आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की स्थिति के संकेतक - Indicators of the status of tribal and nomadic women
आदिवासी एवं खानाबदोश स्त्री की स्थिति के संकेतक - Indicators of the status of tribal and nomadic women
जनजातीय समाज समतावादी समाज माना जाता है, खासकर जातिवादी समाज की श्रेणीबद्ध व्यवस्था के संदर्भ में तो निश्चय ही। लेकिन स्त्री की स्थिति के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि स्त्री की स्थिति भिन्न-भिन्न समाज में, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग होती है। किसी समाज में स्त्रियों की स्थिति अक्सर उनके आय के स्तर, रोज़गार के अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार, समुदाय और समाज में वे जो भूमिका अदा करती हैं, उससे निर्धारित होती है (घोष, 1987)।
किसी भी अन्य समाज की ही तरह जनजातीय समुदाय में भी स्त्रियाँ कुल जनसंख्या की लगभग आधी आबादी होती हैं। जैसा कि हमने पहले भी यह जाना है कि किसी समाज में स्त्री की परिस्थिति (status ) उसी समाज में पुरुषों की परिस्थिति की तुलना में आँकी जाती है। यहाँ भी आदिवासी एवं खानाबदोश समुदाय की स्त्री की उसके समुदाय में परिस्थिति जानने के लिए हम मुख्य अनुभवसिद्ध संकेतकों को आधार बनाएंगे:
1. जननांकीय स्थिति
2. स्वास्थ्य
3. शिक्षा
4. संपत्ति पर उत्तराधिकार
5. जेंडर के आधार पर श्रम का बँटवारा
5. राजनैतिक स्थिति
6. स्त्री की जगह (space) ।
1. जननांकीय
किसी जनसंख्या की जननांकीय स्थिति का मूल्याकंन करने के लिए लिंग अनुपात, अस्वस्थता दर और मृत्युदर के पैटर्न और जीवन प्रत्याशा जैसे संकेतकों का प्रयोग किया जाता है।
2001 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 8.2% (84.3मिलीयन ) है।
भारत में जनसंख्या का संगठन पुरुषों के पक्ष में पाया जाता है। सामान्य जनसंख्या की तुलना में अनुसूचित जनजातियों में स्त्री-पुरुष की संख्या में अंतर कम पाया जाता है।
जनजातीय समुदायों में भी पुत्र के पक्ष में प्राथमिकता देखी गई है लेकिन वे इसके लिए लड़कियों को पैदा होते ही मार नहीं देते हैं। लड़कियों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं दिखाया जाता और उनके लिए कड़े सामाजिक प्रतिमान भी नहीं हैं। वे सामाजिक समारोहों और अन्य मनोरंजक क्रिया-कलापों, जैसे- नृत्य, गायन आदि में भाग लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं।
आदिवासी एवं खानाबदोश समुदायों में दहेजप्रथा नहीं पाई जाती, बल्कि विवाह के समय लड़के का पिता लड़की के पिता को वधु-मूल्य (bride price) चुकाता है। विधवा और तलाकशुदा स्त्रियों को पुनर्विवाह करने की स्वतंत्रता होती है। मातृवंशीय समाजों को या विशेष परिस्थितियों को छोड़ कर आमतौर पर लड़कियाँ संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं होती हैं।
2. स्वास्थ्य
जो कारक आमतौर पर जनजातीय समुदायों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, वे जनजातीय स्त्रियों के मामले में ज्यादा ही उल्लेखनीय हो जाते हैं। तमाम अध्ययनों में ऐसा पाया गया है कि न केवल जनजातीय वरन गैर- जनजातीय समुदायों में भी अशिक्षा का स्वास्थ्य से सीधा संबंध है।
जो सांस्कृतिक प्रतिमान विशेष रूप से स्त्रियों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं वे हैं- शादी, शादी के तरीके (एक विवाह या बहु-विवाह), शादी की उम्र, प्रजनन और बच्चे के लिंग से संबंधित सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य, समाज में उस स्त्री की परिस्थिति, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर स्त्री से आदर्श भूमिका निभाने और कार्य करने की अपेक्षा करना। (क्षत्रिय, 1992).
