वैयक्तिक अवसर - individual occasion
वैयक्तिक अवसर - individual occasion
लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में समाज और राज्य का अस्तित्व नहीं था, तब व्यक्ति एक समान और प्रकृति के नियम और दायरे में जैसा चाहे वैसे करने के लिए स्वतंत्र था। लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को प्राकृतिक अधिकार जैसे जीवन जीने की स्वतंत्रता, सम्पत्ति का अधिकार तो था लेकिन शान्ति और सुरक्षा नहीं थी, इसलिए मनुष्य ने एक समझौते के द्वारा नागरिक समाज की स्थापना की, जिसमें उसने सुरक्षा के बदले अपने अधिकारों को कुछ हद तक सीमित किया। उन्होंने कहा सरकार का निर्माण न्यास के द्वारा होता है और सरकार के निर्माण के बाद भी सर्वोच्च शक्ति आम जनता के पास रहती है और उसके प्राकृतिक अधिकार वैसे ही बने रहते हैं. क्योंकि सरकार के द्वारा व्यक्तिओं के अधिकार सीमित किये जातें हैं इसलिए सरकार तभी वैध होती है जब आम सहमति पर आधारित होती है। उनके राजनीतिक मत में शक्ति का उपयोग सार्वजनिक शुभ के लिए और सहमति के आधार पर किया जाना चाहिए। इस तरह लॉक ने व्यक्ति को साध्य और समाज को साधन बताया। बेन्थम और मिल ने कहा है
कि व्यक्ति के प्रत्येक कर्म और सरकार के प्रत्येक कदम की जांच उपयोगिता सिद्धांत के आधार पर की जानी चाहिए, यह देखना चाहिए की उनसे सुख की वृद्धि होती है या उससे विपरीत दिशा में जातें हैं। बेन्थन के अनुसार जो व्यक्ति समुदाय के सदस्य होतें हैं उनसे अलग समाज एक काल्पनिक सत्ता है, समाज का हित समाज के सदस्य व्यक्तियों के हित में समाहित है तथा व्यक्ति के हित को समझे बिना समाज के हित को समझना बेकार है।
व्यक्ति हर समाज के मूल में रहता है, यह सही है की सहयोगात्मक सामाजिक संबंधों से व्यक्ति की क्षमताओं का विकास होता है. लेकिन समाज कि प्रगति का पैमाना व्यक्ति की प्रगति है। किसी समूह के अस्तित्व के लिए व्यक्ति के अस्तित्व का होना ज़रूरी है, व्यक्ति से स्वतंत्र किसी राष्ट्र, वर्ग या सामूहिक अहं के अस्तित्व को मान लेना गलत है। व्यक्ति को प्राप्त स्वतंत्रता, अवसर और सुख सामाजिक विकास का एक आदर्श है,
किसी भी सामूहिक प्रयत्न या सामाजिक संगठन की सफलता का मानदंड उससे समूह कि इकाई व्यक्ति को मिलने वाला वास्तविक लाभ है।
वैयक्तिक अवसर को परिभाषित करें तो इस स्थिति में समाज अपने सदस्यों को जीवन स्थिति, आर्थिक हालत और जीवन में गुणवत्ता लाने के लिए वो हर संभव मौके देता है जो उक्त समाज से स्वीकृत है। मोटे तौर पर इसका अर्थ ऐसे सामाजिक वातावरण से है जिसमें व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार (जीविका ), स्वास्थ्य-सुविधा आदि की प्राप्ति में ऐसे चीजों के आधार पर भेदभाव न किया जाता हो जिन्हे व्यक्ति कोशिश करके भी नहीं बदल सकता। वैयक्तिक अवसर के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिये सरकार और संस्थाएँ तरह-तरह के उपाय करतीं हैं। अवसर प्रदाता संस्थाएँ निम्नलिखित चीजों के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करतीं -
• लिंग
• जाति
• वैवाहिक स्थिति
• कैरीयर से जुड़े उत्तरदायित्व
• अपंगता
• आयु
• राजनैतिक झुकाव
• धार्मिक विश्वास
किसी भी सरकार का दायित्व होता है बिना किसी जात-पात के भेद के या बिना किसी धर्म, जाति का फर्क किए हुए, अथवा किसी भी अन्य प्रकार का विभेदीकरण न करते हुए. लोगों को इस तरह से अवसर उपलब्ध करवाना कि जहां हर एक व्यक्ति अपनी क्षमता का भरपूर रूप से अनुप्रयोग कर सके,
भरपूर जीवन जी सके, से अवसरों का यह रूप ही किसी व्यक्ति को सरकार ओर से दी जाने वाली श्रेष्ठ विरासत मानी जा सकती है। हमारे संविधान में सभी देशवासियों को समान अधिकार प्राप्त हैं, अब वह चाहे गरीब मजदूर हो या दलित वर्ग का कोई नागरिक हो, सब बराबर सम्मान के योग्य है। हजारों वर्षों से दबे कुचले रहे दलित वर्ग को आरक्षण प्रदान कर, देश की मुख्य धारा में मिलाकर आगे बढ़ने का अवसर दिया गया। देश के सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार जीवन यापन के लिए रोज़गार के समान अवसर दिए गए हैं। प्रत्येक नागरिक को न्याय पाने का पूर्ण अधिकार है, भले ही वह अपराधी ही क्यों न हो, उसे दंड मिलेगा तो सिर्फ कानूनों के अनुसार ही मिलेगा। यह सब देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्थापित होने के कारण संभव हो सका, देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान में वर्णित नियमों के अनुसार चलना होता है फिर चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। कहने का तात्पर्य यह है संविधान प्रत्येक व्यक्ति से ऊपर है, जो तानाशा ही शासन या विदेशी शासन में संभव नहीं हो सकता। बहुत से लोगों का विचार है कि वैयक्तिक अवसर एक मिथक मात्र है जबकि समान अवसर के द्वारा वैयक्तिक अवसर का सिद्धान्त व्यावहारिक धरातल पर उतारा जा सकता है और अधिक उपयोगी है। समान अवसर की नीति का लक्ष्य होता है कि संस्था में विविधता सुनिश्चित की जाय।
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