वैश्विकता एवं धर्म निरपेक्षता का शिक्षा से अन्तर्सम्बन्ध - टैगोर एवं कृष्णमूर्ति के सन्दर्भ में - Interrelationship of universalism and secularism with education - in the context of Tagore and Krishnamurti
वैश्विकता एवं धर्म निरपेक्षता का शिक्षा से अन्तर्सम्बन्ध - टैगोर एवं कृष्णमूर्ति के सन्दर्भ में - Interrelationship of universalism and secularism with education - in the context of Tagore and Krishnamurti
1 टैगोर के संदर्भ में
गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 1861 मे कलकत्ता के उस समृद्ध परिवार में हुआ था जिसने बंगाल की नवजागृति में अनुपम योगदान दिया है। उनका परिवार अनेक सांस्कृतिक व राजनैतिक सदस्यों व भारतीय प्रबुद्ध नागरिकों की गतिविधि का केन्द्रत था। उनके उपर उनके परिवार के अलावा अनेक पाश्चात्य शिक्षा शास्त्रियों के विचार का भी प्रभाव पड़ा है। इन शिक्षण शास्त्रियों में रूसों, फ्रोबेल, पेस्टालॉजी और डीवी का नाम विशेष रूप से लिए जा सकते है। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने बाल्यकाल से ही राजा राममोहन राय के ब्रह्मसमाज आन्दोलन, बंकिम चन्द्र चटर्जी के बांग्ला साहित्य और पाश्चात्य समाज प्रभाव मे पली नव संपन्न बंगाली पीढ़ी द्वारा प्राचीन मूल्यों को प्रश्नों के घेरे मे लाने का दृष्टिकोण आदि का अनुभव किया था। उनका अपना दृष्टिकोण प्राचीन व पौर्वात्य का सम्मिश्रण था।
रवीन्द्रनाथ ने 1901 में शान्तिनिकेतन में ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना की। उनके आश्रम ने इसाई तथा अंग्रजी अध्यापकों की नियुक्ति कर परम्परवादी विचारों को चुनौती दी व अनेक कठिनाइयों के बावजूद इस आश्रम को विश्व व्यापी दृष्टिकोण से सफलतापूर्वक चलाया। आगे जा कर यह विश्वीभारती में रूपांतरित हो गया और इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व स्वीकार किया जाने लगा।
वे वैचारिक दृष्टि से अद्वैतवादी थे तथा मानवीय एकता तथा विश्वाकल्याण उनके अभीष्ट प्रकृति तथा मानव को एकलय करना उनका उद्देश्य था। हिंसा से दूर मानव प्रेम पर समस्त सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक विचारों को उन्होंने अपने दर्शन में स्थान दिया। वे हमेशा भारत के भविष्य के प्रति बहुत आशाजनक थे व विभिन्नता में एकता स्थापित करने की भारत की विशेषता से अधिक प्रभावित थे। समस्त धर्मों जातियों एवं रंगों के व्यक्तियों का एकीकरण एवं मातृत्व उनका भावी सपना था। भारत की सहिष्णुनता, धर्मप्रियता तथा विदेशी तत्वों को आत्मसात करने की अनूठी शक्ति ने उन्हें भारत की महानता व उसकी भावी भूमिका का ज्ञान करवाया।
गुरुदेव रवीन्द्र नाथ नैतिक शक्ति तथा सत्य के आधार पर अपनी बात सिद्ध करना पसन्द करते थे। देश में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में आए हर उग्र प्रदर्शन की उन्होंने भटर्सना की व जलियांवाला बाग काण्डे के विरोध में ब्रिटिश सरकार को 'सर' की उपाधि वापस की।
रवीन्द्र नाथ जी का विश्व के अनेक देशों से गहरा रिश्तार था। उन्होंने जीवन अपने काल में अनेक देशों जैसे इटली, सोवियत संघ, फ्रांस व अमेरिका की अनेकों यात्राएं की। उन्होंने फासीवाद व नाज़ियों का प्रबलतम विरोध कियाव जापान में साम्राज्य वाद की तीव्र भर्त्सना की। रवीन्द्र नाथ जी ने अपने लेखों में अफ्रीका के नीग्रो प्रजाति के प्रति संवेदना प्रकट की। उन्होंने अफ्रीका को पूर्व का शिशु माना। वे एशिया तथा अफ्रीका के भावी मधुर सम्बन्धों का स्वप्न संजोये हुए थे। पश्चिमी देशों द्वारा अफ्रीका पर अधिपत्यथ स्थापित करने के विरूद्ध में उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से भी रोष प्रकट किया है।
