वित्तीय विवरण विश्लेषण व निर्वचन की परिसीमायें - Limitations of Financial Statement Analysis and Interpretation

वित्तीय विवरण विश्लेषण व निर्वचन की परिसीमायें - Limitations of Financial Statement Analysis and Interpretation


वित्तीय विवरणों के विश्लेषण की कुछ परिसीमायें भी है। एक विश्लेषक को इन परिसीमाओं का ध्यान रखना आवश्यक है। ये परिसीमायें निम्नलिखित हैं


(1) एक वर्ष के वित्तीय विवरणों से ही ज्ञात किये गये अंकों का बहुत ही सीमित महत्व रह जाता है। इन अंको के विश्लेषण से कोई विश्वसनीय निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते हैं। किसी एक अन्य अवधि के अंकों के विश्लेषण की तुलना अंकों की प्रवृत्ति का विश्लेषण अधिक विश्वसनीय परिणाम देता है।


(2) भूत सदैव ही भविष्य का सूचक नहीं होता। व्यावसायिक क्रियाओं के परिणाम देश की सामान्य आर्थिक दशाओं, उद्योग के अन्तर्गत उपयोगी दशाओं आदि कारकों का प्रबन्ध के निर्णयों व नीतियों से प्रभावित होते हैं।

अतः इन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही व्यवसाय के परिणामों की व्याख्या करनी चाहिये।


(3) वित्तीय विवरण विश्लेषण के सभी परिणाम अच्छे या बुरे प्रबन्ध के प्रत्यक्ष सूचक के रूप में नहीं प्रयोग किये जा सकते। ये तो केवल सम्भाव्यताओं को बतलाते हैं जिनकी और जांच आवश्यक है। उदाहरण के लिये स्कन्ध आवर्त में कमी (Decrease in inventory turnover) सामान्यतः अवांछनीय प्रवृत्ति मानी जाती है। किन्तु यह किसी दुर्लभ कच्चे माल के बड़ी मात्रा में संग्रह के कारण हुई है तो यह कमी बुरी नहीं मानी जायेगी। अतः विश्लेषण के परिणामों से निष्कर्ष निकालते समय अन्य सम्बन्धित तथ्यों की जांच करना आवश्यक है।


(4) एक संस्था के कुछ परिवर्तनों से वित्तीय विवरणों के समंकों की तुल्यता समाप्त हो जाती है।

एक विश्लेषक को ऐसे परिवर्तनों से सजग रहना चाहिये। उदाहरण के लिये स्थायी सम्पत्तियों के मूल्यों में वृद्धि या कमी से इनकी पिछले वर्षों के अंको से कोई अर्थपूर्ण तुलना नहीं की जा सकती है।


(5) एक संस्था के वित्तीय विवरण के समक दूसरी संस्था के समकों से कदाचित् ही पूर्णतया तुल्य होते हैं। व्यावसायिक संस्थाओं की कार्यपद्धति, वस्तु या सेवा की प्रकृति, संयंत्रों की लागत, अर्थप्रबन्धन पद्धति आदि में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। अतः उसकी आपसी तुलना से सही निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। इसी तरह दो कम्पनियों की लेखांकन शब्दावली में अन्तर की दशा में भी उनकी तुल्यता समाप्त हो जाती है। जैसे चालू सम्पतियों व दायित्वों की परिभाषा के सम्बन्ध में कम्पनियों में विभिन्नता पायी जा सकती है।


(6) मुद्रा मूल्य में तेजी से परिवर्तन की स्थिति में वित्तीय विवरणों के विश्लेषण की वैधता कम हो जाती है और उनसे कोई विश्वसनीय निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते क्योंकि स्थिति में वर्तमान अवधि के वित्तीय विवरण समकों की भूतकालीन समकों से तुलना महत्वहीन हो जाती है। 


(7) वित्तीय विवरणों के विश्लेषण में विश्लेषक को वित्तीय विवरणों में ऊपरी दिखावट से सजग रहना चाहिये। आर्थिक चिट्ठे में ऊपरी दिखावट होने पर भ्रामक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। जैसे वित्तीय वर्ष की समाप्ति के अन्तिम दिनों में देनदारों की वसूली में तत्परता लाकर क्रय को कुछ दिनों के लिये स्थगित कर आदि तरीके अपनाकर कोई कम्पनी चिट्ठे में अपनी अच्छी रोकड स्थिति दिखा सकती है।