जाति, वर्ग और जेंडर का अंतसंबंध - The interrelationship of caste, class and gender
जाति, वर्ग और जेंडर का अंतसंबंध - The interrelationship of caste, class and gender
जेंडर एक साथ वर्ग और जाति दोनों से जुड़ता है। जाति और जेंडर भेद में सबसे बड़ा अंतर जैविक भेद का है। इन दोनों के बीच जटिलता का कारण जैविक रूप से अलगाव है। स्त्री और पुरुष को बाह्य विशेषता के आधार पर देखकर अलग किया जा सकता है, परंतु भिन्न जातियों के लोगों को देखकर अलग नहीं किया जा सकता। दूसरी बात स्त्री-पुरुष एक घर, एक परिवार में साथ-साथ रहते हैं, दलितों की तरह उनकी बस्ती अलग नहीं होती। इसीलिए स्त्री का मुद्दा जटिल हो जाता है। जॉन स्टुअर्ट मिल जाति एवं वर्ग की तुलना में स्त्री के शोषण की भिन्नता बताते हुए लिखते हैं, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जिन लोगों के पास सत्ता है (यानि पुरुष) उनके पास किसी विद्रोह को विफल करने के लिए साधनों का एक बहुत बड़ा भंडार है। यहां हर गुलाम हर समय मालिक की आंख के नीचे. या यूं कहें कि उसके हाथों में रहता है। अपनी तरह के अन्य गुलामों की बजाय वह अपने मालिक के ज्यादा करीब रहता है। इसलिए उसके खिलाफ किसी किस्म के संगठन का कोई रास्ता नहीं बचता। स्त्रियों के मामले में पराधीन वर्ग का हर सदस्य हर समय प्रलोभन और भय के मिश्रित माहौल में रहता है। ' भारत के संदर्भ में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का गहरा संबंध जाति व्यवस्था से है।
दरअसल जाति व्यवस्था ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के नियमों से संचालित होती है, जिसकी पूरी प्रक्रिया स्त्री और विवाह व्यवस्था पर आश्रित है। जाति व्यवस्था के पुनरूत्पादन में विवाह व्यवस्था की अतुलनीय भूमिका रही है। उमा चक्रवर्ती इस बात को रेखांकित करते हुए लिखती हैं कि, "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता नियमों और संस्थानों का ऐसा पुंज है, जिसमें जाति और जेंडर एक दूसरे में गुंथे हुए हैं और एक दूसरे का स्वरूप तय करते हैं, जिसमें स्त्री, जातियों के बीच का पदानुक्रम बनाए रखने के लिए बतौर साधन इस्तेमाल होती है।" इसी कारण जाति भेद का भरपूर असर स्त्रियों की स्थिति पर पड़ता है। उच्च जातियों की स्त्रियों की समस्याएं अलग होती हैं। इनमें पर्दा प्रथा अधिक होती है और इनके शरीर पर पुरुष समाज का नियंत्रण अधिक होता है। शादी से पहले इन्हें कौमार्य सुरक्षित रखने, पति के प्रति एकनिष्ठ रहने और पति की मृत्यु के बाद आजीवन विधवा जीवन जीने जैसे नियमों का पालन करना पड़ता है। तथाकथित निचली जाति की स्त्रियों में तुलनात्मक रूप से स्वतंत्रता होती है और उन्हें पर्दा या मर्यादा का निर्वहन कम करना पड़ता है। विधवा या तलाकशुदा होने के बाद भी इन्हें किसी पुरुष के साथ मान्य संबंध बनाने ( जो पुनर्विवाह जैसा होता है, हालांकि कुछ अपवादों को छोड़कर इसमें विवाह की रस्म नहीं निभाई जाती हैं) की आज़ादी भी होती है, परंतु यह आज़ादी बहुत सीमित होती है, वास्तविकता यह है कि निम्नजाति की स्त्रियों को जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और निचले वर्ग का सदस्य होने का दंश इन तीनों को झेलना पड़ता है। उन्हें पुरुषों के साथ-साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों का भी शासन सहना पड़ता है। स्त्रियों के बीच भी कई तरह की भिन्नताएं हैं।
