विनियोग एवं पूँजी ढाँचा निर्णय , सिद्धांत - Investment and Capital Structure Decisions, Theory

विनियोग एवं पूँजी ढाँचा निर्णय , सिद्धांत - Investment and Capital Structure Decisions, Theory


विनियोग निर्णयों से आशय उन निर्णयों से है, जो एक वित्त प्रबंधक को व्यवसाय के लिए आवश्यक संपत्तियों के चुनाव हेतु लेने होते है। किसी व्यापार को स्थापित करने तथा उसके विस्तार के पूर्व उन सभी विकल्पों पर गहन विचार किया जाता है, जो पैसा लगाने के लिए उपलब्ध होते है। इस क्रिया का उद्देश्य सर्वाधिक लाभप्रद विकल्प का चयन करना होता है। स्थायी संपत्तियों के संबंधन में प्रबंधकीय निर्णय जितना महत्वपूर्ण होता है उतना ही कठिन और जटिल भी होता है, क्योंकि ये निर्णय लागत और आगम के संगमों पर निर्भर होते है। पूँजी विनियोजन के ऊपर ही संस्था की सफलता व असफलता निर्भर करती है। अत: पूँजी विनियोग संबंधी निर्णय बड़ी ही सतर्कता व सावधानी से लेना चाहिए।


विनियोग निर्णय के दो भाग होते हैं पहले भाग को पूँजी बजटन कहा जाता है तथा दूसरे भाग को कार्यशील पूँजी कहा जाता है। व्यावसायिक संपत्तियों को दो भागों में बाँटा जाता है - प्रथम स्थायी संपत्तियाँ जैसे – भूमि-भवन, मशीनरी, फर्नीचर आदि जिन्हें व्यापार चलाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है

तथा द्वितीय चल संपत्तियाँ जैसे – स्टॉक, देनदार तथा रोकड़ बही आदि। स्थायी संपत्ति प्रबंधन को पूँजी बजटन के नाम से तथ चल संपत्ति प्रबंधन को कार्यशील पूँजी प्रबंधन के नाम से जाना जाता है। विनियोग निर्णयों में संपत्ति निर्णय लेने के पूर्व पूँजी की लागत का अनुमान लगाया जाता है। ताकि लाभप्रद अवसरों की पहचान करते समय पूँजी की लागत को समायोजित किया जा सके।


विनियोग निर्णय के संदर्भ में जोखिम तथा अनिश्चितता विश्लेषण का विशेष महत्व होता है क्योंकि वर्तमान विनियोग को भावी लाभों के लिए चुना जाता है। भविष्य की अनिश्चितता के कारण भावी लाभ अनिश्चित होते है, जो व्यावसायिक जोखिम उत्पन्न कर सकते हैं। विनियोग निर्णय अनिश्चितता वातावरण में विनियोग के सर्वोत्तम अवसर चुनने संबंधी निर्णय है। विनियोग निर्णयन के अंतर्गत उन संपत्तियों का चुनाव किया जाता है जिसमें संस्था की पूँजी विनियोजित की जाती है,

यह भी निर्णय लिया जाता है कि नि संपत्तियों में पूंजी का विनियोग किया जाए जिससे पूँजी सुरक्षित भी रहे और उससे लाभ भी अजित हो सके। इस प्रकार के निर्णयों के लिये विद्वानों ने निम्नलिखित सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है। 


सिद्धांत


पूँजी विनियोग संबंधी निर्णय निम्नलिखित सिद्धांतों के आधार पर लिए जाते है।


(क) पूँजी की लागत - संपत्तियों में पूँजी लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हीं संपत्तियों में पूँजी का विनियोजन किया जाए जिनकी लागत कम हो। विनियोग संबंधी सही निर्णय तभी लिया जा सकता है जबकि पूँजी की लागत का ठीक अनुमान लगाया जा सके।


(ख) व्यवसाय का आकार - व्यवसाय के आकार का भी प्रभाव पूँजी विनियोग पर पड़ता है। यदि व्यवसाय का आकार बड़ा होगा तो पूँजी विनियोग अधिक होगा, इसके विपरीत यदि व्यवसाय का आकार छोटा होगा तो पूँजी विनियोग कम मात्रा में होगा।


(ग) विनियोग प्रस्ताव की लाभदायकता का मूल्यांकन लाभदायकता का मूल्यांकन करने के पश्चात् विनियोग प्रस्तावों को उनकी लाभदायकता के क्रम में रखा जाता है।


(घ) अवसर लागतों का अनुमान - संपत्तियों में विनियोग से संबंधित निर्णय लेते समय अवसर लागतो का अनुमान भी लगाया जाना चाहिए क्योंकि पूँजीगत निर्णयों में इन लागतों का अत्यंन्त महत्व होता है।

किसी प्रस्ताव पर निर्णय के परिणामस्वरूप वैकल्पिक आय की हानि उस प्रस्ताव की अवसर लागत कहलाती है।


(ड) व्यवसाय का स्वरूप यदि व्यवसाय व्यापारिक प्रकृति का होगा तो उसमें पूँजी विनियोजन कम होगा। इसके विपरीत, यदि व्यवसाय निर्माणी प्रकृति का है तो उसमें पूंजी विनियोग अधिक होगा।


(च) तकनीकी उन्नति – यदि तकनीकी प्रगति अधिक मात्रा में हो चुकी होगी तो पूँजी विनियोजन अधिक होगा। इसके विपरीत यदि तकनीकी प्रगति कम हुई होगी तो पूँजी विनियोजन कम होगा।


(छ) विनियोग पर प्रत्यास दर का निर्धारण - किसी विनियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने से पूर्व उससे प्राप्त वांछित न्यूनतम प्रत्याय दर को निश्चित करके ही विनियोग निर्णय लिया जाता है। विनियोग पर प्रत्याय दर, पूँजी की लागत, ब्याज की दर, विनियोग में जोखिम, अनिश्चितता, प्रशासनिक लागत, अवसर लागत, प्रबंध की विनियोग नीति आदि पर विचार करके निर्धारित की जाती है।


ज) चल एवं स्थायी संपत्तियों का अनुपात - यदि पहले से ही यह नियम बनाया गया है कि स्थायी का अनुपात अधिक होगा, चल संपत्तियों का अनुपात कम होगा तो स्थायी संपत्तियों में पूँजी विनियोजन अधिक होगा। इसके विपरीत, यदि पहले से ही निर्धारित कर लिया गया है कि चल संपत्तियों का अनुपात अधिक होगा तो, चल संपत्तियाँ अधिक होंगी, स्थायी संपत्तियाँ कम होंगी। परिणामस्वरूप पूँजी विनियोग कम होगा।