महात्मा गांधी - Mahatma Gandhi

महात्मा गांधी - Mahatma Gandhi


महात्मा गांधी एक प्रमुख भारतीय विचारक हैं जिन्होंने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को जीवन का मूल्य बनाया और इन्हीं मूल्यों के पालन के लिए हमें अभि प्रेरित किया।


जीवन परिचय: गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को कठियावाड़ राज्य के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ उनका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। उनके पिता करमचन्द पोरबन्दर राज्य के दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई धार्मिक विचारों वाली महिला थी। 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा गांधी से उनका विवाह हुआ। गांधी जी के जीवन पर उनकी माता का गहरा प्रभाव पद्म। गांधी जी की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई। उनका परिवार सन् 1876 में राजकोट चला गया। वहीं के विद्यालय में उन्होंने सन् 1887 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर सन् 1891 में वे बॅरिस्टर की उपाधि लेकर इंग्लैण्ड भारत लौटे। सन् 1893 में एक मुकदमे में वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए।

वहां उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे सरकारी अत्याचारों के विरोध में सत्याग्रह आंदोलन किया। वहां से आकर सन् 1915 में उन्होंने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की।


गांधी जी के विचारों पर प्रभाव डालने वाले तत्व :- 


गोखले को राजनैतिक गुरू मानते हुए उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। गांधी जी ने छोटे स्तर पर तीन प्रमुख आंदोलन किए। पहला चपारण (बिहार) में सन् 1917 में गाधीजी ने खेतिहर मजदूरों के शोषण के विरुद्ध सत्याग्रह किया। दूसरा सन् 1918 में अहमदाबाद के कारखानों के मजदूरों के हितों के लिए किया। सन् 1918 में उनका तीसरा आंदोलन बम्बई प्रेसीडेन्सी के खेड़ा जिले में अंग्रेजी सरकार की कर नीति के विरुद्ध था। सन् 1919 में रौलेट एक्ट का विरोध करने के कारण उनको 6 वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। सन् 1919 से 1922 तक उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए अनेक प्रयास किए। सन् 1930 में उन्होंने दाण्डी सत्याग्रह किया।

सन् 1931 में गाधी इरविन ऐक्ट तथा सन् 1932 में लंदन में हुए द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का प्रतिनिधित्व किया। सन् 1942 में उनके द्वारा भारत छोडो आंदोलन प्रारंभ किया गया जिसमें उन्होंने 'करो या मरो का नारा दिया।


गांधीजी की प्रमुख कृतियाँ: गांधी जी ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति समय-समय पर पत्रकार के रूप में यंग इंडिया, 'हरिजन', 'हरिजन सेवक', 'हरिजन बंधु आदि समाचार पत्रों के माध्यम से की। उन्होंने अनेक पुस्तकों की भी रचना की जिसमें मुख्य निम्नलिखित है-


• हिंद स्वराज


• दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह


• अपनी आत्मकथा (आत्मकथा) 


• मेरे सत्य के साथ प्रयोग


• सर्वोदय


• सत्याग्रह


• गौता बोध


गांधी जी का जीवन-दर्शन सर्वोदय के सिद्धांत पर आधारित था। उनके मत में सर्वोदय का अर्थ-सभी के उदय से संबंधित है जिसमें व्यक्ति के उदय के साथ-साथ समाज का उदय भी निहित हैं।

गांधी जी वर्ग-विहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। गांधी जी की विचारधारा सत्य और अहिंसा पर आधारित थी। उनके मतानुसार सत्य में ही शिव और सुन्दर निहित है। गांधी जी का दूसरा महामंत्र अहिंसा थाअहिंसा परमो धर्मः। अहिंसा और सत्य परस्पर ऐसे ओतप्रोत है, जैसे-सिक्के के दोनों रूप अहिंसा को साधन और सत्य को साध्य मानना चाहिए।


गांधी जी के शिक्षा संबंधी विचार उनके समाचार पत्र हरिजन में लिखे गये लेखों में मिलते हैं। गांधी का कथन है, "जो शिक्षा चित्त की शुद्धि न करें, मन और इन्द्रियों को वश में रखना न सिखाए, निर्भरता और स्वावलंबन न पैदा करे, उस शिक्षा में चाहे जितनी जानकारी का खजाना, तार्किक कुशलता और भाषा साहित्य मौजूद हो वह सच्ची शिक्षा नहीं। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा द्वारा बालक को हस्तकौशल स्वावलंबन और व्यवहार कुशलता की प्रेरणा दी जानी चाहिए। 

गांधीजी के अनुसार शिक्षा की परिभाषा


शिक्षा को परिभाषित करते हुए गांधी जी ने कहा है "शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक तथा मनुष्य में निहित शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठ शक्तियों का सर्वागीण विकास करना है।"


इस परिभाषा के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा द्वारा शरीर, मस्तिष्क, हृदय और आत्मा का सर्वागीण विकास होना चाहिए। शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं है। उनका कहना था, "साक्षरता न तो शिक्षा का अन्त है और न शिक्षा का प्रारम्भ। वह केवल एक साधन है जिसके द्वारा पुरुष और स्त्री को शिक्षित किया जा सकता है।" 


