जिद्दू कृष्णमूर्ति , जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन - Jiddu Krishnamurthy, J. darshan of krishnamurti

जिद्दू कृष्णमूर्ति , जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन - Jiddu Krishnamurthy, J. darshan of krishnamurti

प्रस्तावना : आधुनिक युग के महान दार्शनिक और श्रेष्ठ चिंतक जे कृष्णमूर्ति का जन्म सन 1895 में हुआ था। उन्होंने आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा के आधार पर अपने दर्शन को स्पष्ट किया। जीवन के आध्यात्मिक पक्ष के साथ वे जीवनभर प्रयत्नशील रहे और सन 1986 में वे इस नश्वर संसार से चले गये।


जे कृष्णमूर्ति क्रांतिकारी विचारक थे। उन्होंने हर प्रकार की बाहय प्रामाणिकता (Authority) का निषेध किया, चाहे वह व्यक्ति की हो, या पुस्तक की या परंपरा की उनका विचार था कि किसी व्यक्ति, ग्रंथ या परंपरा द्वारा हमें सत्य या यथार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। इसके लिए हमें स्वयं प्रयत्न करना होगा। वे धार्मिक संप्रदायों और संगठनों के भी विरुद्ध थे, क्योंकि ये सत्य की प्राप्ति में हमारी सहायता नहीं कर सकते।


जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन


1) आत्म-ज्ञान का महत्व (Importance of self-knowledge): कृष्णमूर्ति के अनुसार हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम स्वयं को जाने। अपने को जानने से तात्पर्य अपरिवर्तनशील अनश्वर और चेतन आत्म-तत्व को जानना नहीं है। इसका अर्थ यह जानना है कि हम क्षण-क्षण क्या है अर्थात् हम विभिन्न क्षणों में जो अनुभव करते हैं, सोचते हैं, कार्य करते हैं, उन्हें हमें जानना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हम सजग और ध्यान युक्त रहें। अपने को पूरी तरह से जानने के लिए सदैव अपना निरीक्षण करते रहने की जरूरत है।


2) ध्यान और एकाग्रता (Meditation and Concentration):- वह ध्यान और एकाग्रता के मध्य अंतर करते हैं। एकाग्रता ऐसा ध्यान है, जिसके लिए व्यक्ति विशेष संकल्पपूर्वकप्रयत्न करता है। वह किसी वस्तु पर कुछ समय के लिए अपना मन लगाने का प्रयत्न करता है।

कृष्णमूर्ति यथार्थ को जानने के लिए एकाग्रता को अस्वीकार कर देते हैं। एकाग्रता मानसिक ददव या संघर्ष उत्पन्न करती है। दबंदन से चित्त अशांत हो जाता है। अशांत मन को यथार्थ की सम्यक चेतना नहीं हो सकती।


ध्यान के द्वारा सत्य की चेतना हो सकती है। ध्यान इच्छा-शक्तिरहित और प्रयासविहीन होता है। किसी वस्तु की और ध्यान देने का अर्थ है, मन का उस पर बिना इच्छा जन्म प्रयत्न के लगना। कृष्णमूर्ति का असली मतलब यह है कि किसी क्षण केवल चेतना विशेष का अस्तित्व है। तब जाता और जय अथवा विषयी और विषय का भेद लुप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, कोई एक फूल देखता है। क्षणभर वह उसका रंग देखता है, फिर उसका ध्यान उसकी खशबू की और चला जाता है। अगले क्षण वह किसी चिड़िया की चहचहाहट सुनता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उसे जानबूझ करबह चुनाव नहीं करना चाहिए कि बह किस चीज की और ध्यान दे तथा किसी और ध्यान न दे, न ही उसे किसी एक चीज पर अपने मन को केन्द्रित करना चाहिए।


