जॉन डीवी , डीवी का दर्शन - John Dewey, Dewey's Vision

जॉन डीवी , डीवी का दर्शन - John Dewey, Dewey's Vision


परिचय:


शिक्षाविद जॉन डीवी महोदय का जन्म अक्टूबर 1859 में हुआ। स्नातक की परीक्षा में उन्होंने दर्शन में विशेष योग्यता दिखाई। विभिन्न विश्वविद्यालयों में वह दर्शन के शिक्षक रहे। शिकागो में पढ़ाने के काल में उनका ध्यान शिक्षा की और गया। इसलिए उन्होंने एक प्रयोगशाला स्कूल (Laboratory School) खोल दिया। इस स्कूल के खोलने में उनका प्रयोजन यह था कि वह दर्शन, मनोविज्ञान व शिक्षा के विषयों का प्रयोगशाला से ठीक ऐसा ही संबंध स्थापित कर दें जैसा कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का प्रयोगशाला से होता है। डीवी को हम मुख्यतया प्रयोजनवादी मानते हैं। यद्यपि उनके दर्शन पर गेल तथा जेम्स दोनों का ही प्रभाव स्पष्ट व्यक्त है। उन्होंने अमेरिका से बाहर भी शिक्षा पर वक्तव्य दिये है, विशेष कर चीन में तथा उनका प्रभाव विश्वव्यापी है।


बिल ड्यूरान्ट के शब्दों में बाल्ट व्हाइटमैन की कविता की भाँति स्वाभाविक रूप से, उनका दर्शन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का है। वैसे स्कूल के सामाजिक पक्ष, प्रजातंत्र के दार्शनिक पक्ष तथा मूल्यों (Values) आदि के क्षेत्रों में उन्होंने महत्वपूर्ण मौलिक विचार प्रकट किए हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक हैं- हाउ वी थिंक (1910), डेमोक्रेसी एण्ड एज्यूकेशन (1916), रीकास्ट्रक्सन इन फिलासफी (1920) आदि। उनकी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकों में से दी स्कूल एण्ड दी सोसायटी तथा स्कूलऑफ टुमारो आदि है।


डीवी का दर्शन (Dewey's Philosophy):


डीबी मूल्यों को शाश्वत नहीं मानते। यथार्थ भी इनके लिए परिवर्तनशील है। सत्य वही है जो व्यवहार की कसौटी पर खरा उतरे। दर्शन सभी ज्ञान की शाखाओं का सामान्यीकरण है।

डीबी स्पेन्सर की भाँति विकासबाद (Evolution) में विश्वास करते हैं तथा विल ड्यूरान्ट के अनुसार प्रकृतिवादी हैं। वास्तव में 'वैज्ञानिकों तथा प्रयोगशील विद्वानों के वस्तुओं के परिवर्तन संबधी क्षेत्र तथा अपरिवर्तित शाश्वत सत्यों के दार्शनिक क्षेत्र में एक खाई स्थापित रही आई है। शाश्वत सत्यों से ओतप्रोत स्कूल में प्रयोगात्मक सत्य को स्थान भौतिकवादी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण मिलना कठिन हो रहा है। डीबी के अनुसार कोई भी सिद्धात तथा आदर्श शाश्वत सत्य नहीं रह सकता, वह तो केवल जीवन को नियंत्रित तथा नैतिक रखने के लिए प्रेरणा-स्वरूप है। विकास ही नैतिक है तथा वही आदर्श है।


प्रयोगात्मक तर्कशास्त्र (Experimental Logic) ही सबसे उचित है। प्रयोगों के द्वारा ही हम रूढ़ियों के बंधन से मुक्त होकर जीवन के सत्य का दर्शन कर सकते हैं। प्राकृतिक विज्ञान तथा नैतिकशास्त्र की दूरी ही समस्त बुराइयों की जड़ है। कोई भी ज्ञान कीशाखा चाहे व रसायनशास्त्र हो या भौतिकशास्त्र, जब वह मनुष्य के दुखों के कारण की खोज करती है, तब वह नैतिकता का स्रोत हो जाती है।" दर्शन तो मूल रूप से आलोचना है, आलोचना आलोचना"।


जीवन की समस्याओं को सुलझाने से उत्पन्न दर्शन एक जीवित वस्तु है। मनुष्य काल तथा स्थान के अनुकूल सत्यों (Truths) की रचना कर सकता है। डीवी केवल ईश्वर (God) को ही शाश्वत मानते है।