कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत के स्तर एवं चरण - Levels and stages of Kohlberg's theory of moral development

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत के स्तर एवं चरण - Levels and stages of Kohlberg's theory of moral development


कोहलबर्ग का मानना था कि व्यक्ति की प्रगति उसकी नैतिक तर्क की क्षमता में चरणों की एक शृंखला के माध्यम से संभव है। पियाजे ने नैतिक विकास के दो चरणों का वर्णन किया। जबकि कोहलबर्ग के अनुसार छःचरण पहचाने गए, जिनको आम तौर पर तीन मुख्या स्तरों में वर्गीकृत किया गया। कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत के चरणों को निम्नलिखित वर्गीकरण में रेखांकित किया जा सकता है -


(क) पूर्व-पारंपरिक तर्क का स्तर


नैतिक सोच व विचार का पहला स्तर सामान्यतः प्राथमिक स्कूल स्तर पर विकसित होता है। इस स्तर में शामिल मुख्य बिन्दु हैं- 


१. यह अहं केन्द्रिता की नैतिकता पर आधारित है।


२. यह विशेषतया 10 साल की उम्र के बच्चों के बारे में है।


3. युवा बच्चों को वास्तव में दूसरों द्वारा निर्धारित नियमों को समझने में असमर्थता होती है, इसीलिए इसे पूर्व पारंपरिक कहा जाता है।


४. इस स्तर पर कार्य के परिणाम अच्छे या बुरे को निर्धारित करते हैं। 


चरण 1- दंड तथा आज्ञा पालन अभिमुखता (Punishment and Obedience Orientation)


इस चरण में, लोग सामाजिक रूप से स्वीकार्य नियमों के अनुरूप व्यवहार करते हैं, क्योंकि उन्हें कुछ प्राधिकारिक संरचनाओं (जैसे परिवार, विद्यालय, अभिभावक या शिक्षक) द्वारा ऐसा करने को कहा जाता है।

इस तरह की आजाकारिता के लिए कभी-कभी डर या दण्ड दवारा उनको सीख दी जाती। यह नैतिकता दंड और पुरस्कार पर आधारित होती है। निर्णयों का निर्माण बाहरी व्यवस्थाओं के अनुसार होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि हाइन्ज गलत था क्योंकि चोरी करते हुए पकड़े जाने पर दण्ड मिलता है।


चरण 2- यांत्रिक सापेक्षिक अभिमुखता (Instrumental Relativist Orientation )


व्यवहार की सार्थकता स्व हित पर आधारित होती है। दूसरों की केवल इतनी ही मदद करें जोकि हमारे स्वयं के लिए भी लाभदायक हो। इस प्रकार, तर्क यह है कि कार्य तभी नैतिक होगा जब नियमों का पालन स्वयं के लिए कुछ सकारात्मक परिणाम लेकर आए। एक बच्चे का तर्क इस स्तर पर यह हो सकता है कि हाइन्ज दवा चुराना कर सही था यदि वह वैद्य के लिए लिखित संदेश छोड़ता हो कि वह उसके समर्थन में कुछ अच्छा जरूर करेगा।


(ख) पारंपरिक नैतिक तर्क का स्तर


 नैतिक सोच व विचार का दूसरा स्तर सामान्यतः समाज में पाया जाता है इसलिए इसका नाम पारंपरिक या परंपरागत है। इस स्तर पर शामिल मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं


१. इसमें दूसरों द्वारा निर्धारित नैतिकता पर जोर दिया गया है।


२. यह 10 से 20 साल तक की उम्र के दायरे में आने वालों के लिए है।


3. इसमें कानून, धर्म, समाज के नियमों और परंपराओं में निहित नैतिकता पर स्वयं के निर्णयों को आधारित किया जाता है।


चरण 3- उत्तम लड़का-लड़की अभिमुखता


इस चरण में बच्चे बड़ों द्वारा स्वीकृति पाने के लिए लालयित रहते हैं।

इस स्तर पर नैतिकता को अच्छे पारंपरिक संबंधों के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है। सही व्यवहार दूसरों को प्रसन्न करता है। व्यवहार को इरादों से परखा जाता है जो व्यक्ति विशेष के नैतिक मूल्यों को परिलक्षित करते हैं। एक बच्चे के तर्क के अनुसार हाइन्ज गलत था क्योंकि उसने दवा के लिए वैदय की अनुमति नहीं ली थी। जबकि दूसरे बच्चे का तर्क था कि वह सही था क्योंकि उसने पारिवारिक जिम्मेदारी को निभाते हुए अपनी मरती हुई पत्नी को बचाने के लिए दवा चुराई थी।


