बाल अपराधी या किशोर अपराधी - juvenile delinquent

बाल अपराधी या किशोर अपराधी - juvenile delinquent

बाल अपराधी या किशोर अपराधी अल्पवयस्क बालक होते है जो अपनी संस्कृति और समाज के नियमों तथा आचार संहिता की अवहेलना कर ऐसे समाज विरोधी कार्य करते हुए पाए जाते हैं कि अगर जिन्हें कोई वयस्क व्यक्ति करे तो उसे कानूनी रूप से अपराधी की संज्ञा दी जाती है। बाल अपराधी बनने के पीछे जो कारण तथा कारक कार्य करते हैं वे वस्तुतः वातावरण जन्य ही होते है। बाल अपराध बहुत सीमा तक अस्वस्थ वातावरण और प्रतिकूल परिस्थितियों की उपज हैं। अतः इसकी रोकथाम हेतू ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसी वातावरणजन्य परिस्थितियों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाए जिनकी प्रतिक्रिया स्वरूप बालक कुसमायोजन के शिकार होकर विद्रोह पर उतारु हो जाते हैं अथवा समाज विरोधी शक्तियों में फंसकर अपराध की दुनिया को अपना लेते है। इनके अपराध करने पर इन्हें कठोर सजा या जेल में ठूंसने की व्यवस्था की बजाय उनके आचारण में सुधार लाने की प्रक्रिया पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए। उचित व्यवहार, स्वस्थ वातावरण, और उपयुक्त शिक्षा से इन भटके हुए बालक या किशोर अपराधियों को सही मार्ग पर लाना ही बाल अपराध का उचित इलाज सिद्ध हो सकता है।


दृष्टिदोषों से "युक्त दिव्यांग विद्यार्थियों से अभिप्राय उन बालकों से हैं जिनमें इस प्रकार के दृष्टिदोष पाये जाते हैं जिनकी वजह से इनकों किसी वस्तु का ठीक प्रकार प्रत्यक्षीकरण करने में काफी परेशानी का अनुभव करना पड़ता हैं। इस प्रकार की दिव्यांगता के पिछे वंशानुक्रम तथा वातावरण जन्य दोनों प्रकार के कारण हो सकते हैं। इन बालकों के उचित समायोजन तथा शिक्षा हेतु हमें सर्वप्रथम इनके दृष्टदोषों की प्रकृति से अवगत होकर इन्हें इनकी दो मुख्य श्रेणियों पूर्ण या काफी अंधे बालक तथा आंशिक रूप से अंधे और न्यून दृष्टि वाले बालकों में विभक्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। पहली श्रेणी के बालकों को जहां अंध विद्यालयों द्वारा शिक्षा देना ठीक रहता है वहीं दूसरी तरह के विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में सामान्य विद्यार्थियों के साथ कुछ अतिरिक्त व्यवस्था द्वारा शिक्षा देने का प्रबन्ध किया जा सकता है।


श्रवण दोषों से युक्त दिव्यांग विद्यार्थियों से अभिप्राय उन विद्यार्थियों से है जिनमें ऐसे श्रवण दोष पाये जाते है जिनके कारण उन्हें या तो कुछ भी सुनाई नहीं देता अथवा कम या अस्पष्ट सुनाई देता है।

इस दृष्टि से इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है: बहरे बालक तथा ऊंचा सुनने वाले बालक। इन विद्यार्थियों को इस प्रकार के दोषों के लिए वंशानुगत तथा वातावरण जन्य दोनों ही प्रकार के कारण उत्तरदायी हो सकते है। इन विद्यार्थियों की शिक्षा तथा समायोजन की दिशा में सहायता पहुँचाने हेतु जहां बहरे बालकों को मूल एवं बधिर विद्यालयों में भेजना ठीक रहता है। वहीं ऊंचा सुनने वाले विद्यार्थियों को सामान्य बालकों के साथ सामान्य विद्यालयों में कुछ विशेष उचित प्रबन्ध करते हुए शिक्षा देना उपयुक्त रहता है।