विभिन्न अध्ययनों द्वारा यह पाया गया है कि राष्ट्रीय औसत की तुलना में जनजातीय समुदायों में उच्च शिशु मृत्युदर, पोषण का निम्नस्तर, निम्न जीवन- प्रत्याशा, कुछ जनजातीय समुदायों में ग्लूकोज-6 फास्फेट एन्जाइम की कमी और सिकिल सेल जैसी बीमारी के मामले ज्यादा पाए जाते हैं। साथ-साथ दूसरे आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों की तरह ही जनजातीय समुदाय की स्त्रियों में भी उच्च प्रजनन दर और इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ आम बात हैं। (बासु एवं साथी, 1990).
उड़ीसा के एक जनजातीय समुदाय पौड़ी भुनिया पर किए गए एक अध्ययन में (अली, 1980) बताया गया है कि 268 लोगों के सैंपल में 17 पुरुषों की तुलना में 52 स्त्रियाँ कुपोषण से संबंधित बीमारियों से पीड़ित थीं, क्योंकि वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती दूरी और मिट्टी की उर्वरता में कमी के कारण जनजातीय परिवारों के लिए भोजन की उपलब्धता में कमी आई,
जिसका सीधा असर समुदाय के स्वास्थ्य पर पड़ा, लेकिन स्त्रियाँ इससे ज़्यादा प्रभावित हुई ( बसु. 1993 से उद्धृत)। आमतौर पर परिवार के स्तर पर पोषण की स्थिति की सीमा का निर्धारण सांस्कृतिक प्रतिमानों और मूल्यों तथा सामाजिक-आर्थिक कारकों द्वारा होता है। जनजातीय स्त्रियों में उच्च प्रजनन उनकी पोषण की स्थिति पर सबसे बुरा असर डालने वाला सामाजिक सांस्कृतिक कारक है, क्योंकि गर्भावस्था और उसके बाद स्तन्य काल (दूध पिलाने की अवधि) के उपापचयी दबाव (मेटाबॉलिक स्ट्रेस) को इस दौरान समुचित भोजन की पूर्ति द्वारा संतुष्ट कर पाना संभव नहीं होता है।
लड़का और लड़की दोनों ही कुपोषण, संक्रमण और अन्य खतरों से समान रूप से प्रभावित होते हैं। जनजातीय समुदायों में गरीबी और उसके कारण उत्पन्न कुपोषण से लड़के-लड़कियाँ दोनों की ही शिशु मृत्युदर बहुत अधिक होती है।
3. शिक्षा
सामाजिक बदलाव लाने वाले कारकों में शिक्षा एक महत्वपूर्ण कारक है।
शिक्षा न केवल ज्ञान और समझ बढ़ाती है, बल्कि यह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में भी सहायक होती है।
जनजातीय समुदायों में साक्षरता दर बहुत ही कम (25.9%) पाई गई है और खासकर के जनजातीय स्त्रियों में (14.5%)|(NSSO, 1991)। 1961 में अनुसूचित जनजाति की अपरिष्कृत साक्षरता 8.5% थी, जो 2001 में बढ़कर 38.4% हो गई। 2001 की जनगणना के अनुसार आदिवासी स्त्रियों में साक्षरता दर बढ़कर 34.76 प्रतिशत हो गई। अनुसूचित जनजातियों में ज़्यादातर साक्षर केवल प्राथमिक स्तर तक ही साक्षर हैं।
अन्य सामाजिक समूहों की ही तरह जनजातीय समाज की स्त्रियाँ भी पुरुषों की तुलना में कम साक्षर हैं। उनका निम्न शैक्षणिक स्तर उनकी निम्न साक्षरता दर, स्कूलों में कम दाखिलों तथा स्कूलों में उनकी कम उपरिस्थिति से साफ स्पष्ट होता है। बहुत से पशुपालक आदिवासी, जैसे- गद्दी, भोटिया, गुज्जर आदि खानाबदोश जीवन व्यतीत करते हैं। वे चारागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। कई अन्य जनजातियां जैसे भील, लोधा, बंजारा आदि भी हैं, जो काम की खोज में एक जगह से दूसरी जगह जाती रहती हैं। ऐसी स्थितियों में शिक्षा का उपेक्षित हो जाना स्वभाविक है।
जनजातीय समुदाय में लड़के और लड़कियाँ दोनों ही बालश्रम करते हैं।
लड़कियाँ अपने छोटे भाई बहनों की देख-रेख के साथ-साथ घर और खेतों के छोटे-मोटे कामों में भी हाथ बंटाती हैं। इस कारण उन्हें पढ़ाई का बिल्कुल भी समय नहीं मिलता, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा में जेंडर गैप बहुत है।
