ज्ञान और कौशल - knowledge and skills

ज्ञान और कौशल - knowledge and skills


सत्य जैसा है वैसा जानना ही ज्ञान है सुकरात ज्ञान की अवधारणा में हमने समझा चाहे ज्ञान स्वयं का हो, ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निष्पादित हो या जड़ जगत की वस्तुओं का ज्ञान हो हर परिप्रेक्ष्य में अपनी अवधारणा के साथ ज्ञान पर चिंतन वांछनीय है।


ज्ञान की मीमांसा के साथ दर्शन का हमेशा से ध्यान कौशल के विभिन्न स्वरूप व कौशल विकास में विहीत ज्ञान पर भी रहा है। सुकरात ने अपने शिष्य प्लेटो के साथ परिचर्चा में कौशल पर निरंतर विचार करते हुए कहा था की कौशल चार प्रकार के होते हैं


• मेडिसिन (औषधीय)


• फिजिकल ट्रेनिंग (शारीरिक)


• जजिंग (न्याय)


• रेगुलेटिंग (विनियमन)


उन्होंने प्रथम दो कौशल को एक समूह मानकर कहा था कि ये कौशल शारीरिक प्रशिक्षण की ओर केन्द्रित है व बाद के द्वय कौशल को दूसरे समूह में सम्मिलित करके कहा कि उक्त दोनों के आत्मिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इस पर आगे चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि औषधीय कौशल का उपयोग चिकित्सकीय पद्धतियों के लिए है इसलिए यह कौशल स्वास्थ्य संवर्धन के लिए प्रयोग होता है। अतः कहा जा सकता है कि कौशल का उद्देश्य हमेशा उसके ज्ञान में रहता है। अतः ज्ञान व कौशल एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित है। आदर्शवादी विचारक प्लेटो ने अपने संवाद में ज्ञान व कौशल को एक दूसरे में परस्पर व्याप्त मानते हुए एक दूसरे से जुड़ा हुआ बताया है।


अरस्तू जो ज्ञान के आनुभविक सत्यापन करने के प्रवर्तक रहे हैं, उन्होंने आत्मन के दो भाग बताऐं हैं। पहला है वैज्ञानिक भाग व दूसरा है परिकलन (calculating) भाग। परिकलन भाग व्यावहारिक सोच रखता है व उसे सत्य व मिथ्या का ज्ञान कर्म के द्वारा होता है। वैज्ञानिक भाग सैद्धांतिक सोच पर आधारित व उन सिद्धांतों पर ही सत्य व मिथ्या से साक्षात्कार करता है। अरस्तु ने ज्ञान के पांच गुण बताऐं हैं।


• टेकनेक


• एपिस्टिम


• फ्रोनेसिस


• सोफिया


• नुस


वे प्रथमत: दो ज्ञानों के गुणों के बीच भिन्नता बताते हुए कहते हैं कि ये ज्ञान वे वैज्ञानिक ज्ञान हैं जो बदलते नहीं हैं व जिन्हेंप प्रदर्शित किया जा सकता है। अतः ये दो प्रथम गुण परस्पर सहयोगी एवं पूणता में प्रदर्शनीय है।


ज्ञान और कौशल पर चर्चा हम डीवी के यांत्रिकवाद में भी देख सकते हैं। उनके अनुसार विचार का प्रयोजन मानवीय रूचियों को संतुष्टि प्रदान करना है। विचार अनुभव में अन्तरनिहीत होता है व अनुभव से परे कोई विचार नहीं होता है। इस तरह सत्य निरपेक्ष ना होकर अनुभव आश्रित है। विचार की सफलता उसके कार्यात्मक परिणाम से लगाया जा सकता है क्योंकि सत्य का मूल्य वह है जो क्रिया में प्रस्फुटित होता है। उनके विचारों को कारणवाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद इत्यादि कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मस्तिष्क व ज्ञान को उपकरण के रूप में प्रयोग किया है। अतः ज्ञान का उपयोग कौशल के प्रयोग व विकास में किया है। कौशल विकास के संदर्भ में प्रयोगवाद भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डीवी ने ज्ञान की प्रक्रिया को वैज्ञानिक प्रयोगशाला की अनुरूपता में कार्य करने वाला माना है। इसीलिए यदि ज्ञान का पूर्ण उपयोग करना है

तो वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करना पड़ेगा। ज्ञान व कौशल का यह अन्योन्याश्रित संबंध डीवी के प्रयोग किलपैट्रिक के प्रयोजनवाद में भी देखा जा सकता है। किलपैट्रिक ने दर्शन को जीवन के संघर्ष के साथ जीवन जीने के लिए बताया है। वैज्ञानिक प्रतिमानों से हर ज्ञान की व्याख्या की जा सकती है। सामाजिक अन्तवः क्रिया से ही अन्तरनिर्भरता का विकास होता है जो शैशवास्था से लेकर जीवन पर्यन्त चलता है। इस तरह वैज्ञानिक विधि का प्रयोग कर हर व्यक्ति ज्ञान का सदुपयोग कर सकता है। किलपैट्रिक की मान्यता डीवी से मिलती जुलती है तथा अनुभव से सीखने व कार्य करके स्वयं ज्ञान अर्जित करने पर बल देती है।


भारतीय दार्शनिक निकायों पर ध्यान दिया जाए तो पातंजलि के योग सूत्र में ज्ञान की प्राप्ति, मुक्ति एवं विकास के लिये योगाभ्यास और प्रक्रियाओं के उपयोग की बात अष्टांगिक योग साधन में दृष्टिगोचर होती है। नैतिक, स्व नियमन व अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देकर हम अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान दे सकते हैं। इस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य संवर्धन के साथ ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस पातंजलिकृत योगसूत्र में शारीरिक कौशल व ज्ञान का अद्भुत संगम अष्टांग मार्ग है जिसका अनुपालन एवं अनुशीलन परम् सत्ता को पाने के लिए सर्वधा उपयुक्त है।