सीमावर्ती लागत पद्धति की सीमाएं - Limitations of Marginal Costing
सीमावर्ती लागत पद्धति की सीमाएं - Limitations of Marginal Costing
यद्यपि सीमावर्ती लागत पद्धति प्रबन्ध के लिए महत्वपूर्ण यन्त्र साबित हो सकती है, इसके प्रयोग में अनेक खतरे पैदा हो सकते हैं। इन खतरों से हमेशा सावधान रहना चाहिए। ये खतरे (जिन्हें हम सीमाओं के रूप में भी मान सकते हैं) निम्न हैं:
(i) सीमावर्ती लागत पद्धति की अवधारणा पूर्णतः कुल लागत के स्थिर व परिवर्तनशील लागत में वर्गीकरण पर आधारित है और इस प्रकार का वर्गीकरण वास्तव में एक बहुत ही जटिल कार्य है, विशेषकर उन खर्चों के सम्बन्ध में जो अंशतः स्थिर व अंशत: परिवर्तनशील होते हैं। ऐसे खचों के स्थिर व परिवर्तनशील अंगों को अलग करने की अनेक विधियों के बावजूद भी सही-सही अंश ज्ञात करना असम्भव ही है।
(ii) इस बात की भी सम्भावना है कि प्रदत्त क्षमता के भीतर भी स्थिर लागत में परिवर्तन हो जाय और परिवर्तनशील लागत भी उत्पादन मात्रा के परिवर्तन से भिन्न अनुपात में परिवर्तित हो ।
ऐसी स्थिति में सीमावर्ती लागत की मान्यता ही समाप्त हो जायेगी और इसका प्रयोग खतरनाक हो सकता है।
(iii) प्रबन्धकीय निर्णयों में सहायता हेतु सीमावर्ती लागत पद्धति स्थायी व्ययों को यह मानकर शामिल नहीं करती है कि ये व्यय वर्तमान क्रिया-स्तर पर पूर्णतः अवशेषित ही हो रहे हैं। परन्तु कभी-कभी स्थायी व्ययों को ध्यान में रखना खास तौर पर कई उत्पादों की दशा में गलत निर्णय दे सकता है।
(iv) यह पद्धति सभी प्रकार के व्यवसायों के लिए उपयुक्त नहीं है। उदाहरण के लिए, एकल कार्य (Job) या ठेका व्यवसाय में इस पद्धति का प्रयोग सरल कार्य नहीं है।
(v) बजटरी नियन्त्रण व प्रमाप लागत पद्धति सीमावर्ती लागत पद्धति से श्रेष्ठतम हैं और जब उनका प्रयोग न किया जा सकता हो तभी इस पद्धति का प्रयोग करना चाहिए।
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