ध्यान मन की सचेष्ट और प्रयोजनमूलक क्रिया है। ध्यान के द्वारा मन किसी वस्तु विशेष पर कुछ समय के लिए केन्द्रित किया जाता है। ध्यान में व्यक्ति मन को किसी वस्तु पर टिकाने की कोशिश करता है, क्योंकि मन स्वभावतः चचल है। अतः वह प्यान कर्ता के प्रयत्न के बावजूद इधर-उधर भटकता है। ध्यानकर्ता मन की भटकत को व्यवधान के रूप में लेता है, और इन व्यवधानों को दूर करने की चेष्टा करता है। ध्यानकर्ता ध्यानकी क्रिया में जितनी प्रगति करता जाता है, व्यवधान उतने कम पड़ते जाते हैं।


3) इच्छा और चेष्टारहित (Desire and lack of mood):- जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में जब आप अपने बारे में जानते है अपना निरीक्षण करते हैं, यह देखते कि आप कैसे चलते हैं, किस प्रकार खाते हैं, क्या कहते हैं, गप्प, घृणा ईर्ष्या-यदि अपने में इन सबको बिना किसी चुनाव के देखते हैं, तो वह ध्यान का भाग है।"


4 ) घेतना की संपूर्णता (Completeness of Consciousness): ध्यान की अगली विशेषता चेतना की संपूर्णता है। यहाँ इंन्द्रियों का बटबारा नहीं है। व्यक्ति संपूर्ण मन से इंन्द्रियों के विभाजन के बिना, प्रस्तुत विषयों का अनुभव करता है। उदाहरण के लिए आप बगीचे का कोई फूल देखते हैं और किसी चिड़िया की आवाज भी सुनते हैं। दोनों अनुभव आपको एक साथ होते हैं उस समय आपको उन दोनों के अंतर की चेतना नहीं होती, अर्थात् आपको इसकी चेतना नहीं होती कि मैं फूल विशेष देख रहा हूँ या ध्वनि विशेष सुन रहा हो मात्र समन्वित अनुभव है, जिसका बोध आप पूरे मन से सावधान होकर कर रहे हैं।


5) शुद्ध अनुभूति (Pure Feelings) :- ध्यान की अवस्था में जो चेतना या अनुभूति होती है उसे शुद्ध कहा जा सकता है। इसको शुद्ध कहने का तात्पर्य यह है कि चेतना विशेष प्रत्ययात्मक नहीं होती, यानि बुद्धि के यंत्र से विशेषित या निर्धारित नहीं होती।

सामान्य अवस्था में हमारे अनुभव बुद्धि के प्रत्ययों द्वारा निर्धारित होते हैं। उदाहरणार्थ आप कमल का फूल देखते हैं। आप जानते हैं कि यह एक विशेष प्रकार का फूल है जिसे कमल कहते हैं। इसका विशेष रूप-रंग है। आपको इसकी भी चेतना रहती है कि आप इसे विशेष समय और स्थान में देख रहे हैं। आप यह भी जानते हैं कि कमल आपसे भिन्न और बाहर है, किंतु ध्यान की दशा में कमल का अनुभव शुद्ध होता है। इसका अर्थ यह है कि मात्र कमल का अनुभव होता है। देखने वाले आप और देखने के विषय कमल का भेद नहीं रहता। दूसरे शब्दों में जाता और जय का द्वैत समाप्त हो जाता है।


6) आत्मनम् विधि (Atmanam Vidhi) ध्यान करने के लिए किसी विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं है। जब भी हम फुर्सत में हो ध्यान कर सकते हैं। इसकी सहायता से हम अपने को जान सकते हैं, अपनी इस समझ के सुपरिणाम जैसे अहम् और आसक्ति के पाशों से क्रमिक मुक्ति तथा अनासक्ति, सरलता, शान्ति, प्रेम, आनंद और करणा के भावों में उच्चतर वृद्धि के रूप में अनुभव किए जा सकेंगे। ध्यान से मन की स्वतंत्रता में वृद्धि हो सकेगी तथा उसका स्व में सिकुड़ा दायरा विश्वाभिमुख होगा।