अपनी विदेश यात्रा में रवीन्द्रनाथ तथा आईन्संटीन में एक बार पारस्परिक वार्तालाप भी हुआ। वार्तालाप यथार्थ की प्रकृति पर केन्द्रित हुआ तब रवीन्द्रनाथ ने मानवीय जगत की अपनी अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि पदार्थ का निर्माण प्रोटोन्सन तथा इलेक्ट्रोन्सश से हुआ है। इन दोनो के मध्यन रिक्ततता है किन्तुं पदार्थ ठोस दिखता है। इस प्रकार मानवता व्यक्तियों द्वारा निर्मित है फिर भी मानवीय सम्बन्धों में परस्पर अन्त सम्बन्ध है
जो कि मानव-विश्व को जीवन्ता दृढ़ता प्रदान करता है। सारा ब्रह्माण्डद भी इसी तरह हमसे जुड़ा हुआ है, यह मानवीय ब्रह्माण्ड है। सापेक्षवादी गणितज्ञ ने गुरूदेव की यह कवितामय विचारधारा मन्त्र मुग्ध हो कर सुनी। गुरूदेव ने कहा कि वे यह सिद्धान्त कला, साहित्य तथा मानव की धार्मिक चेतना के माध्यम से फलीभूत कर रहे हैं।
1940 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ को डॉक्ट्र ऑफ लेटर्स' की उपाधि से सम्मानित किया। उस समारोह मे लैटिन भाषा में उनकी प्रशस्त पढ़ी गई जिसका जवाब रवीन्द्र नाथ ने संस्कृत में दिया था। उन्होंने संस्कृत मे कहा विश्व उस समय संघर्ष में है व विज्ञान ने उसकी विभीषिका को तीव्र कर दिया है, परन्तु हिंसा कितनी भी भयावह क्यों ना हो एक दिन समाप्त निश्चित रूप से होती है। और इस हिंसा की समाप्ति पर मानव सभ्यता पुनः लक्ष्या विकास की ओर प्रवृत होगी। उनके यह आशावादी विचार व लैटिन एवं संस्कृत का यह वार्तालाप पूर्व पश्चिम एकता, विश्व बंधुत्व व वैश्विक शांति व विकासोन्मुखी विचारधारा इंगित करता है।
उन्होंने भारत की विभिन्न धार्मिक ईकाई में सामंजस्य एवं मेल जोल बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने मुखर होकर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा है कि वे भारत में अल्पसंख्याकों को देश की मुख्यधरा में एकीकृत करना चाहते थे। साम्प्रदायिकता के वे कट्टर विरोधी थे व बंगाल विभाजन के समय उठे साम्प्रदायिक हिंसा का उन्होंने डटकर विरोध किया था। उनका कहना था कि पारस्परिक वैमनस्य का कारण हमेशा धर्म नहीं बल्कि धर्म से जुड़े रीति-रिवाज़ होते है। धार्मिक प्रवृत्ति तो संप्रदायों को मिला कर रखती है। वे भारत में सामाजिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान एवं समन्वय का ऐसा वातावरण चाहते थे जिससे जातीय एवं धार्मिक वैमनस्य कम हो सके तथा साम्प्रदायिकता का अन्त हो सके।
जे. कृष्णामूर्ति के संदर्भ में
जे. कृष्णामूर्ति ने न तो किसी नये दार्शनिक सम्प्रदाय को प्रतिपादित किया है, न ही किसी पूर्व स्थापित दार्शनिक विचारधारा की व्याख्या की है और न ही किसी विचारधारा का खण्डन किया है। वस्तुतः जे. कृष्णामूर्ति किसी भी तरह के वाद से पूरी तरह से दूर थे। फिर भी मनुष्य जीवन के प्रति उनका जो एक अलग दृष्टिकोण था उसी को इनका दार्शनिक चिन्तन कहते हैं।
यद्यपि वे ईश्वर में भी विश्वास करते थे परन्तु इनका ईश्वर विभिन्न धर्मों के द्वारा बताया गया ईश्वर नहीं था। इनकी दृष्टि में प्राणी मात्र से प्रेम ही ईश्वर है। ये किसी पूर्व निश्चित सत्य में भी विश्वास नहीं करते थे। इनकी दृष्टि से सत्य मार्गविहीन भूमि है तथा व्यक्ति किसी संगठन, पुजारी या कर्मकाण्ड के द्वारा सत्य तक नहीं पहुंच सकता है। इसके लिए संबंधों के दर्पण तथा अपने स्वयं के मस्तिष्क, अवलोकन व विश्लेषण की जरूरत होती है। उनका कहना था कि सत्य वह नहीं है 'जो है' वरन् सत्य वह है जो जो है' की समझ उत्पन्न करता है। मनुष्य का क्रोध, क्रूरता, हिंसावृत्ति, निराशा, वेदना