जाति और जेंडर का गहरा संबंध कई स्तरों पर दिखाई पड़ता है। स्त्रियों की यौन पवित्रता को पुरुष और उसकी जाति के सम्मान के साथ जोड़ कर देखा जाता है। इसके पीछे धन से जाति तक की कई तरह की सत्ताएं काम करती हैं। इसी के आधार किस स्त्री से कौन-सा रिश्ता रखना है यह तय होता है। गरीब की जोरू, गांव की भौजी' जैसी कहावते इसी सच्चाई को दर्शाती हैं। विवाह संबंधों से परिवार के सम्मान में बढ़ोत्तरी और कमी आती है। यही नहीं अंतरजातीय विवाह के बाद परिवार विशेष को जाति या खान-पान से बहिष्कृत तक कर दिया जाता है। उच्च जाति की स्त्रियां अपनी बेड़ियों को अपना आभूषण समझ कर छोटी जाति की स्त्रियों की उपेक्षा करती हैं। वे पवित्रता और मर्यादा के कठोर बंधन का पालन करती हैं और उसे अत्यंत महत्वपूर्ण समझती हैं। इन स्त्रियों की पवित्रता का गहरा संबंध वंश और रक्त की शुद्धता से जोड़ा जाता है जो यौन पवित्रता के रूप में सामने आता है। उच्च जातियां स्त्रियों की यौन पवित्रता और अशिक्षा का उपयोग कर पितृसत्ता को बचाए रखती हैं और पतिव्रता तथा सती साध्वी स्त्रियों के महिमामंडन द्वारा स्त्रियों से उनकी अपनी ही अधीनता के लिए सहमति प्राप्त करती हैं। दूसरे शब्दों में मनोवैज्ञानिक आधिपत्य (एक तरह के ब्रेनवाश) के द्वारा पितृसत्ता स्त्रियों में पुरुष मानसिकता को पिरो कर अपने वजूद को बचाए रखती है।
उन्हें ममता के आवरण में लपेटकर अंधविश्वास में बांधा जाता है, माता-पिता पितुसत्ता को प्रेमपूर्वक घुट्टी की तरह पिलाते हैं। बचपन से ही ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है जिसका जाने-अनजाने वे जीवन भर पालन करती हैं। पितृसत्ता स्त्री अधीनता को स्त्री के शरीर के साथ अनिवार्य तौर पर जुड़ा हुआ मानती है, जिसे समाज विज्ञान में 'जैविक निर्धारणवाद' कहा जाता है। इसे धार्मिक जामा पहनाते हुए और स्त्रियों को मूलतः मातृत्व से जोड़ते हुए मातृत्व का महिमामंडन किया जाता है। मातृत्व भी ऐसा जिसमें पुत्र की प्राप्ति हो। बांझ या पुत्रहीन स्त्रियां अभिशाप की तरह देखी जाती हैं। अक्सर इस बात की अनदेखी की जाती है कि मातृत्व केवल वरदान नहीं, स्त्रियों के लिए एक बंधन भी है। खास तौर से भारत जैसे देश में जहां बाल मृत्यु दर काफ़ी अधिक है, एक तरह के असुरक्षा बोध से परिवार ग्रस्त रहता है कि अगर यह बच्चा (विशेष कर बालक) मर गया तो घर का चिराग बुझ जाएगा। इसके परिणाम स्वरूप प्रत्येक स्त्री को कई बच्चों को जन्म देना होता है और वे अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित करने की बजाय बच्चा पैदा करने की एक फैक्ट्री जैसी बन जाती हैं। गर्भधारण के दौरान बल की कमी, तेज़ दौड़ पाने में अक्षमता और अल्पविकसित बच्चे की देखभाल के बंधन के कारण अक्सर स्त्रियों को कमज़ोर माना जाता है यानि स्त्रियों को उनकी प्रजनन क्षमता की विशेष जैविक शक्ति के कारण सत्ता संरचना में उचित स्थान नहीं दिया जाता।
