शून्य आधार बजटन की सीमायें या आलोचनायें - Limitations or Criticisms of Zero Base Budgeting
शून्य आधार बजटन की सीमायें या आलोचनायें - Limitations or Criticisms of Zero Base Budgeting
1. निर्णय इकाइयों और निर्णय पैकेजों को परिभाषित करना कठिन है।
2. पुनर्विचार प्रक्रिया में बहुत समय लगता है। इसके अतिरिक्त निर्णय पैकेजों का श्रेणीयन भी एक दूसरी समस्या है, विशेषकर तब जब लाभों का संख्यात्मक माप सम्भव न हो ।
3. शून्य आधार बजटन लागू करने के लिए प्रबन्धकों का पर्याप्त प्रशिक्षण तथा संचालनात्मक ढांचा विकसित करना आवश्यक है।
4. शून्य आधार बजटन तकनीक के लागू करने में विभिन्न संचालनात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें परम्परागत बजटन की तुलना में कागजी कार्य अधिक होता है, विशेषकर किसी संगठन में इस प्रणाली के लागू करने की प्रारम्भिक अवधियों में। अतः इसकी सफलता के लिए सर्वोच्च प्रबन्ध का पूर्ण समर्थन आवश्यक है।
5. यह प्रणाली श्रम साध्य और खर्चीली है। इस प्रणाली को लागू करने और बनाये रखने के लिये आवश्यक समय और प्रयत्न इससे प्राप्त होने वालें लाभों से अधिक हो जाते हैं। अधिक मात्रा में समंक विधायन के कारण इसके लिए कम्प्यूटर सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
6. प्रबन्धकों के लिए यह एक धमकी भरी प्रक्रिया है क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष अपने बजट प्रस्तावों के अनुमोदन के लिए विस्तृत विवरण देना होता है । समुचित सूचना के अभाव में उनके प्रस्ताव अस्वीकार भी किये जा सकते हैं।
7. इस तकनीक को शोध और विकास क्रियाओं पर नहीं लागू किया जा सकता क्योंकि इसमें उद्देश्य और लक्ष्यों को परिभाषित करना कठिन होता है।
2. विक्रय बजट - बहुत-सी व्यावसायिक संस्थाओं के लिए विक्रय का पूर्वानुमान बजटिंग की प्रारम्भिक क्रिया माना जाता है।
अगर वस्तु की मांग के सम्बन्ध में पूर्ण आश्वासन मिल जाता है और विक्रय केवल अधिकतम सम्भावित उत्पादन का अंग मात्र होता है, तो उस दशा में उत्पादन का पूर्वानुमान ही महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है। विक्रय बजट भावी बजट अवधि के लिए सम्भावित बिक्री (मात्रा और मूल्य दोनों रूपों में) सम्बन्धित होता है। विक्रय बजट तैयार करने के लिए पूर्वानुमान आवश्यक है। पूर्वानुमान की विधि का चुनाव अनेक कारकों से प्रभावित होता है। वस्तु की प्रकृति, वितरण पद्धति, व्यवसाय का आकार, प्रतिस्पर्द्धा की मात्रा, आदि ऐसे कारक है जिन्हें पूर्वानुमान विधि का चुनाव करते समय ध्यान में रखना पड़ता है।
विक्रेता, शाखा प्रबन्धक, क्षेत्रीय प्रबन्धक और विक्रय प्रबन्धक या संचालक सभी व्यक्ति पूर्वानुमान में सहयोग देते हैं। इसके सम्बन्ध में निम्न कदम उठाने चाहिए :
(अ) गत वर्षों में हुई प्रत्येक वस्तु की बिक्री से सम्बन्धित आंकड़े प्रत्येक विक्रेता को दे दिया जाते हैं। यह सूचना एक खानेदार विवरण- पत्र में दी जाती है और इसमें एक खाना उसे अनुमान के लिए छोड़ दिया जाता है। आवश्यकतानुसार चार खाली खाने प्रत्येक तिमाही के लिए और छोड़ दिये जाते हैं। इस प्रकार के विवरण का नमूना अग्र प्रकार का हो सकता है :