4. संपत्ति पर उत्तराधिकार
परिवार की संपत्ति के उत्तराधिकार का निर्धारण पारंपरिक (कस्टमरी) कानूनों के तहत होता है। सभी पितृवंशीय समाजों में नियमत: संपत्ति का उत्तराधिकार स्त्रियों को नहीं होता है। फिर भी इस नियम का कड़ाई से पालन नहीं किया जाता। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें पुत्रियों को परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिलता है। यद्यपि त्रिपुरा के त्रिपुरी आदिवासियों में संपत्ति का उत्तराधिकार पितृवंशीय होता है, फिर भी आमतौर पर पिता अपनी पुत्रियों को कुछ भूमि प्रदान करता है। यह एक प्रकार के उपहार की तरह होता है और भावी उत्तराधिकारी इसका विरोध भी नहीं करते (बरुआ, 2002 )
पहले लद्दाख के बोद समुदाय में सबसे बड़ा पुत्र समस्त संपत्ति का उत्तराधिकारी होता था। केवल माता के गहनों पर सबसे बड़ी पुत्री का अधिकार होता था। बड़ी भू-संपत्ति के खात्मे का क़ानून लागू होने के बाद से इसमें काफी बदलाव आया है। अब परिवार की संपत्ति में सभी भाई-बहनों की समान हिस्सेदारी होती है। किसी पुरुष सहोदर की अनुपरिस्थिति में लद्दाखी स्त्री ही अकेली उत्तराधिकारी होती है और समझौते द्वारा इस प्रकार की शादी कर सकती है, जिसमें पति, जिसके पास कोई संपत्ति नहीं है, पत्नी के घर आ कर रहे ( भसीन, 1999 )
सिक्किम का भोटिया समुदाय, जो आमतौर पर बहुपति विवाह (एक स्त्री सभी भाइयों की पत्नी होती है) का पालन करता है, में जानवरों पर, खेतों पर, चारागाहों पर, घर के सामानों पर और यहाँ तक कि खुद घर पर भी पिता अर्थात परिवार के पुरुष मुखिया का अधिकार होता है। घर के सामानों और वस्तुओं पर सभी सगे भाइयों का संयुक्त अधिकार होता है। भू-संपत्ति पर हमेशा परिवार के पुरुष मुखिया का अधिकार होता है। स्त्रियों का परिवार की संपत्ति पर कोई क़ानूनी अधिकार नहीं होता। परिवार के मुखिया के निधन के बाद स्त्रियाँ परिवार की संपत्ति को उपभोग करने का अधिकार रखती हैं
और अपने जीवन पर्यंत यहाँ रह सकती हैं। फिर भी, यदि परिवार संपन्न है तो वह अपनी स्त्रियों और लड़कियों को बर्तन, गहने, भूमि और पशुधन आदि ऐसी चीजें उपहार के रूप में देता है, जिन्हें उनकी शादी के बाद वापस लिया जा सके। इसे पेवा कहते हैं। यदि परिवार में पुत्र नहीं है तो समुदाय के मुखिया की अनुमति से किसी निकट संबधी या फिर गाँव के किसी भी के व्यक्ति से पुत्र गोद लिया जा सकता है। इसी तरह भील और गद्दी समुदायों में भी लड़कियों को संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यहाँ तक कि पुत्र की अनुपरिस्थिति में भी वे संपत्ति पर कोई दावा नहीं कर सकतीं। ( भसीन. 2007)
मातृवंशीय समुदायों में संपत्ति पर अधिकार स्त्रियों का होता है, पर इसकी देख-रेख पुरुष करते हैं (स्त्री का भाई)। इस प्रकार के समाजों में पिता की संपत्ति पर अधिकार पुत्र का नहीं होता, बल्कि पुत्र को अपने मामा की संपत्ति पर अधिकार मिलता है। उदाहरण के लिए, मेघालय में निवास करने वाला खासी समुदाय मातृवंशीय है। इसमें परिवार की संपत्ति पर अधिकार स्त्रियों का होता है। यदि परिवार में कोई पुत्री नहीं है तो किसी निकट संबधी को गोद लिया जाता है और संपत्ति का उत्तराधिकार उसे ही मिलता है। परिवार की चल सपंत्ति (movable property) पर सारा अधिकार सबसे छोटी पुत्री का होता है। भू-संपत्ति पर सभी बहनों का अधिकार होता है, पर सबसे छोटी बहन को सबसे बड़ा हिस्सा मिलता है।
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