स्त्री आरक्षण पर एक नजर - A look at women's reservation

स्त्री आरक्षण पर एक नजर - A look at women's reservation


आज पूरी दुनिया की आधी आबादी स्त्रीयों की है और परिवार व समाज की अधिसंख्य जिम्मेदारियाँ उनके ऊपर हैं। बावज़ूद इसके उनकी स्थिति अच्छी नहीं है। उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है। हालांकि दुनिया के देशों में जैसे-जैसे लोकतांत्रिक व समाजवादी व्यवस्थाएँ मजबूत होती गई वैसे वैसे उनकी स्थिति कुछ बेहतर होती गई। दुनिया के कई देशों ने उनके सशक्तिकरण के कई-एक विशेष व्यवस्थाएँ की। उनके लिए विशेष कानून बनाए गए। जिसके चलते शिक्षा, नौकरियों और राजनीतिक क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ा। किंतु भारत जैसे पुरूष प्रधान पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ स्त्रीयों की घर की चाहरदिवारी से बाहर उन्हें अनुपयुक्त और असमर्थ मानने की परंपरा रही है वहाँ पर उनकी स्थिति में परिवर्तन के लिए बातें आज़ादी की लड़ाई के दिनों में जोर पकड़ने लगी और सन 1920 में पहली बार अखिल भारतीय स्त्री कांग्रेस स्त्रीयों का संगठन अस्तित्व में आया,

जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुआ और जिसके जरिए भारतीय राजनीति में स्त्रीयों का प्रथमतः प्रत्यक्ष सामूहिक प्रतिनिधित्व हुआ। और इस स्त्री संगठन की समय-समय पर की जाने वाली माँगों का हिन्दुस्तान के प्रायः सभी राजनीतिक दल समर्थन करते रहें।।


आज़ादी की लड़ाई के दौरान भारत में होने वाले चुनावों में स्त्रीयों के लिए मतदान करने के अधिकार को लेकर माँग की जाती रही। सबसे पहले सरोजनी नायडू ने स्त्रीयों के लिए पुरूषों के बराबर राजनीतिक अधिकार की माँग की, जिसका समर्थन कांग्रेस, मुस्लिम लीग और होम रूल लीग आदि राजनीतिक दल भी करते रहे। किंतु अंग्रेज़ी सरकार इस आधार पर इस माँग का विरोध करती रही कि ऐसे समाज में जहाँ पर्दा प्रथा और स्त्रीयों के लिए शिक्षा का निषेध हैं, वहाँ की स्त्रीयों को चुनाव लड़ने और मतदान का अधिकार देना काफ़ी जल्दी होगी। इसके बावजूद भी सन 1921 में मुंबई और मद्रास में पुरूषों की तरह संपत्ति और आदमनी की शर्तों पर स्त्रीयों को मतदान का अधिकार दिया गया। वास्तव में भारतीय राजनीति में स्त्रीयों ने पहली बार जीत हासिल की और अपनी अहमियत को साबित किया।


सन 1932 में चुनाव कराने के लिए भारत में दौरे पर आई व्यस्क मताधिकार समिति के समक्ष उपस्थित होकर यहाँ की स्त्री संगठनों ने लिंग संपत्ति या साक्षर योग्यता के बिना सबको मतदान करने का अधिकार देने की माँग की गई। अंग्रेज़ी सरकार ने पूर्व की तरह ही इसे मानने से इनकार कर दिया किंतु शहरी क्षेत्र की स्त्रीयों को मतदान करने का अधिकार दे दिया।


सन 1935 में स्त्रीयों के लिए 41 सीटें सुरक्षित की गई। सन 1937 के चुनावों में विधान मंडलों की 56 स्त्री सदस्यों में से केवल 10 अनारक्षित सीटों तथा शेष 5 नामित की गई थी। इसी तरह संविधान पर चर्चा के लिए संविधान सभा के गठन होने पर उसमें 11 स्त्री सदस्यों को नामित किया गया। इस तरह से भारत में हम स्त्री संदर्भ को दृष्टिगत रखते हुए सकरात्मक विभेद के सूत्र तलाश सकते हैं। थोड़े और विस्तार से बात की जाए तो आज़ादी के बाद भारतीय संविधान में घोषित तौर पर अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बच्चों तथा स्त्रीयों के लिए विशेष उपबंध करने के प्रावधान की व्यवस्था दी गई, जिसके आलोक में अन्यों के साथ-साथ स्त्रीयों के लिए कई क़ानून बनाए गए तथा राजनीतिक अधिकार, जिन्हें हम सकारात्मक विभेद विस्तार हो सकते हैं।