(ब) ब्रांच प्रबन्धक व क्षेत्रीय प्रबन्धक से कहा जाये कि वे अपना खुद विक्रय पूर्वानुमान प्रस्तुत करें। ऐसा करते समय प्रबन्धक को चाहिए कि वह विक्रेता के अनुमान को कभी भी ध्यान में न रखे। इन तीनों के अनुमानों का संकलन व एकीकरण करने के बाद उनका मिलान किया जा सकता है। अगर प्रबन्धक और विक्रेता के अनुमान में अन्तर हो तो उसके सम्बन्ध में कोई-न-कोई समन्वय स्थापित किया जाता है।
(स) इसके बाद विक्रय संचालक को सम्भावित बिक्री का सारांश दिया जाता है। इसको साधारणतया वस्तु क्षेत्र व बिक्री के आधार पर वर्गीकृत करके प्रस्तुत किया जाता है।
(द) इसके बाद प्रमाणित मूल्य निश्चित किये जाते हैं। यह कार्य विक्रय संचालक, बजट अधिकारी व अन्य लेखा-विधि अधिकारी द्वारा मिलकर किया जाता है।
(य) अनुकूलतम संचालन स्तर को ध्यान में रखते हुए यह निश्चित किया जाता है कि किन-किन वस्तुओं के मिश्रित विक्रय पर अधिकतम लाभ होगा।
उपर्युक्त ढंग से संकलित पूर्वानुमान को जब अन्तिम रूप में मान लिया जाता है तो वही विक्रय बजट कहलाता है।
कभी-कभी विक्रय पूर्वानुमान में बाजार अनुसन्धान व सांख्यिकीय विधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है। विक्रय पूर्वानुमान के अन्तर्गत भावी मांग का निर्धारण आता है। जब तक संस्था एकाधिकारी नहीं है, उसे यही आशा होनी चाहिए कि निश्चित तिथि पर प्राप्य मांग का कुछ भाग ही भविष्य में भी बना रहेगा। इस प्रकार गत वर्षों के विक्रय सम्बन्धी आंकड़े भविष्य के अनुमान के लिए सहायक होते हैं, परन्तु परिस्थितियां व दशाएं बदलती रहती है। अतः यह बहुत जरूरी है कि बजट अवधि में रहने वली दशाओं के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त किया जा सके।
( 3 ) विक्रय एवं वितरण लागत बजट : यह बजट उन तमाम खर्चों के विषय में पूर्वानुमान होता है, जो संस्था की वस्तुओं के विक्रय व वितरण में किये जा सकते हैं। यह बजट विक्रय बजट से अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है, क्योंकि विक्रय पूर्वानुमान पर ही इस प्रकार के खर्चों का पूर्वानुमान निर्भर करता हैं तथापि यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि कुछ खच का प्रभाव भावी विक्रय को प्रभावित कर सकता है।
विक्रय एवं वितरण व्यय बजट के निर्माण का दायित्व विक्रय प्रबन्धक के ऊपर होता है हालांकि वह विक्रय कार्यालय अधीक्षक, वितरण प्रबन्धक या विज्ञापन अधिकारी से भी सहायता ले सकता है। कुछ बड़ी संस्थाएं अलग से विज्ञापन बजट तैयार करती है। इस विक्रय व वितरण बजट के निर्माण हेतु कुल समूह खर्चों को निम्न श्रेणी में बांट लेते हैं:
(अ) प्रत्यक्ष विक्रय व्यय,
(ब) वितरण व्यय,
(स) विक्रय कार्यालय का व्यय,
(द) विज्ञापन पर व्यय
(अ) प्रत्यक्ष विक्रय व्यय के सम्बन्ध में बजट या पूर्वानुमान लगाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होता है :
(i) भौगोलिक क्षेत्रों में सम्वर्द्धन या संकुचन का प्रभाव यात्रियों की संख्या व यात्रा व्यय पर पड़ सकता है।
