वित्तीय विवरणों की सीमायें - Limitations of Financial Statements
वित्तीय विवरणों की सीमायें - Limitations of Financial Statements
(1) समकों में यथार्थता का अभाव (Lack of precision in data) वित्तीय विवरणों के समको में सूक्ष्मता नहीं पायी जाती है, क्योंकि ये विवरण ऐसे मामलों से सम्बन्धित होते हैं जिन्हें सूक्ष्मता से नहीं व्यक्त किया जा सकता है। वित्तीय विवरणों के समक लेखांकन पेश द्वारा विकसित प्रथाओं और मान्यताओं तथा लेखापाल के निर्णय के आधार पर ज्ञात किये जाते हैं। अतः उनमें सूक्ष्मता असम्भव है।
(2) वित्तीय स्थिति का ज्ञान नहीं (No true picture of financial position) वित्तीय विवरण व्यवसाय की वित्तीय स्थिति का सही स्थिति नहीं दर्शाते हैं, क्योंकि इनमें केवल उन्हीं तथ्यों का समावेश किया जाता है जिनका मौद्रिक माप सम्भव है। किन्तु व्यवसाय में बहुत से कारक गुणात्मक प्रकृति के भी होते हैं जिनका मौद्रिक माप तो सम्भव नहीं है
किन्तु जो व्यवसाय की वित्तीय स्थिति और उनके संचालन परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं, जैसे व्यवसाय की प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा, इसके कर्मचारियों की वफादारी, प्रबन्धकीय कुशलता व ईमानदारी, प्रशासकीय अधिकारियों में परिवर्तन, प्रतिस्पर्धा स्थिति में परिवर्तन, सरकारी नीतियों व सन्नियमों में परिवर्तन तथा राजनैतिक स्थिति में परिवर्तन आदि। इन्हें वित्तीय विवरणों में नहीं दिखलाया जाता है।
(3) ऐतिहासिक प्रलेख (Historical Documents) वित्तीय विवरण ऐतिहासिक प्रलेख होते है। ये व्यवसाय का सही मूल्य नहीं दर्शाते आर्थिक चिट्ठे में विभिन्न स्थायी सम्पत्तियों को उनकी मूल लागत से एकत्र ( Accumulated) हास की राशि घटाकर दिखलाया जाता है।
किन्तु इन सम्पत्तियों का यह मूल्य इनके बाजार मूल्य से पर्याप्त भिन्न हो सकता है। इसी प्रकार लाभ-हानि खाते की बहुत सी मदें (जैसे अशोध्य ऋण संचिति, ह्वास आदि) अनुमान के आधार पर ज्ञात किये जाते हैं। अतः इसके द्वारा प्रदर्शित लाभ संस्था का वास्तविक लाभ नहीं होता।
(1) घटनाओं का पूर्वा भास नहीं (No expectation of future events) – वित्तीय विवरण केवल भूतकालीन घटनाओं, सूचनाओं तथा विवरणों का विवेचन करते हैं। इनसे भावी घटनाओं का अनुमान नहीं मिलता।
(5) ऊपरी दिखावट (Window Dressing) वित्तीय विवरणों में, विशेषकर आर्थिक चिट्ठे में ऊपरी दिखावट की प्रकृति पायी जाती है।
( 6 ) अन्तरिम प्रतिवेदन ( Interim Reports) – वित्तीय विवरण मूलतः अन्तरिम प्रतिवेदन होते है। अतः ये अन्तिम नहीं हो सकते, क्योंकि व्यवसाय का वास्तविक लाभ या हानि व्यवसाय के पूर्णतया बन्द हो जाने के पश्चात् ही मालूम हो सकता है। लेकिन बहुत से कारणों से व्यवसाय के जीवन काल में समय - समय पर (सामान्यता एक वर्ष बाद) लेखों के परिणाम ज्ञात किये जाते हैं। इसके कारण व्यवसाय के जीवनकाल की समस्त आयों व व्ययों को लेखावधि के अनुसार विभाजित करना होता है। इसमें लेखापाल के व्यक्तिगत निर्णय का प्रभाव अधिक रहता है। इस स्थिति मे वित्तीय विवरण पूर्ण, निश्चित और शुद्ध नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त व्यवसाय में सम्भाव्य दायित्व और सम्पत्तियाँ, स्थगित रख रखाव ( deferred maintenance) आदि के अस्तित्व के कारण वित्तीय विवरणों में अशुद्धता बनी रहती है।
(7) मूल्य स्तर में परिवर्तन (Price Level Changes ) मूल्य स्तर में तेजी से परिवर्तन की दशा में वित्तीय विवरण व्यवसाय की स्थिति का सही चित्र नहीं प्रस्तुत कर पाते हैं
और इनकी तुल्यता समाप्त हो जाती है। इसी तरह वित्तीय विवरणों की निर्माण तिथि, लेखावधि अथवा व्यवसाय की प्रकृति में अन्तर होने पर भी उनका तुलनात्मक अध्ययन सम्भव नहीं होता। वित्तीय विवरणों के समक मूक होते हैं।
(8) विषयपरकता का अभाव (Lack of Objectivity) ये अपने आप कुछ नहीं बतलाते। अतः इनकी व्याख्या में व्यक्तिगत मत महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। प्रत्येक प्रयोगकर्ता अपनी कुशलता व अनुभव के आधार पर एक ही सूचना का भिन्न-भिन्न अर्थ लगा सकता है।
(9) रोकड़ प्रवाह सूचना का अभाव (Lack of Cash Flow Report ) भारत में वित्तीय विवरणों में लेखा वर्ष में रोकड़ के परिवर्तन की व्याख्या के लिये रोकड़ प्रवाह सूचना नहीं दी जाती है। उपार्जित लाभ और परिचालन रोकड़ प्रवाह के बीच काफी अन्तर रहता है। इसीलिये अनेक देशों ने अपने बैंकों में वित्तीय विवरणों के साथ रोकड़ प्रवाह सूचना देना अनिवार्य कर दिया है। AICA द्वारा निर्गमित संशोधित लेखांकन मानदण्ड 3 के अनुसार अब कम्पनियों के वित्तीय विवरणों के साथ रोकड़ प्रवाह विवरण देना आवश्यक हो गया है।
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