अनुदेशन - instruction

अनुदेशन - instruction

यह शिक्षण से मिलती-जुलती क्रिया है, जिसमें पूर्व निर्धारित अधिगम उद्देश्यों को पूरा करने के लिए शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच विचारों तथा तर्क का आदान-प्रदान होता है। शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों पाठ्यवस्तु की समीक्षात्मक आलोचना करते हैं। इसमें शिक्षार्थी को प्रश्न पूछने तथा अपनी शंका एवं जिज्ञासा जाहिर करने की स्वतंत्रता होती है। शिक्षक पाठ्यवस्तु के स्पष्टीकरण तथा संप्रेषण के लिए यथासंभव प्रयास करता है तथा वह शिक्षार्थियों की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए सर्वदा तत्पर रहता है। शिक्षक एवं शिक्षार्थी के मध्य वैचारिक आदान-प्रदान की सीमा को देखते हुए अनुदेशन एवं शिक्षण में भेद किया जा सकता है। शिक्षण में वैचारिक आदान-प्रदान किसी कक्षा या परीक्षा तक ही सीमित नहीं होता है, यह सतत रूप से चलता रहता है जिससे शिक्षार्थी का विकास सतत एवं समग्र रूप से होता है। अनुदेशन में सीखने के संज्ञानात्मक पक्ष पर अधिक बल दिया जाता है तथा भावात्मक एवं क्रियात्मक पक्ष उपेक्षित रहता है वहीं शिक्षण शिक्षार्थी के व्यक्तित्व के तीनों आयामों का संतुलित तथा समग्र रूप से विकास करता है।


इस प्रकार शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक शिक्षार्थी को शिक्षण उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विभिन्न अधिगम अनुभवों में संलग्न होने के लिए अभिप्रेरित करता है उन्हें पाठ्यवस्तु या समस्या का प्रत्यक्षीकरण कराता है तथा उनके साथ वैचारिक आदान-प्रदान कर उन्हें समस्या के समाधान को ढूंढने में सहायता करता है। शिक्षण व्यवस्था में कई चर होते हैं, जिन्हें शिक्षक से संबंधित चर शिक्षार्थी से संबंधित चर सामाजिक परिस्थिति से संबंधित चर विषयवस्तु से संबंधित चर तथा अधिगम से संबंधित चर की श्रेणियों में रखा जाता है। अनुकूलन, प्रशिक्षण, मतारोपण तथा अनुदेशन आदि क्रियाएँ शिक्षण से सम्बंधित होते हुए भी स्वाभाविक दृष्टि से शिक्षण से भिन्न होते हैं। ये क्रियाएँ शिक्षण की प्रकारता के अंतर्गत रखी जाती हैं।