मांसपेशी एवं अस्थियों से युक्त दिव्यांग विद्यार्थी से अभिप्राय उन विद्यार्थियों से होता है जिनकी मांसपेशियों एवं अस्थियों में ऐसे विकार तथा दोष जाए जाते है जिनके कारण उन्हें विभिन्न प्रकार के अंग संचालन तथा क्रियात्मक कार्यो को संपादित करने में काफी कठिनाई होती है और परिणाम स्वरूप शिक्षा तथा समायोजन हेतु अनेक समस्याओं का शिकार होना पड़ता है।

इन विद्यार्थियों के ऐसे दोषों के लिए केवल आनुवांशिकता को कारण नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इनका संक्रमण जीन्स एवं क्रोमोसोम के माध्यम से नहीं हो सकता। गर्भाधान के बाद मां के गर्भ में मिलने वाला वातावरण तथा जन्म के समय और पश्चात क्रियाशील प्रतिकूल वातावरणजन्य परिस्थितियां इस प्रकार की विकलांगता के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। इन बालकों की शिक्षा और समायोजन सम्बन्धी आवश्यकता की पूर्ति सामान्य विद्यालयों में सामान्य विद्यार्थियों के साथ भली-भांति हो सकती है।


मानसिक रूप से दिव्यांग विद्यार्थी से अभिप्राय उन विद्यार्थियों से है जिनमें औसत से कम बुद्धिलब्धि की उपस्थिति के अतिरिक्त समायोजित व्यवहार सम्बन्धी अक्षमताएं भी इस स्तर तक होती है कि उन्हें उनके समायोजन, विकास तथा कल्याण हेतु विशेष देखभाल तथा शिक्षा की जरूरत पड़ती है।

मानसिक दिव्यांगता या मंदबुद्धि को उसकी प्रकृति के हिसाब से चार मुख्य वर्गों में बांटा जा सकता है। शैक्षिक और समायोजन दृष्टि से जहां अल्प तथा मध्यम वर्ग के मानसिक मंदन से युक्त बालकों को क्रमशः शिक्षा ग्रहण करने योग्य तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने योग्य समझा जाता है, वहीं तीव्र तथा गहन मानसिक मंदन के शिकार बालकों को न तो शिक्षा दी जा सकती है और न ही प्रशिक्षण। इनके लिए विशेष रूप से देखभाल की जरुरत होती है जिससे इन्हें वातावरण के साथ समायोजित रहने और जीने हेतु मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने में उचित सहायता दी जाती रहे।


अधिगम की दृष्टि से अक्षम या दिव्यांग विद्यार्थी से अभिप्राय उन विद्यार्थियों से है जो अधिगम की दृष्टि से इतने अधिक अक्षम या दिव्यांग होते हैं कि उन्हें अधिगम के क्षेत्र में होने वाली अपनी कमियों तथा अक्षमताओं से निपटने के लिए विशेष प्रकार के ध्यान एवं शिक्षा की जरुरत पड़ती है। इस प्रकार की अक्षमता या दिव्यांगता के पीछे जो कारण कार्य करते हैं उन्हें मोटे तौर पर तीन मुख्य अंगों वंशानुगत कारण जैविक या शारीरिक कारण तथा वातावरण सम्बन्धी कारणों में बाँटा जा सकता है। इस प्रकार की अक्षमता का निदान करने हेतु परीक्षणयुक्त प्रविधियों (जैसे प्रामाणिक निदानात्मक परीक्षण, योग्यता परीक्षण या प्रक्रिया परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण तथा दैनिक मूल्यांकन प्रणाली) तथा परीक्षण रहित प्रविधियों (जैसे निरीक्षण, रेटिंग स्केल, चैकलिस्ट, साक्षात्कार आदि) का प्रयोग किया जा सकता है। इन विद्यार्थियों की शिक्षा हेतु अलग विद्यालयों या कक्षाओं की बात उचित नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध शैक्षिक ढ़ांचे में इनकी शिक्षा के प्रबन्ध किए जाने चाहिए। विद्यार्थी विशेष में जिस प्रकार की अधिगम अक्षमता है उसका उचित निदान होने के पश्चात ऐस सभी उपचारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए जिनसे विद्यार्थी की अधिगम अक्षमताओं को दूर करने हेतु वांछित प्रयत्न किए जा सके।