चरण 4 कानून और व्यवस्था अभिमुखता


यह चरण कानून और कर्तव्य के दायित्वों पर बल देता है। नैतिकता का संबंध सभी की भलाई और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के साथ है। उदाहरण के तौर पर, एक तर्क है कि हाइन्ज गलत था क्योंकि उसने चोरी की थी जोकि कानून के नियम के विरुद्ध किया गया कार्य था।


(ग) उत्तर पारंपरिक नैतिक तर्क


नैतिक तर्क का तृतीय स्तर वह है जहाँ तक कोहलवर्ग के अनुसार अधिकतर वयस्क नहीं पहुँच पाते हैं अर्थात् जिस स्तर को कोई भी शीघ्र अनुभव नहीं कर सकता है। इस स्तर में शामिल मुख्य बिन्दु हैं


१. यह सिद्धांतों की नैतिकता पर जोर देता है।


२. 20 साल की उम्र से पहले शायद ही कोई इस स्तर पर पहुंचता है और केवल जनसंख्या का एक छोटा समूह ही इस स्तर तक पहुंच पाता है।


३. मानव जीवन को बचाना कानून के नियमों के पालन से ज्यादा मूल्यवान होता है।


चरण 5 सामाजिक अनुबंध अभिमुखता


यह चरण सामाजिक पारंपरिकता की समझ और दूसरों के कल्याण में एक वास्तविक पक्ष को उजागर करता है।

नैतिकता सामाजिक अनुबंध के साथ व्यक्तिगत और नैतिक अधिकार पर निर्भर करती है। इसी प्रकार सही व्यवहार व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित होता है, जो समाज द्वारा स्वीकृत किया जाता है। समाज को लाभ देने के लिए कानून को बदला जा सकता है। एक तर्क के अनुरूप, हाइन्ज सही था क्योंकि उसकी पत्नी का जिंदगी जीने का अधिकार अधिक महत्वपूर्ण था बजाय चोरी ना करने के कानून का पालन करने के।


चरण 6 सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिमुखता (Universal Ethical Principle Orientation)


यह चरण सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों के प्रति सम्मान और व्यक्तिगत अंतरात्मा की मांग पर आधारित है। इसमें व्यक्ति उचित-अनुचित का निर्णय ऐसे स्वनिर्धारित नैतिक सिद्धांतों के आधार पर करता हैजो तार्किक व्यापकता (Logical Comprehensiveness), सार्वभौमिकता (Universality) और एकरूपता (Consistancy) से युक्त होते हैं।

हम नैतिक निर्णयों पर भी पहुंचते हैं जब इसमें शामिल लोगों के नजरिए को भी ग्रहण करते है। व्यक्ति विशेष का उचित व्यवहार व्यक्तिगत विवेक और उसके द्वारा चुने गए नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होता है। ये न्याय के सर्वमान्य प्राकृतिक सिद्धांत होने के साथ-साथ मानव अधिकारों की समानता, परंपरागत तथा जाति के प्रति सम्मान की भावना से युक्त होते हैं।

कोहलवर्ग हमेशा चरण 6 के अस्तित्व में विश्वास करते थे और उनके पास इसके लिए कुछ प्रमाण भी थे।


कोहलबर्ग का मानना था कि व्यक्ति इन चरणों के माध्यम से क्रमशः प्रगति कर सकता है। वे चरणों को बीच में छोड़ नहीं सकते हैं। उनके अनुसार स्वार्थ के अभिविन्यास के लिए अच्छा लड़का लड़की चरण से गुजरे बिना कानून और व्यवस्था की अवस्था तक नहीं पहुँचा जा सकता है। वे स्वयं केवल नैतिक औचित्य के एक चरण तक की समझ तक आ सकते हैं। इस प्रकार कोहलबर्ग के अनुसार यह महत्वपूर्ण था कि व्यक्तिबच्चों के समक्ष चर्चा के लिए नैतिक दुविधाओं (Moral dilemmas) को प्रस्तुत किया जाए ताकि उन्हें नैतिकता की तर्कसंगतता एवं उस दिशा में उनके विकास के लिए प्रोत्साहन हेतु एक उच्च मंच मिल सके। अंतिम टिप्पणी कोहलबर्ग के नैतिक चर्चा उपागम को संदर्भित करती है। उन्होंने इसे ऐसे तरीकों के रूप में देखा जिसमें नैतिक विकास औपचारिक शिक्षा के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा सकता है।


कोहलवर्ग का, पियाजे के अनुरूप, यह मानना था कि सबसे अधिक नैतिक विकास सामाजिक संपर्क के माध्यम से होता है। यह चर्चा उपागम, व्यक्ति विशेष द्वारा विकसित अंतर्दृष्टि एवं मौजूदा स्तर पर संज्ञानात्मक संघर्ष के परिणाम पर आधारित है।