तर्क एवं विश्वास - logic and belief

तर्क एवं विश्वास - logic and belief


दर्शन में तर्क कथनों की श्रृंखला है जिसके द्वारा किसी प्रतिज्ञप्ति (कथन), युक्ति या प्रत्यय को सत्य व वैध मानने के लिए कारण दिये जाते है। पहले तर्क के मुख्य बिन्दु, दिये जाते है फिर उन्हीं बिन्दुओं के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। मनुष्य के अन्द्र असाधारण क्षमता है जिसके द्वारा ज्ञान सम्भव है, वह है “अमूर्तिकरण के द्वारा अवधारणाओं का निर्माण करना। हम इन्द्रियों द्वारा सिर्फ कुछ संवेदनाएं प्राप्त करते हैं, इन्ही संवेदनाओं को जोड़ कर हम किसी भी विषय या वस्तु का ज्ञान प्राप्त करते है। इस तरह तर्क बुद्धि ज्ञान प्राप्त करने का आधार है व तर्क देना ज्ञान को स्थापित या सिद्ध करने के लिए मुख्य आधार बनाना है। तर्क को स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम प्रतिज्ञप्तियों अथवा तर्कवाक्यों के आधार पर युक्तियों का निर्माण करते हैं तत्पश्चात युक्ति की वैधता या अवैधता की जाँच करते है जैसे- 


1) आधार वाक्य वह वाक्य जो सबसे पहले कहा जाता है जो एक या उससे अधिक भी हो सकता है। 


2) निष्कवर्ष वाक्यण आधार वाक्य अथवा असत्य ता वाक्यों पर जब निष्षतः अन्य वाक्य अनुमितबकिया जाता है, उसे हम निष्कर्ष वाक्य कहते है।


आधार वाक्य की सत्यता अथवा असत्यता से ही निष्कर्ष वाक्य की सत्यता का ज्ञान होता है और परिणामस्वरूप युक्ति की वैधता या अवैधता का ज्ञान होता है। उदाहरण के लिए आधार वाक्य सभी मनुष्य पशु है। निष्कर्ष वाक्य - कुछ पशु मनुष्य है।


यहाँ कुछ पशु मनुष्य है की सत्यता का ज्ञान सभी मनुष्य पशु है, से हुआ है। तर्क से अनुमान दो तरह से लगाया जा सकता है।


1) निगमनात्मक


2) आगमनात्मक


निगमनात्मगक तर्क में जब आधार वाक्य की सत्य ता स्थापित है तब निष्कर्ष को भी स्वतः सिद्ध मान लिया जाता है। इस तरह यदि आधार वाक्य सत्य हुआ तब निष्कर्ष वाक्य अनिवार्यतः सत्य होगा और युक्ति वैध होगी। उदाहरण


सभी मनुष्य मरणशील है। (प्रथम आधार वाक्य-सत्य) 


राम एक मनुष्य है। (द्वितीय आधार वाक्य-सत्य)


अतः राम मरणशील है। ((निष्कर्ष वाक्य-सत्य)


पुनः निगमनात्मक तर्क प्रणाली में हम देखते है

कि सामान्य अभिकथनों के आधार पर विशेष निष्कर्ष प्रतिपादित होता है। आगमनात्मक तर्क- आगमनात्मक तर्क का यह लक्षण होता है कि इसका निष्कर्ष आधार वाक्यों में आपादित नहीं होता है। उसके आधार वाक्य-निष्कर्ष की सत्यता के लिए संभावित आधार प्रस्तुत करते हैं निश्चित प्रमाण नहीं। इसलिए आधार वाक्यों के सत्य होने पर निष्कर्ष के सत्य होने की संभावना होती है पर निश्चितता नहीं। चूँकि संभावना हमेशा मात्रात्मक होती है अतः कुछ आगमनात्मीक तर्क की सिद्धता ज्यादा रहती है, कुछ की कम रहती है। उदाहरण


राम चेचक के रोगियों के संपर्क में रहा है। अतः राम को चेचक की बीमारी हो सकती है।


इस तरह से हम इन्द्रियानुभव द्वारा प्राप्त संवेगों को तर्क बुद्धि या तर्कानुमान द्वारा ज्ञान में परिवर्तित करते है। पुनः आगमनात्मक पद्धति की विशेषता है कि इसमें हम विशेष से सामान्य निष्कर्ष निकालते है जैसे