7) चयनविहीन चेतना (Conselective Consciousness) चेतना के चुनावरहित होने का आशय यह है कि किसी विज्ञान का चुनाव नहीं करना चाहिए। विज्ञान शब्द का प्रयोग यहां व्यापक अर्थ में किया गया है। विज्ञान से तात्पर्य हर एक मानसिक दशा से है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो, या संवेग या स्मृति, या कल्पना, या अन्य कोई चेतन अवस्था। हमें जानबूझकर कोई विज्ञान न तो मन में लाना चाहिए, न रोकना चाहिए, न मन से निकालना चाहिए। हमें धीरे-धीरे मन की वृत्ति ऐसी करनी चाहिए कि मन विज्ञान विशेष को जो इसमें किसी समय उपस्थित होता है, पूरे ध्यान के साथ ग्रहण करें। लेकिन, मन उस विज्ञान को न तो रोके, न निभाए। हमें उसकी तरफ पूरा ध्यान देना है जब तक वह हमारे चित्त स्वतः टिकता है। इस प्रकार की मानसिक वृत्लि सभी तरह के विज्ञानों के प्रति अपनानी है चाहे वे सुखद हो या दुःखदा


8) जान का स्वरूप (Nature of knowledge) कृष्णमूर्ति के अनुसार चयनविहीन चेतना या जान ही शुद्ध जान है वह विचार द्वारा प्रतिबन्धित नहीं है।

यह हमारी चेतना के साधारण रूप से भिन्न है जो अधिकांशतः बिचार द्वारा निर्धारित होता है। कृष्णमूर्ति ने चेतना के जिस रूप की बात की है वह न केवल किसी विज्ञान या कर्म की चुनावरहित और संपूर्ण चेतना है बल्कि वह विचार दद्वाराअनिर्धारित भी है।


9 ) शब्द और यथार्थ में अंतर (Difference in word and Reality) शुद्ध चेतना विचारातीत है। यह भाषा से भी परे है। शुद्ध चेतना अशाब्दिक है। कृष्णमूर्ति बलपूर्वक शब्द और यथार्थ के बीच भेद करते हैं बार-बार कहते हैं कि शब्द यथार्थ नहीं है। यथार्थ शुद्ध चेतना है जो अवक्तव्य है अर्थात् उसे व्यक्त करने का प्रयास इसकी यथार्थता को विकृत कर देगा। सत्य या यथार्थ विचारऔर भाषा दोनों से परे है।


10) वर्तमान का महत्व (Importance of present) कृष्णमूर्ति जीवन के वर्तमान को महत्वपूर्ण मानते हैं। हमारे जीवन का वर्तमान क्षण प्रिय या अप्रिय, भूत या भविष्य से संबन्धित हो सकता है, अथवा किसी ऐसी चीज से जो उस समय घट रही हो। यदि हम वर्तमान में पूरी तरह से जीते हैं तो जीने (जो वस्तुतः कोई शुद्ध चेतना है तथा क्षण विशेष के मध्य अंतर नहीं किया जा सकता है।


(11) प्रयोजन अनावश्यक है (Unnecessary Purpose) जीवन में प्रयोजन या लक्ष्य के लिए स्थान नहीं है, क्योंकि लक्ष्य में कोई न-कोई भविष्यकालीन वस्तु पूर्वकल्पित होती है जिसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न किया जाता है।

कृष्णमूर्ति का मानना है कि शुद्ध चेतना में से बुद्धिमत्ता या समझ प्रस्फुटित होती है। वह बुद्धिमत्ता शब्द का प्रयोग विशेष अर्थ में करते हैं। बुद्धि को साधारणतः विचार के संदर्भ समझा जाता है। कृष्णमूर्ति के अनुसार बुद्धिमत्ता विचार से भिन्न है। यह प्रत्यययात्मक, युक्तिपूरक या विश्लेषणात्मक नहीं है। यह एक प्रकार की अपेक्षा और प्रयासविहीन समझ है जो बंदव और उलझन रहित है। बुद्धिमान व्यक्ति प्रज्ञ है।