तथा दुख की समझ ही सत्य है। इनकी दृष्टि से मनुष्य जीवन अपने आप में एक असाधारण साक्षरता है। वे मनुष्य जीवन का अर्थ बिना किसी निराशा, कष्ट तथा वे झंझट के स्नेह जीवनयापन करना मानते थे। ये कर्म के सिद्धांत में भी विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि कर्म का सिद्धांत व्यक्ति को अनावश्यक सीमा में बांधता है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सीमाओं के बंधन से दूर रहकर अपनी चेतना के आधार पर अपने कार्य करने चाहिए। व्यक्ति का अनोखापन कृत्रिम न होकर चेतन बातों से उसकी स्वतंत्रता में निहित रहता है। वे विचारों की उत्पत्ति अनुभव व ज्ञान से जोड़कर उसे समय सापेक्ष मानते थे।
जे. कृष्णामूर्ति के ज्ञान को तीन भागों वैज्ञानिकता, सामूहिक तथा वैयक्तिक में विभक्त किया गया था। अनुसार वैज्ञानिक ज्ञान तथ्यों के विश्लेोषण पर आधारित होता है, सामूहिक ज्ञान मनुष्य के प्रकृति के प्रति संबंधों से संबंधित होता है एवं वैयक्तिक ज्ञान मनुष्य के अन्तःकरण से संबंधित होता है। उनकी दृष्टि से किसी भी प्रकार का ज्ञान बुद्धि से प्राप्त होता है एवं बुद्धि के निष्पक्ष होने पर ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। वे वास्तविक ज्ञान को आंतरकि सत्ता का प्रतीक व जीवन का मार्गदर्शक मानते थे एवं उनकी मान्यता थी कि इसे चेतना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
जे. कृष्णामूर्ति ने देखा कि मनुष्य भौतिक दृष्टि से साधन सम्पन्न होने के बावजूद भी दुःखी हैं एवं तृष्णा, प्रतिस्पर्धा, द्वेष व हिंसा के बोझ से दबा जा रहा है। उसका धर्म के नाम पर भी शोषण किया जा रहा है। उन्होंने मानवमात्र से बाह्य विकास के साथ-साथ आंतरिक विकास करने की अपेक्षा की एवं तड़क-भड़क के स्थान पर सादगी, तृष्णा के स्थान पर संतुष्टि तथा द्वेष के स्थान पर प्राणीमात्र के प्रति प्रेम विकसित करने का आग्रह किया।
वे एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें जाति, धर्म, समाज, संस्कृति व द्वेष आदि किसी भी आधार पर व्यक्तियों का विभाजन नहीं होना चाहिए, वरन् प्रेम के आधार पर सभी मनुष्य एक दूसरे से स्नेह सूत्र से जुड़े होने चाहिए। इसके लिए उन्होंने मनुष्यों को सादगी तथा प्रेम का उपदेश दिया । वे प्रेम को ऐसा अस्त्र मानते थे जो मनुष्यों के बीच के जाति, धर्म, संस्कृति व क्षेत्र आदि के कृत्रिम बंधनों को काट सकता है। उन्होंने जीवन की वास्तविक कटु सत्यता का सामना करने के लिए मनुष्य को व्यवसायों व रोजगार को करने की सलाह दी एवं व्यवसायों की उन्नति के लिए विज्ञान व तकनीकी के ज्ञान व उपयोग का परामर्श दिया परन्तु वे वैज्ञानिक सिद्धांत व तकनीकी के उपयोग को मानव कल्याण का साधन मानते थे, साध्य कदापि नहीं स्वीकार करते थे।
उन्होंने सम्पूर्ण मानव का विकास करने को शिक्षा के मूल उद्देश्य माना था। सम्पूर्ण मानव से उनका तात्पर्य ऐसे चेतनायुक्त मानव से है जो जाति, संस्कृति, धर्म व क्षेत्र आदि से संबंधित पूर्वग्रहों व पूर्व धारणाओं से मुक्त हो, जो घृणा व हिंसा जैसी दुर्भावनाओं से मुक्त हो तथा जो प्रेम भावना से युक्त हो।
निःसंदेह जीवन का अर्थ व उद्देश्य समझने, वैज्ञानिक बुद्धि व आध्यात्मिकता में सही समन्वय करने, नये मूल्यों व संस्कृति का निर्माण करने तथा मानव मात्र के जीवन को सुखी बनाने के लिए सम्पूर्ण मानव का सम्प्रत्यय अत्यंत महत्वपूर्ण है। जे. कृष्णामूर्ति ने इस मूल समस्या की प्राप्ति के लिए निम्न सहायक उद्देश्यों की प्राप्ति आवश्यक बतायी है-