राम मरणशील है।


श्याम मरणशील है 


मोहन मरणशील है


अतः सभी मनुष्य मरणशील है।


विश्वास


दर्शन में विश्वानस मूलतः उस प्रवृत्ति को कहते है, जो हमें किसी प्रत्यय के सत्यय होने के लिए स्वीकारोक्ति देती है।

यदि किसी वक्तव्य पर विश्वास है तो जरूरी नहीं है कि उस वक्तव्य या प्रत्यय पर गहन चिंतन जरूरी हो। सन्त आगस्तीन ने कहा था कि विश्वास खोजता है और बुद्धि प्राप्त करता है। अतः विश्वास भी ज्ञान का महत्वपूर्ण स्रोत है। विश्वा स का भी स्रोत प्रारम्भिक अवस्था में अनुभव है जो हम अपनी इन्द्रियों द्वारा करते हैं। क्लिफर्ड कहते है कि ऐसा सोचना गलत है कि हमे अधूरे साक्ष्य के आधार पर ही विश्वास खड़ा कर लेते हैं। विश्वा स को समझने के लिए पहले हम तर्कसंगत विश्वास के विषय में चिंतन कर लेते हैं। तर्कसंगत विश्वास के लिए भरपूर तथ्यो, साक्ष्य अथवा कारण होने चाहिए।


विश्वास के लिए साक्ष्य ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभूतित हो सकते हैं। जो हम देखते, सुनते, महसूस करते हैं उन संवेदनाओं से जनित तर्क को या ज्ञान को साक्ष्य की जरूरत नही होती है। अन्य स्रोत चाहे वह अन्तःप्रज्ञा या हमारी आन्तरिक स्थिति द्वारा जो विश्वास उत्पन्न होता है उसकी प्रक्रिया को जॉन हिक्स अपनी पुस्तक धर्म दर्शन' मे क्रमबद्ध करते हुए वर्णन करते है कि


→ साक्ष्य → अनुमान → विश्वास


पहले साक्ष्य प्रस्तुत होता है तत्पश्चात उस पर अनुमान लगाया जाता है तथा उस अनुमान के आधार पर विश्वास निर्मित होता है। कई स्वतः सिद्ध प्रस्ताव भी होते है जिन पर विश्वास के लिए साक्ष्य की जरूरत नहीं होती है। जैसे- 2+2=4, दुनियां है, आदि। व्यक्ति के स्मृति पर आधारित विश्वास जैसे- “आज मैंने दोपहर का भोजन किया है।” ऐसे विश्वास जो असंशोधनीय है जैसे मै जिंदा हूँ इत्यादि । इस तरह हमने विश्वास के जितने प्रत्यैय समझे उन सभी को मुख्यतः दो भागों में बाँट सकते है।


1) स्वतः सिद्ध प्रस्ताव पर आधारित


2) असंशोधनीय तथ्यों पर आधारित


स्वतः सिद्ध प्रस्ताव पर आधारित विश्वास जो कि सबके लिए एक व बराबर रहते है। लोगों के विभिन्न व्यक्तिगत अनुभव इनमें से किसी विश्वास पर प्रभाव नहीं डालते हैं। इन विश्वासों की सिद्धता की स्थिति हमेशा एक रहती है। व्यक्तिगत विभिन्नता और उस विभिन्नता से उत्पन्न अनुभव व अनुभूति से विश्वास की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आता है। असंशोधनीय प्रस्तावों पर आधारित विश्वास की व्युत्पनत्ति व्यक्तिगत या सामुदायिक अनुभव व अनुभूतियों पर आधारित है। चूँकि यह विश्वास अनुभवाधारित है, वे हर व्यक्ति के लिए अनोखी व अद्वितीय है। इसलिए ये विश्वास हर व्यक्तित्व के अनुभव की सीमा के अन्तर्गत ही अस्तित्व रखता है।


अन्त में निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते है कि ज्ञान के स्रोत में विश्वास का स्थान महत्वपूर्ण है परन्तु इस विश्वास को आधार मान कर ज्ञान को सर्वधा सत्य सिद्ध नही कर सकते हैं।