कोठारी कमीशन - Kothari Commission
कोठारी कमीशन - Kothari Commission
कोठारी कमीशन की नियुक्ति की आवश्यकता
1952 तक जितने भी आयोग नियुक्त किए गए किसी भी आयोग में शिवा के समस्त स्तरों पर विचार नहि किया गया था। अतः इस कमी को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 को एक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की जिसके अध्यक्ष डॉ. डी. एस. कोठारी हुए। अत: कोठारी महोदय के नाम पर ही इस आयोग का नाम कोठारी आयोग पड़ा।
अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी
सचिव: श्री जे.पी. नायक
सह-सचिव श्री. जे. एफ. मैक्डूगल
आयोग के सुझाव एवं संस्तुतियाँ -
आयोग ने निम्नलिखित सुझाव व संस्तुतियाँ दीं।
1) शिक्षा एवं राष्ट्रीय लक्ष्य:
आयोग ने निम्न राष्ट्रीय लक्ष्यों का उल्लेख किया
1. शिक्षा और उत्पादकता
2. शिक्षा और सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता
3. शिक्षा और आधुनिकीकरण
4. शिक्षा और सामाजिक नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य
आयोग के अनुसार राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण है इसलिए शिक्षा में महत्वपूर्ण एवं आवश्यक सुधार होना अत्यंत आवश्यक है।
२) शिक्षा प्रणाली की संरचना:
1. एक से तीन वर्ष की पूर्व प्राथमिक शिक्षा
2. सामान्य शिक्षा की अवधि १० वर्ष व निम्न माध्यमिक स्तर की शिक्षा २ या ३ वर्ष में विभाजित होगी।
3. उच्च शिक्षा के अन्तर्गत तीन वर्ष के डिग्री कोर्स तथा २-३ वर्ष का स्नातकोत्तर उपाधि का पाठ्यकम हो।
4. उच्च माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की भी व्यवस्था की जाए।
३) शिक्षा सुविधाएँ:
1. अवकाश कम कर कार्य दिवस बढ़ाये जाएँ।
2. कार्य के घंटे बढाई जाय तथा परीक्षा के दिनों की संख्या घटाई जाए।
3. छात्रों को वाचनालयों, पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं का समुचित उपयोग करने हेतु छात्रों को प्रोत्साहित किया जाए।
4) स्कूल पाठयक्रम
1) प्राथमिक स्तर के लिए मातृभाषा, गणित, विज्ञान, स्वास्थ्य शिक्षा, सामाजिक शिक्षा, सामाजिक विषय व सृजनात्मक क्रियाओं को पाठ्यक्रम का अंग बनाया जाए।
2) कक्षा ५-७ तक अन्य विषयों के अतिरिक्त दो भाषाएँ, कला, नैतिक शिक्षा व कार्यानुभव को स्थान दिया जाए। 3) कक्षा ८-१० के छात्रों को तीन भाषाएँ प्रादेशिक मातृभाषा व अंग्रेजी पढ़ाई जाए।
(4) उच्चतर माध्यमिक स्तर पर दो भाषाएँ तथा पूर्ववत पाठ्यक्रम रखा जाए।
5) आयोग ने हाईस्कूल की शिक्षा में २०% तथा उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में ५०% व्यावसायिक पाठ्यक्रम शामिल करने की सिफारिश की।
5) उच्च शिक्षा:
विश्वविद्यालय शिक्षा का पुनर्गठन करना, पाठ्यक्रम, उद्देश्य, शिक्षा स्तर, शिक्षण विधियाँ, विश्वविद्यालय समानता, स्वतंत्रता संगठन कार्य विधि आदि पर
आयोग ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए।
1) कृषि शिक्षा:
1. कृषि विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय प्रौद्योगिक संस्थान से उचित सहायता व सहयोग मिलना चाहिए।
12. प्रत्येक राज्य में कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए।
3. कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षा तथा प्रसार सेवा कार्यक्रमों को महत्व दिया जाए ताकि कृषि शिक्षा में प्रगति हो सके।
२) व्यावसायिक शिक्षा:
1. माध्यमिक स्तर पर औद्योगिक पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाए।
2. डिप्लोमा कोर्स की व्यवस्था की जाए।
3. अभियन्त्रण (इंजीनियरिंग) शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाया जाए।
4. अभियांत्रिकी कॉलेजों को विश्वविद्यालय के समकक्ष माना जाय।
३) शिक्षा अनुसंधान
1. अनुसंधान कार्य के लिए धन व विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराई जाए।
2. शोध को प्रतिष्ठित बनाने हेतु शोध छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाएँ तथा मौलिक व महत्वपूर्ण कार्य पर ही पी.एच.डी. की उपाधि दी जाए।
6) प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education)
1. व्यावसायिक ज्ञान में वृद्धि के लिये अंशकालीन शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
2. इसके लिये पत्रव्यवहार द्वारा शिक्षा का प्रबंध किया जाए।
3. पुस्तकालय तथा वाचनालय की व्यवस्था की जाए।
(7) अध्यापक शिक्षा
1. अध्यापकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करे।
2. समान कार्य समान वेतन का सिद्धांत लागू हो।
3. अध्यापकों का वेतन कम उनके कार्य और उत्तरदायित्व के अनुरूप ऊँचा किया जाए।
4. प्रशिक्षण विद्यालयों में कुशल अध्यापकों की नियुक्ति की जाए।
5. शिक्षा में मूल्यांकन के लिए आधुनिक विधियों अपनाई जाए।
8) शैक्षिक अवसरों की समानता
1. प्राथमिक शिक्षा को पूर्णतः निःशुल्क किया जाए।
2. पुस्तकें खरीदने में छात्रों को वित्तीय सहायता दी जाए।
3. प्राथमिक स्तर पर को निःशुल्क पुस्तक व लेखन सामग्री दी जाएँ।
4. विकलांग व मानसिक दृष्टि से असामान्य छात्र-छात्राओं की शिक्षा हेतु प्रत्येक जिले में एक विशिष्ट विद्यालय स्थापित किया जाए।
5. आदिवासियों की शिक्षा हेतु आश्रम पद्धति पर आधारित स्कूल खोले जाएँ।
9) प्रशासन
1. समस्त शिक्षा संस्थाओं का प्रशासन सरकार के अधीन हो।
2. प्रबंध समितियों में सरकार के प्रतिनिधि सदस्य हो ।
3. व्यक्तिगत संस्थाओं में भी शिक्षकों की नियुक्ति हो ।
4. जिस विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था ठीक न हो उन्हें शिक्षा विभाग द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया जाए।
10) वित्तीय व्यवस्था
१ स्थानीय संस्थाएं शिक्षा पर एक तिहाई धन अपनी आय से दे।
१२ दो तिहाई धन राज्य सरकारें अपने कोष से दे
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