जे. कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन - J. Krishnamurti's philosophy of education
जे. कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन - J. Krishnamurti's philosophy of education
शिक्षा का महत्व (Importance of Education) कृष्णमूर्ति ने नई पीढ़ी की समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने खेद प्रकट किया कि वर्तमान काल में अधिकतर बालक अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते; वे उनकी नहीं सुनते। उन्हें कोई परवाह नहीं कि वे क्या चाहते हैं। वे अपने माता-पिता के चिंतन के प्रतिमान अपनाना नहीं चाहते हैं। कृष्णमूर्ति के अनुसार उसका कारण बालकों का पालन-पोषण है। उनको प्रारंभ से ही सही शिक्षा, सही प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, परंतु कृष्णमूर्ति परंपरावादी नहीं थे। उन्होंने कहा कि हमें एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना चाहिए जो निर्भय हो, जो भूत से सहमत न हो, जिनमें बुद्धि हो और जो विवेक से काम ले सकती हो। वर्तमान शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कृष्णमूर्ति ने कहा कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है क्योंकि उसमें जानार्जन पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वह जीवनुकूल समाज को समझने के लिए पर्याप्त संवेदनशीलता और बुद्धि का विकास नहीं करती। वास्तविक शिक्षा को न केवल जानार्जन के योग्य बनाना है बल्कि संसार की ओर वस्तुगत (Objective) तरीके से देखना सिखाना है।
शिक्षा के उद्देश्य (Aims of Education)
'वास्तविक रूप से शिक्षित होने का अर्थ करोड़ों करोड़ों जो कर रहे हैं, उससे अनुरूपता, उसका अनुकरण करना नहीं है। यदि तुम वह करना चाहते हो तो करो। परंतु जो कुछ तुम कर रहे हो उसके प्रति जागृत रहो।" कृष्णमूर्ति ने नौजवानों से कहा कि शिक्षा का लक्ष्य नई पीढ़ी को एक नए प्रकार के जीवन के लिए तैयार करना है। शिक्षा न तो ज्ञानार्जन है, न परीक्षाएँ पास करना है, और न डिग्रियाँ लेना और योग्यताएँ बटोरना है। कृष्णमूर्ति के शब्दों में यह जानते हुए कि जीविकोपार्जन करना है, जिम्मेदारियों को निभाना है, उस सब का दुःख उठाना है। शिक्षा को तुम्हे बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से संसार का सामना करने में सहायता करनी चाहिए। जब मानव संसार में फैली अव्यवस्था के प्रति जागरूक हो जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। यही वास्तविक शिक्षा है।" कृष्णमूर्ति के अनुसार वास्तविक शिक्षा एक जबर्दस्त व्यवस्था का जीवन जीना है, जिसमें आज्ञापालन को समझ लिया जाता है, जिसमें यह जान लिया जाता है कि कहा अनुरूपता आवश्यक है और कहा वह पूर्णतया अनावश्यक है यह देख लिया जाता है कि कब आप अनुकरण कर रहे हैं।
शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher):
शिक्षक की भूमिका को दो रूपों में देखा जा सकता है, पहला विषय जान प्रदान करना और दूसरा विद्यार्थी को आत्म जान से प्रशस्त करना है। शिक्षा प्रक्रिया में निर्मित विषयों के ज्ञान के साथ-साथ बुद्धि के विकास और मूल प्रवृत्तियों के व्यवहार में अंतर्दृष्टि उत्पन्न की जानी चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में यह सब नहीं होता है। निरर्थक प्रतिमान जीवन (Meaningless Standardized ife) के प्रति नई पीढ़ी में विद्रोह को कृष्णमूर्ति स्वाभाविक मानते हैं।
परंतु प्राचीन भारतीय परपरा के विरुद्ध कृष्णमूर्ति गुरु और शिष्य के साध को आवश्यक नहीं मानते। उन्होंने कहा है, "शिक्षा का अर्थ है सीखना परंतु शिक्षा का साधारणतया स्वीकृत अर्थ है किसी का, किसी गुरु का किसी व्यक्ति का अनुसरण करना है। ऐसी स्थिति में गुरु और शिष्य दोनों ही नहीं सीख रहे होते हैं।"
स्वतंत्रता और अनुशासन (Freedom and Discipline) :
कृष्णमूर्ति के अनुसार सही शिक्षा की प्रक्रिया में पूर्ण स्वतंत्रा होनी चाहिए ताकि मस्तिष्क के संपूर्ण सामर्थ्य का प्रयोग किया जा सके। शिक्षा को पूर्ण अवसर प्रदान करने चाहिए जिससे बालक स्वयं की अभिव्यक्ति कर सके शिक्षित व्यक्ति को इस संसार में बुद्धिमत्ता और समझदारी का जीवन जीना चाहिए। कृष्णमूर्ति के शब्दों में शिक्षा हमें समझदार, अयांत्रिकऔर बुद्धिमान बनाने में सहायक होनी चाहिए।' शिक्षा बुद्धिउत्पन्न करती है जो इस जगत में काम करती है। शिक्षा को वर्तमान जीवन की पूर्ण चेतना प्रदान करनी चाहिए। उसे हमें भूत और भविष्य के विचारों से स्वतंत्र वर्तमान में पूर्णतया स्वतंत्र बौद्धिक जीवन व्यतीत करने में सहायता करनी चाहिए। कृष्णमूर्ति के अनुसार प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को संसार को अपनी आखों से देखना अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करना और पूर्ण स्वतंत्रता से कर्म करना आना चाहिए। उसे किसी भी गुरु संस्था, पुस्तक विचारधारा का अधानुसरण नहीं करना है। उसे आत्मस्थित होकर स्वयं अपनी बुद्धिसे वर्तमान में रहकर जीवन जीना है।
निष्कर्ष : महान चिंतक दार्शनिक और समाज सुधारक जे कृष्णमूर्ति के अनुसार सच्ची शिक्षा वह है जो अन्तः मन का विकास करे तथा अन्तः चेतना जागृत करे। शिक्षा के द्वारावे मनुष्य के सर्वागीण विकास पर बल देते थे तथा संवेदनशैलता, सृजनात्मकता, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि का विकास शिक्षा का उद्देश्य मानते थे। उन्होंने शिक्षा द्वारा बच्चों में नई संस्कृति और नए मूल्यों का निर्माण करने की क्षमता को विकसित करने पर बल दिया है। उन्होंने शिक्षा के द्वारा आत्मजान, आत्म चेतना, आत्मबोध के सम्प्रत्यय को परिभाषित किया। उन्होंने पाठ्यचर्या में विज्ञान, तकनीकी, व्यावसायिक प्रशिक्षण, कलाऔरसंगीत को स्थान दिया है। अनुशासन एवंस्वतंत्रता आत्मज्ञानकेलिए आवश्यक है। शिक्षक पूर्ण एकीकृत मानव होना चाहिए। उसे बच्चों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। शिक्षक को बच्चों पर पूर्व निश्चित मूल्य एवं सिद्धात थोपने नहीं चाहिए। उनके अनुसार विद्यालय का वातावरण शांत होना चाहिए। उनके इन्हीं आध्यात्मिक विचारों के आधार पर कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन की स्थापना की गई है।
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