(ii) यात्रियों को पारिश्रमिक भुगतान की विधियां अर्थात् उन्हें स्थायी वेतन दिया जायेगा या लाभ पर कुछ कमीशन भी दिया जायेगा ।
(iii) एक निश्चित विशेष वस्तु के विक्रय को बढ़ाने हेतु प्रेरणा के रूप में पारिश्रमिक गणना के आधार में परिवर्तन
(iv) प्रतिनिधियों की नियुक्ति एवं उनके पारिश्रमिक की रीति ।
(v) विक्रय की मात्रा या रकम में अनुमानित परिवर्तन का विक्रय व्यय पर प्रभाव ।
(vi) मौसमी परिवर्तनों का विक्रम पर प्रभाव, उदाहरण के लिए, यदि कुल वार्षिक विक्रय का अधिकांश भाग कुछ ही माह में होता है, तो विक्रय व्यय का भार उन्हीं महीनों में अधिक होगा।
(ब) वितरण व्यय : निर्मित माल को संग्रहालय में रखने के सम्बन्ध में इस प्रकार के व्यय किये जाते हैं। इस व्यय के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है:
(i) आवश्यक भण्डार गृहों के सम्बन्ध में किये गये किराया, कर, मजदूरी, बीमा, इत्यादि सम्बन्धी खर्चे ।
(ii) वस्तुओं को रखने व बेचने के दौरान आवश्यकता पड़ने पर 'हैंडलिंग का व्यय
(iii) विक्रय के भौगोलिक नमूने को ध्यान में रखते हुए किया जाने वाला यातायात व्यय।
(iv) यातायात का प्रचार व स्वामित्व ।
(स) विक्रय कार्यालय व्यय इसके अन्तर्गत विक्रय कार्यालय का किराया, कर, प्रकाश, डाक व स्टेशनरी तथा स्टाफ का वेतन, आदि के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस प्रकार के खर्चे विक्रय मात्रा में परिवर्तन होने पर उसी सीमा तक परिवर्तित नहीं होते हैं, जिस सीमा तक प्रत्यक्ष विक्रय व वितरण व्यय परिवर्तित होते हैं।
(द) विज्ञापन व्यय : सामान्यतः प्रबन्ध नीति के रूप में विज्ञापन पर कुल खर्चा निश्चित कर लेता है और उचित दृष्टिकोण से यह खर्चा स्थिर होता है। समय-समय पर विज्ञापन का प्रकार जैसे समाचार-पत्र, दुकान की दिखावट, पोस्टर्स प्रदर्शनी तथा उन पर होने वलो खर्चे का अनुमान लगा लिया जाता है।
(4) उत्पादन बजट : जब विक्रय बजट का निर्माण पूरा हो जाता है तो यह आवश्यक हो जाता है कि विक्रय अनुमान व स्कन्ध की मात्रा को पूरा करने के लिए प्रत्येक वस्तु की उत्पादन योग्य इकाई का निर्धारण किया जाय। इसके लिए उत्पादन बजट तैयार किया जाता है। उत्पादन बजट विक्रय बजट की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही बनाया जाता है। उत्पादन बजट में केवल उत्पादन योग्य वस्तुओं की इकाईयों का नहीं, बल्कि उनकी प्रति इकाई लागत और कुल लागत का भी अनुमान लिया जाता है। उत्पादन बजट की तैयारी के लिए यह आवश्यक होता है कि प्रबन्ध निर्मित माल के स्टॉक के सम्बन्ध में सुनिश्चित नीति बनाता हो और साथ ही साथ उत्पादन विभाग के पास निश्चित उत्पादन अनुसूचीयन हो । चूंकि उत्पादन अनुसूचीयन में यह निर्धारित करना पड़ता है कि 'कब' और 'कितना' उत्पादन किया जायेगा, अतः यह कार्य मुख्य रूप से फैक्टरी विभाग का होता है।
उत्पादन बजट का मुख्य उद्देश्य न्यूनतम लागत पर इतना उत्पादन करना होता है जितना कि व्यापार की मांग के अनुसार आवश्यक हो । यदि विक्रय बजट की आवश्यकतानुसार वस्तु की इकाइयों का उत्पादन सम्भव नहीं है तो विक्रय बजट में ही संशोधन करना पड़ता है।