निश्चित रूप से जैविक कमज़ोरी का यह ऐतिहासिक तर्क गलत है, क्योंकि अगर शारीरिक बल की कमी के कारण स्त्रियां हीन थीं तो फिर शारीरिक रूप से मजबूत शूद्र क्यों सत्ता से दूर रखे गए। स्पष्ट है कि सामाजिक व्यवस्था के नीति निर्धारक वर्ग या वर्ण अपनी सुविधानुसार किसी को जैविक कारणों से तो किसी को पैतृक कारणों से हेय बताकर खुद केंद्र में बने रहने का उपाय ढूंढ लेते थे।
यह तय है कि पितृसता का अपना स्वतंत्र वज़ूद रहा है, परंतु उसे निर्धारित करने में संपत्ति, उत्पादन प्रणाली एवं वर्ग की सत्ता की भी भूमिका रही है। मार्क्सवादी स्त्रीवाद पितृसत्ता को पूंजी की उपज मानते हुए परिवार को स्त्री शोषण का प्राथमिक स्थल बताता है। एंगेल्स ने स्त्रियों के उत्पादन की प्रक्रिया से दूर होने और घरेलू श्रम के दायरे में सीमित हो जाने को उनके कमज़ोर पड़ने का महत्वपूर्ण कारण माना है। उन्होंने माना कि पहला श्रम विभाजन परिवार में स्त्री पुरुष के श्रम का बंटना था। कृषि केंद्रित समाज के औद्योगिक समाज में बदलने के बाद यह शोषण और बढ़ा। इस व्यवस्था में स्त्रियों के घरेलू श्रम से सीधे पूंजीपति को लाभ होता है न कि उनके पुरुषों को।
उपनिवेशीकरण के कारण पूंजीवाद अपने स्वाभाविक रूप में नहीं आया। पूंजीवादी समाज में व्यक्ति स्वतंत्रता की प्रधानता होती है, परंतु भारतीय परिवेश में व्यक्ति स्वतंत्रता का मूल्य विकसित नहीं हुआ। एक तरह से पुरानी संरचना को जड़ मूल्यों को और सामंतवाद को पूंजीवाद ने बचाने का काम किया। पूंजी ने स्त्रियों को मुक्त करने की बजाय उन्हें घरेलू बनाए रखने की साजिश रची। बच्चों की, घर की ज़िम्मेदारी, पुरुषों को श्रम हेतु तरोताजा बनाने, उन्हें ऊर्जावान बनाने की ज़िम्मेदारी स्त्री निभाती है जिसका लाभ पूंजीपति उठाता है। परिणामतः स्त्री का वर्ग नहीं बदल पाता है और वह मध्य या उच्च वर्गीय परिवार का अंग होते हुए भी निम्नवर्गीय जीवन व्यतीत करती रह जाती है। यहां तक कि घरेलू स्त्रियों को वेतन देने की मांग भी उन्हें घरेलू बनाए रखने में मदद करेगा, यह उनके व्यक्तित्व को सीमित बनाए रखेगा और उन्हें खुले अवसरों से दूर रखेगा। यह कुछ ऐसा ही है जैसा वेश्याओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व को विकसित होने देने की बजाय उन्हें कुछ सुविधाएं दे कर उनकी यथास्थिति को बनाए रखा जाए।
पितृसत्ता पुरानी संरचना को बिना बदले खुद को नए रूप में ढालती रहती है। ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणवाद पुराने तर्कों की बजाय नए वैज्ञानिक तर्क देकर हर साल खुद को नया कर रहा है। दरअसल मूल समस्या मानसिकता और संरचना को बदलने की है। बड़े शहरों में छुआछूत के कारण नौकर-नौकरानी अपना नाम और जाति बदल-बदल कर घरों में काम करते हैं और अपने खान-पान के बारे में भी उन्हें झूठ बोलना पड़ता है। उच्च वर्गीय परिवारों में नौकरों के शौचालय अलग होते हैं। इस प्रकार जाति और वर्ग घुलमिल गए हैं। जाति, वर्ग और जेंडर के सवाल एक साथ मिलकर चलते हैं और एक दूसरे से प्रभावित होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
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