सीखने के तरीके - learning methods

सीखने के तरीके - learning methods


शिक्षा के क्षेत्र के अन्तर्गत सीखने का महत्व सबसे अधिक है। प्रत्येक व्यक्ति इस संसार में कुछ मूल में प्रवृत्तियाँ लेकर अवतीर्ण होता है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति, प्राणी अपने मानसिक विकास के अनुसार सीखता है। मनुष्य सबसे अधिक विकसित है। अतः वह अन्य प्राणियों से अधिक सीखता है। इस प्रकार सीखना प्राणी की वह क्रिया है, जिसके द्वारा वह अपने को वातावरण के अनुकूल बनाता है। स्किनर के अनुसार "सीखना, व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया को व क्रो के अनुसार “सीखना-आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है। थार्नडाइक के अनुसार उपयुक्त अनुक्रिया के चयन तथा उसे उत्तेजना से जोड़ने को अधिगम कहते हैं।


किसी नई क्रिया या नए पाठ को सीखने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। इनमें से कुछ विधियों जो मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर अधिक उपयोगी है करके सीखना - स्मृति का स्थान मस्तिष्क में नहीं, वरन शरीर के अवयवों में हैं, यही कारण है कि हम करके सीखते हैं।

जैसे- बालक जिस कार्य को स्वयं करते हैं, उसे वे जल्दी सीखते हैं। कारण यह है कि उसे करने में वे उसके उद्देश्य का निर्माण करते हैं उसको करने की योजना बनाते हैं और योजना को पूर्ण करते हैं।

निरीक्षण करके सीखना बच्चे जिस वस्तु का निरीक्षण करते हैं, उसके बारे में वे जल्दी और स्थायी रूप से सीखते हैं। इसका कारण यह है कि निरीक्षण करते समय वे उस वस्तु को छूते हैं या प्रयोग करते हैं या उसके बारे में बातचीत करते हैं।


परीक्षण करके सीखना - नई बातों की खोज करना एक प्रकार का सीखना है। बालक इस खोज को परीक्षण द्वारा कर सकता है। जैसे- पानी का भाप में परिवर्तित होना। वह इस बात को पुस्तक में पढ़कर भी सीख सकता है, पर वह सीखना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता है, जितना की स्वयं परीक्षण करके सीखना।


सीखने की इच्छा - यदि बालक में सीखने की इच्छा विकसित कर दी जाए या बालक किसी क्रिया को सीखने का संकल्प कर ले तो अधिगम सुगम हो जाता है। सीखने की इच्छा रखने वाला बालक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सीख सकता है।


सीखना आनन्दमय होना चाहिए - व्यक्ति उन बातों को याद रखते हैं जो उनके अनुभवों में आनन्द देने वाली होती है। अनेक प्रयोगों द्वारा यह भी सिद्ध हो चुका है कि जो बात कष्टदायक होती है उसे हम भूलना चाहते हैं। अतः शिक्षण में आनन्द प्रदान करने वाली बातें अधिगम को उन्नत करती हैं। अभ्यास जब किसी कार्य का बार-बार अभ्यास किया जाता है तो वह अच्छी प्रकार या ढंग से सीख लिया जाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि त्रुटिपूर्ण अभ्यास को बार-बार दोहराया जाएगा तो गलत भी सीख लिया जाएगा।


पुरस्कार एवं दण्ड पुरस्कार और दण्ड अधिगम को प्रभावी करने के प्रधान साधन हैं। पुरस्कार और दण्ड उसी वर्ग में आते हैं, जिसमें प्रशंसा और भ्रत्सना को सम्मिलित किया जाता है।

पुरस्कार और दण्ड दोनों का उद्देश्य भावी व्यवहार पर अनुकूल प्रभाव डालता है, लेकिन दोनों की विधियाँ पृथक-पृथक हैं। पुरस्कार का उपयोग करने पर बालक को आनन्दानुभूति होती है, जबकि अवांछित कार्य को रोकने के लिए दण्ड का उपयोग होता है तो इससे बालक को पीड़ा की अनुभूति होती है। पुरस्कार का प्रयोग अधिगम को उन्नत करने हेतु किया जाता है।


ध्यान, रूचि और उत्साह पैदा करके कक्षा में बालक का ध्यान सीखने की क्रिया में केन्द्रित करना अधिगम को प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण साधन है। ध्यान को केन्द्रित करने में रूचि और उत्साह का अधिक योगदान रहता है। अध्यापक को सदैव बालकों में आन्तरिक रूचि विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।


सम्मेलन व विचार गोष्ठी विधियाँ - इन विधियों में किसी विशेष पर छात्रों द्वारा विचार-विनियम किया जाता है।

सीखने के कार्य को सरल और सफल बनाने के लिए सबसे अधिक आवश्यक है सीखने की स्थिति का संगठन। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब विद्यालय का निर्माण इस प्रकार किया जाए कि उसमें सीखने की सभी क्रियाएँ उपलब्ध हों और सीखने की सभी विधियों का प्रयोग किया जाए।