1. संवेदनशीलता का विकास- जे. कृष्णामूर्ति के अनुसार शिक्षा के द्वारा बच्चों को विभिन्न अनुशासनों का ज्ञान कराने के साथ-साथ उन्हें संवेदनशील भी बनाना चाहिए। उनकी दृष्टि में बच्चों में प्रकृति एवं मानव मात्र के प्रति प्रेम उत्पन्न करना ही सच्ची संवेदनशीलता कही जा सकती है। इसमें घृणा, द्वेष, क्रोध, व हिंसा को कोई स्थान नहीं होना चाहिए। जब बालक भय और प्रतिस्पर्धा से मुक्त होंगे तब ही संसार में हिंसा व युद्ध नहीं होंगे।
2. सृजनात्मकता का विकास जे. कृष्णामूर्ति ने सृजनात्मकता को व्यापक रूप में लेते हुए इसका तात्पर्य शरीर, मन, व आत्मा तीनों की सृजनशीलता बतायी। उनके विचार से बालकों पर दूसरों के विचार नहीं थोपे जाने चाहिए वरन् उन्हें स्वयं निर्णय करने व कार्य करने के स्वतंत्र अवसर दिये जाने चाहिए तथा उन्हें पूरी तरह से भयमुक्त वातावरण दिया जाना चाहिए।
3. वैज्ञानिक बुद्धि का विकास - वैज्ञानिक बुद्धि से जे. कृष्णामूर्ति का तात्पर्य तथ्यों के वास्तविक स्वरूप को जानने से था। वे विज्ञान व तकनीकी शिक्षा के तनिक भी विरोधी नहीं थे। वरन वे विज्ञान व तकनीकी का मानव कल्याण के लिए सही ढंग से उपयोग करने के पक्षधर थे। परन्तु वे विज्ञान व तकनीकी का मानव के हितों के विरूद्ध प्रयोग करने के विरोधी थे।
4. आध्यात्मिकता का विकास आध्यात्मिकता के विकास से जे. कृष्णामूर्ति का तात्पर्य किसी धर्म विशेष को मानने, उसकी विचारधारा का प्रचार करने से नहीं था। उनका कहना था
कि जिस धर्म का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है वह उस धर्म का गुलाम बनकर कैसे रह गया है एवं यह एक विडम्बना ही कही जा सकती है, उनका मानना था कि किसी धर्म की गुलामी में व्यक्ति का अपना अस्तित्व संकट में पड़ गया है, आध्यात्मिकता के विकास से जे. कृष्णामूर्ति का तात्पर्य आध्यात्मिक चेतना व आत्म ज्ञान के विकास के रूप में परिलक्षित होता है।
निःसंदेह आत्मज्ञान का सम्प्रत्यय जितना सरल व सहज दिखाई देता है वह उतना सरल व सहज नहीं है। आत्मज्ञान एक व्यापक व जटिल सम्प्रत्यय है तथा इसके लिए व्यक्ति को अपने ही विचारों व कार्यों का निरंतर निरीक्षण करना होता है, उनका लेखा-जोखा रखना होता है तथा उनका विश्लेषण करना होता है जो स्वयं में एक कठिन कार्य है।
5. वैज्ञानिक ज्ञान व आध्यात्मिकता में समन्वय जे. कृष्णामूर्ति का मानना था कि मनुष्यों को वैज्ञानिक ज्ञान व उसकी आध्यात्मिक चेतना, दोनों का लक्ष्य मानव मात्र का कल्याण करना होना चाहिए।
अतः विज्ञान व तकनीकी का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में किया जाना चाहिए एवं इसके लिए विज्ञान व तकनीकी को आध्यात्मिक चेतना के साथ समन्वय बनाकर मानव कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। 6. व्यावसायिक प्रशिक्षण - जे. कृष्णामूर्ति का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका चलाने के लिए कोई न कोई व्यवसाय अवश्य करना चाहिए। अतः वे शिक्षा के द्वारा भावी नागरिकों को किसी न किसी व्यवसाय में प्रशिक्षित करना अत्यंत आवश्यक समझते थे।
7. नई संस्कृति का निर्माण जे. कृष्णामूर्ति के अनुसार विभिन्न संस्कृतियां व्यक्तियों को संकीर्णता की परिधि में सीमित कर देती है। उनके अनुसार ऐसी संस्कृति एवं मूल्यों की आवश्यकता है जो पूर्वाग्रहों व पूर्वधारणाओं से मुक्त हो एवं मानव मात्र के कल्याण की ओर प्रवृत्त रहे। अतः वे शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य में ऐसी शक्ति व अन्तः चेतना का विकास करना चाहते थे जिससे मनुष्य की चेतना पूर्वाग्रहों के विरूद्ध दृढ़तापूर्वक खड़ा हो सकें तथा नई संस्कृति व मूल्यों का निर्माण करके स्वीकृत मानव का निर्माण कर सके।
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