पियाजे के सिद्धांत की सीमाएँ - Limitations of Piaget's theory
पियाजे के सिद्धांत की सीमाएँ - Limitations of Piaget's theory
(१) अवस्थाओं के कारण पियाजे द्वारा दी गई चार अवस्थाओं को अक्सर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कई शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि विकास एक सतत प्रक्रिया है तो अवस्थाएँ अलग-अलग क्यों ? क्या एक बच्चा एक समय में पूर्णतः एक ही अवस्था में होता है या वह एक समय में अलग-अलग अवस्थाओं की विशेषताऐं लिए होता है? उदाहरण के लिए: यदि बच्चा पूर्व संक्रियात्मक अवस्था में खुद कार्य कर पाता है तथा मूर्त संक्रियात्मक अवस्था के कुछ कार्य भी कर पाता है। तो ऐसे में हम बच्चे को किस अवस्था में कहेंगे?
( २ ) सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा पियाजे के संज्ञानात्मक विकास में समाज की भूमिका को नजरअंदाज किया गया है।
बच्चे का विकास पियाजे के अनुसार गुणमुक्त रूप में हो रहा है परंतु कुछ समाज में बच्चे कई कार्य बाकी समाजों की अपेक्षा जल्दी कर पाते हैं। उदाहरण के लिए बर्फीली जगहों पर रहने वाले बच्चे अलग-अलग प्रकार की बर्फ में अंतर कर पाते हैं जबकि मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे वह सब नहीं कर पाते हैं।
(३) बच्चों की क्षमता को नजर अंदाज करना कई शोध यह दर्शाते हैं कि बहुत छोटे बच्चे भी पियाजे द्वारा दिए द्वारा कई कार्यों को हल कर पाते हैं जिन्हें पियाजे के अनुसार बड़े बच्चे भी हल नहीं कर पाते।
पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत के शिक्षाशास्त्रीय प्रभाव
(१) खोजकर सीखना (Discover Learning)- पियाजे के अनुसार बच्चों को खुद सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। शिक्षक का कार्य यह नहीं कि वह पके पकाए ज्ञान को बच्चों के समक्ष परोस दें,
अपितु शिक्षकों को ऐसी गतिविधियों की रचना करनी चाहिए जहाँ बच्चे स्वयं क्रिया करके सीख सके। शिक्षक को केवल सीखने का सामान उपलब्ध कराना चाहिए तथा एक सुगमकर्ता की भूमिका अदा करनी चाहिए।
(२) सीखने का सही समय (Readiness to Learn) पियाजे के अनुसार शिक्षक को ऐसी गतिविधियों की रचना करनी चाहिए जिनसे बच्चों के मौजूदा जान में वृद्धि हो और बच्चों के बातावरण को समझने के सीमित दायरे का बिस्तार हो। बच्चों की रुचि ना होने पर मानसिक रूप से उन पर नए ज्ञान को थोपना नहीं चाहिए।
(३) हर बच्चे की विशिष्टता को स्वीकारना पियाजे के अनुसार हर बच्चा बिकास की समान प्रक्रिया से गुजरता है परंतु अलग अलग रफ्तार से। कुछ बच्चे कुछ कार्य जल्दी सीख जाते हैं, तो कुछ देर से। अतः शिक्षक को चाहिए कि वह हर बच्चे के लिए अलग से पाठ-योजना तैयार करे या छोटे-छोटे समूहों के लिए न कि पूरी कक्षा के लिए एक ही पाठ योजना बनाए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि बच्चे के ज्ञान का मूल्यांकन उस बच्चे के पिछले ज्ञान से किया जाए, न कि अन्य बच्चों के कार्य से।
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