(5) संयन्त्र उन व्यवसायों में, जहां प्लाण्ट अधिक मूल्यवान होते हैं, और उत्पादन कार्य मुख्यतः मशीनों की सहायता से किया जाता है, प्लाण्ट बजट बनाना नितान्त आवश्यक होता है। इस प्रकार बजट में सामान्यतः निम्न सूचनाएं शामिल की जाती है :
(अ) विभागानुसार मशीनों की संख्या ।
(ब) मशीनों का प्रारम्भिक ह्रास और वर्तमान पुस्तक मूल्य
(स) मशीनों का उपयुक्त कार्य व वर्तमान कार्य - भार
(द) मशीनों का कुल जीवन काल व शेष जीवन-काल ।
(य) पुरानी मशीनों की नयी मशीनों द्वारा प्रतिस्थापन की आवश्यकता व उसके लिए आवश्यक धनराशि ।
(र) नवीन यन्त्रों से होने वाली अनुमानित आय ।
इसी प्रकार अन्य स्थायी सम्पत्तियों के सम्बन्ध में भी बजट तैयार किये जा सकते हैं। परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि इन बजटों का समन्वय वित्तीय बजट व उत्पादन में अवश्य होना चाहिए
(6) प्रत्यक्ष सामग्री बजट : प्रत्यक्ष सामग्री से तात्पर्य उस कच्चे माल से होता है, जिसको निर्मित दशा में परिवर्तित किया जाता है तथा जिसके सहयोग से अन्तिम उत्पादन का निर्माण किया जाता है। इस माल के सम्बन्ध में बजट बनाते समय उत्पदन बजट को ध्यान में रखा जाता है। जिस अवधि के लिए बजट तैयार किया जा रहा हो, उस अवधि में उत्पादन बजट के आधार पर उत्पादन करने में जितने कच्चे माल की आवश्यकता होगी, उसी के सम्बन्ध में यह बजट बनाया जाता है। स्पष्ट है कि बजट का निर्माण करने से पूर्व कच्चे माल से सम्बन्धित सभी समस्याओं पर विचार कर लिया जाये और उनका निराकरण भी ढूंढ लिया जाये।
कुछ माल एक विशेष मौसम में ही प्राप्त होता है और कुछ माल को बाहर से मंगाना पड़ता है तथा कुछ ऐसा माल भी होता है, जिसको पहले ही खरीदकर जमा करने का मतलब व्यर्थ में पूंजी फंसाना होता है। अतः कच्चे माल की बजट की तैयारी में निम्न के बारे में पूर्वानुमान शामिल होता है:
(अ) उत्पादन बजट के आधार पर निर्धारित अवधि में भण्डार में रखने योग्य सामग्री की मात्रा ।
(ब) मंगायी जाने वाली सामग्री की कारखाने में उपलब्धि की तिथियां ।
(स) खरीदी जाने वाली सामग्री का मूल्य
(द) खरीद की शर्त अर्थात् नकद भुगतान करना पड़ेगा या / और उधार भी मिलेगा।
(य) उधार क्रय की शर्तें व भुगतान की अवधि |
उपर्युक्त सूचनाओं में सबसे महत्वपूर्ण सामग्री की मात्रा का पूर्वानुमान है। इसकी संगणना करते समय उत्पादन की मात्रा, प्रति उत्पादन इकाई में सामग्री की बचत, भण्डार तथा उत्पादन कार्य में होने वाला सामान्य-क्षय और असाधारण-क्षय की प्राप्ति, इत्यादि बातों को ध्यान में रखना चाहिए ।
(7) प्रत्यक्ष श्रम बजट उत्पादन बजट में निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक श्रम-शक्ति का अनुमान ही श्रम बजट कहलाता है। यह निर्विवाद सत्य है बिना पर्याप्त श्रम के उत्पादन के अन्य साधनों का कोई महत्व नहीं होता है और वे निष्क्रिय माने जाते हैं। श्रम के द्वारा ही इन साधनों में जीवन का संचार लाया जाता है। इस प्रकार श्रम बजट की उपयोगिता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। श्रम बजट का निर्माण श्रम विभाग द्वारा किया जाता है और बजट में निम्न सूचनाएं सम्मिलित की जाती है:
