आगमनात्मक तर्क - Inductive Reasoning

आगमनात्मक तर्क - Inductive Reasoning


व्यापकताओं और मान्य प्राधिकारियों के कथनों पर आधारित निष्कर्ष तभी सही निकलेंगे जब सत्य सिद्ध किया हो। इस विधि को आगमनात्मक तर्क (Inductive Reasoning) के नाम से जाना जाता है अर्थात् विशेष से सामान्य की और जाना। वैज्ञानिक एवं दार्शनिक बेकन का मानना था कि प्राधिकारियों के कथनों को पूर्ण सत्य न मानकर, मनुष्य को प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन करना चाहिए, उन पर प्रयोग करने चाहिए, जो तथ्य सामने आएँ, उनकी सारणी बनाएँ, सब का अध्ययन कर छोटे-छोटे व्यापीकरण को उन पर आधारित करना चाहिए। फिर छोटे व्यापीकरण (Generalization) से बड़े व्यापीकरण पर पहुंचना चाहिए। उसने सचेत किया कि किसी समस्या का निदान, बिना तथ्यों को एकत्रित किए, काल्पनिक विचारों के आधार पर नहीं करना चाहिए।


निगममनात्मक तर्क (Deductive Reasoning) में कथन या सामान्यीकरणों के परिपेक्ष्य में ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है जबकि आगमनात्मक तर्क (Inductive Reasoning) घटनाओं के प्रेक्षण प्राप्त निष्कर्षों को आधार बना कर ही पूरी घटना के निष्कर्ष निकाल सकते हैं।


इन घटनाओं को प्रमाणित करने के लिए उनका प्रक्षण आवश्यक है। बकन की विधि से तर्क करने के तरीक को पूर्ण आगमन कहा गया है। व्यवहारिक रूप से सभी सामान्य कथनों से संबद्ध प्रत्येक घटना का परीक्षण संभव नहीं हो सकता। किसी स्थिति में केवल कुछ घटनाओं का प्रेक्षण ही सम्पूर्ण का आधार बनाकर व्यापीकरण कर दिया या जाए तो इसे अपूर्ण आगमन (imperfect Induction) कहेंगे।


यद्यपि अपूर्ण आगमन (Imperfect induction) द्वारा मनुष्य असंदिग्ध निष्कर्ष नहीं निकाल सकता, फिर भी उससे उसे विश्वसनीय ज्ञान प्राप्त होगा जिससे वह उचित निर्णय ले सका।


आगमनात्मक व निगमनात्मक दोनों तरह के तर्कों में कुछ लाभ है और कुछ सीमाएँ। यदि साध्य सही है, तो निगमनात्मक तर्कों द्वारा पूर्णतः ठीक निष्कर्षो पर पहुंचा जा सकता है। ऐसे निर्णय साध्यों में निहित पूर्व विदित व विद्यमान बिन्दुओं तक सीमित रह जाते हैं और उससे आगे सोच विचार की स्थिति नहीं बनती। दूसरी ओर अपूर्ण आगम्मात्मक तर्कों द्वारा ऐसे सूत्रों का भी पता चल जाता है जिनका | घटित घटनाओं में कोई स्थान नहीं या जो सूचना अभी तक अनुपलब्ध थी। यदि प्रेक्षित घटनाएँ सत्य हैं तो निष्कर्षों की सत्यता का प्रतिशत घट बढ़ सकता है।