिम लक्ष्य सत्य को प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। प्रकृतिबाद इसलिए कहते हैं क्योंकि वह बच्चे को प्रकृति के अनुसार विकसित करना चाहता है। प्रयोजनवाद इसलिए कह सकते हैं क्योंकि वह बच्चे को उसकी रुचि के अनुसार सीखने पर बल देता है।


डॉ. एम. एस. पटेल ने भी इसी आशय की पुष्टि करते हुए लिखा है कि दार्शनिक के रूप में गांधी जी की महानता इस बात में है कि उनके शिक्षा दर्शन में प्रकृतिवाद, आदर्शवाद और प्रयोजनवाद की मुख्य प्रवृत्तियों अलग और स्वतंत्र नहीं है वरन वे सब मिलजुल एक हो गई हैं, जिससे ऐसे शिक्षा दर्शन का जन्म हुआ है जो आज की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त होगा तथा मानव आत्मा की सर्वोच्च आकांक्षाओं को संतुष्ट करेगा।"