(अ) आवश्यक श्रमिकों की संख्या व उनकी श्रेणी ।
(ब) विभिन्न श्रेणी के श्रमिकों की मजदूरी की दरें और उन मजदूरी की दरों पर प्राप्त श्रमिकों की संख्या ।
(स) प्रत्येक उत्पादन – अवधि में श्रमिकों पर किया जाने वाला कुल खर्च ।
(द) श्रमिकों के प्रशिक्षण की सुविधा, उन पर किया जाने वाला खर्च व समय ।
(य) श्रमिकों की संख्या में मौसमी परिवर्तन अर्थात् किस मौसम में श्रमिकों की संख्या अधिक होगी।
(२) श्रमिकों की संख्या में प्रदत्त सुविधाएं एवं छुट्टियों का विवरण।
(8) अनुसन्धान तथा विकास बजट : आधुनिक प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रत्येक व्यवसायिक संस्था को लागत व्यय कम करने में श्रेष्ठतम उत्पादन करने के लिए चाहिए कि वह हमेशा सामान्य व तकनीकी विषयों पर अनुसन्धान करती रहे और विकास सम्बन्धी योजना बनाती रहे। इसके सम्बन्ध में किया जाने वाला खर्च एक प्रकार का विनियोग ही होता है, बेकार खर्च नहीं । अतः इसके सम्बन्ध में भी बजट बना लेना आवश्यक होता है। शोधकार्य द्वारा वस्तुओं के गुण व किस्म में ऐसा परिवर्तन लाया जा सकता है कि वह समय की मांग को पूरा कर सके। अनुसन्धान तथा विकास बजट का हमेशा वित्तीय बजट से सम्बन्ध होता हे और प्रत्येक वर्ष के लाभ का कुछ भाग इस कार्य के लिए अलग रख दिया जाता है।
( 9 ) अप्रत्यक्ष व्यय बजट : उत्पादन के सम्बन्ध में किये जाने वाले अप्रत्यक्ष खर्चों के सम्बन्ध में एक अलग से बजट बनाया जा सकता है। चूंकि अप्रत्यक्ष व्यय विभिन्न क्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं, अतः इस प्रकार के बजट को कई भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम, कारखाना अप्रत्यक्ष व्यय बजट जिसका सम्बन्ध उत्पादन विभाग से होता है। अतः इससे सम्बन्धित आंकड़े उत्पादन विभागाध्यक्ष से प्राप्त हो सकते हैं। द्वितीय विक्रय अप्रत्यक्ष व्यय बजट जिसका सम्बन्ध विक्रय विभाग से होता है। तीसरे, प्रशासन अप्रत्यक्ष व्यय बजट जिसका सम्बन्ध प्रशासन से होता है। चौथे, वित्तीय अप्रत्यक्ष व्यय बजट जिसमें ऐसे खर्चे शामिल होते हैं जिनका लेखा लागत लेखा विधि में नहीं आता, जैसे, कर छूट, अप्राप्य ऋण, आदि। इस विषय में जानकारी प्रमुख लेखापालक से प्राप्त की जा सकती है।
( 10 ) वित्तीय बजट वित्तीय बजट एक प्रकार के अनुमानित आय व व्यय के आंकड़े होते हैं जिनके आधार पर संस्था की कार्यशील पूंजी का सही अनुमान लगाया जाता है अन्य शब्दों में, वित्तीय बजट के अन्तर्गत पूर्वानुमानित स्थिति विवरण व लाभालाभ खाते आते हैं जिनके आधार पर यह ज्ञात किया जाता है निश्चित बजट अवधि के अन्त में संस्था के पास कितनी रकम नकद धन के रूप में शेष रहेगी। इस बजट के आधार पर ही व्यवसाय का मालिक या रोकड़िया यह अनुमान लगा पाता है कि एक निश्चित अवधि में व्यापारिक क्रियाओं के सम्पादन में नकद धन की कितनी आवश्यकता पड़ेगी। इस वित्तीय बजट में मुख्य रूप से 'नकद धन बजट' और 'पूंजी खर्च बजट' आते हैं जिनका विस्तारपूर्वक अध्ययन पहले किया जा चुका है।
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