प्रबंधकीय लेखा-विधि की सीमाएं - Limitations of Managerial Accounting
प्रबंधकीय लेखा-विधि की सीमाएं - Limitations of Managerial Accounting
यद्यपि वर्तमान व्यवसाय जगत में प्रबंधकीय लेखा-विधि का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है और इसके प्रयोग से प्रबंध लाभ प्राप्त कर सकता है, फिर भी अन्य विज्ञानों की तरह इस शास्त्र की भी कुछ निजी मर्यादाएं व सीमाएं है जब तक इन सीमाओं को ध्यान में रखकर प्रबंधकीय लेखा-विधि का प्रयोग नहीं किया जाएगा, तथाकथित लाभ प्राप्त नहीं हो सकते। प्रबंधकीय लेखा की निम्न सीमाएं हैं
(1) प्रबंधकीय लेखा विधि में प्रयुक्त अधिकाश सूचनाए वित्तीय लेखा विधि, लागत लेखा - विधि व अन्य प्रलेखों से एकत्र की जाती है। अतः प्रबंध लेखापालक द्वारा निकाले गए निष्कर्षों की सत्यता एवं शुद्धता पर्याप्त सीमा तक इन मौलिक प्रलेखों की सत्यता व शुद्धता पर निर्भर करती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रबंधकीय लेखा विधि के गुण-दोष आधारभूत लेखों के गुण-दोष पर निर्भर करते हैं।
(2) प्रबंधकीय लेखापालक द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अपने आप में महत्वहीन होते हैं, जब तक उनका सही ढंग से कार्यान्वयन न किया जाए। इसके लिए प्रबंधक के सभी स्तर पर सतत् प्रयत्न की आवश्यकता पड़ सकती है।
(3) प्रबंधकीय लेखा - विधि प्रबंध व प्रशासन का प्रतिस्थापन नहीं है। यह तो प्रबंध के लिए औजार- मात्र है। निर्णय व उचित कदम प्रबंध द्वारा लिये जाते हैं, न कि लेखापालक द्वारा हा प्रबंध की सहायता के लिए आकड़ों के संकलन, विश्लेषण व प्रस्तुतिकरण की क्रिया लेखापालक द्वारा की जाती है।
(4) प्रबंधकीय लेखा - विधि का अभ्युदय अनेक विज्ञानों जैसे, सांख्यिकी प्रबंध सिद्धात, अर्थशास्त्र, अंक गणित, इंजीनियरिंग आदि के विकास व नये सिद्धांत के कारण हुआ है। अतः इन सभी विषयों का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही इस लेखा विधि का यथोचित लाभ उठाया जा सकता है।
(5) प्रबंधकीय लेखा - विधि द्वारा जो भी सूचनाएं प्रदान की जाती है, उनमें मानव-निर्णय का तत्व शामिल होता है। सूचनाओं के संकलन से लेकर निर्वचन तक जिन व्यक्तियों की सेवाए ली जाती है, उनके व्यक्तिगत चरित्र, भावना व विचार का थोडा प्रभाव इन सूचनाओं पर अवश्य पड़ता हैं। अत: बहुत ही कम संभावना होती है कि इन सूचनाओं पर व्यक्तिगत निर्णय के प्रभाव के कारण ये गलत पथ पर ले जा सकती हैं।
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