गांधीजी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य 


गांधी के मत में शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्य निम्नलिखित है-


1. जीविकोपार्जन का उद्देश्य गांधी जी का मानना था, "शिक्षा को बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा देनी चाहिए जिससे विद्यार्थियो कीप्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। 


2. सांस्कृतिक विकास ( Cultural Development):- "गांधी जी सांस्कृतिक विकास को अधिक महत्व देते थे। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा "संस्कृति बालिकाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।" 


3. नैतिक विकास (Moral Development):- नैतिक अथवा चारित्रिक विकास को गांधी जी अधिक महत्व देते हैं। उनका मानना था कि, "समस्त ज्ञान का उद्देश्य चरित्र का विकास करना होना चाहिए। "चरित्र के बिना शिक्षा और पवित्रता व्यर्थ है।


4. व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास (Harmonious Development of Personality) गांधीजी के अनुसार बालक के सभी पक्षों को इस रूप में विकसित किया जाना चाहिए जिससे उसके व्यक्तित्व का सामजस्यपूर्ण विकास हो सके गांधी जी का विश्वास है कि जब तक मस्तिष्क और शरीर का विकास आत्मा की जागृति के साथ नहीं होगा, तब तक पहले प्रकार का विकास एकांगी सिद्ध होगा।

गांधीजी की कार्य पद्धति गांधी जी की कार्य पद्धति प्रयोजनवाद पर आधारित थी। गांधी जी के आदर्श राज्य के मूल में सर्वोदय की भावना है, जिसका अर्थ है सबका उदय गांधी जी ने अपने जीवनकाल में पाँच प्रमुख आन्दोलनों को चलाया। उनका उद्देश्य व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर होने वाले कुठाराघात का प्रतिरोध करना था। उनका मानना था कि भारत की अधिकांश जनता गाँव में निवास करती है और कोई भी व्यवस्था यदि ग्राम से संबंधित नहीं है तो अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होने के बजाए और कमजोर होगी।


सत्याग्रह आंधीजी की कार्यपद्धति सत्याग्रह पर आधारित थी। सत्याग्रह सत्य और आग्रह दो शब्दों से मिलकर बना है। उनके अनुसार यह क्रियात्मक असहयोग का अंग था। दक्षिण अफ्रीका में सबसे पहले गांधी जी ने इसका प्रयोग किया। शिक्षा के संबंध में गांधीजी के विचार गांधीजी के अनुसार वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को समाज के प्रति उसे अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के लिए जागरूक करे। उनके विचार से सदाचार और निर्मल जीवन सच्ची शिक्षा का आधार है। बुनियादी शिक्षा गांधीजी मानते थे कि प्राथमिक शिक्षा ही बुनियादी शिक्षा है।

उनके अनुसार शिक्षा में हस्तकला का महत्व होना चाहिए क्योंकि यह जीवन के यथार्थ से संबंधित होती है। गांधी जी कहते थे कि "शिक्षा की मेरी योजना में हाथ से अक्षर लिखने से पहले औजार चलाना होना चाहिए। यह तालीम दुनिया की दूसरी शिक्षा पद्धतियों से जल्दी फलदेने वाली होगी।" उच्च शिक्षा संबंधी विचार उनके अनुसार उच्च शिक्षा की योजना राष्ट्रीय आवश्यकता को दृष्टि में रखकर की जानी चाहिए। गांधी जी कहते थे देश की उन्नति को ध्यान में रखते हुए उद्योग व्यापार, कला और विज्ञान के क्षेत्रों में अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए विश्वविद्यालय और उनके अंतर्गत महाविद्यालयों को अपनी शिक्षा योजना बनानी होगी और फिर उसे क्रियान्वित करना होगा। स्त्री शिक्षा से संबंधित गांधीजी के विचार गांधी जी स्वी शिक्षा के पक्षधर थे क्योंकि उनका मानना था कि स्त्रियों को समाज में उपयुक्त और सम्मानीय स्थान पाने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। एक सुरक्षित नारी केवल अपने परिवार को ही भली भति नहीं संभालती है बल्कि मुसीबत में स्वयं अपनी रक्षा करने में भी समर्थ होती है।


गांधीजी का भारतीय शिक्षा प्रणाली में योगदान

(Gandhiji's Contribution to Indian Education System)


भारतीय शिक्षा प्रणाली को गांधी जी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन 'बुनियादी शिक्षा है' जिसे "वर्धा शिक्षा योजना के नाम से जाना जाता है।

वर्धा शिक्षा योजना या बुनियादी शिक्षा (Basic Education) के अनुसार गांधीजी अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने के विरोध में थे। गांधी जी के अनुसार साक्षरता स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है। इसलिए वे बच्चों की शिक्षा की शुरुआत में कोई उपयोगी दस्तकारी सिखाने के पक्ष में थे। गांधीजी के अनुसार बुनियादी शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएँ थी:


• उदयोग द्वारा शिक्षण


• अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा शिक्षा का माध्यम मातृभाषा


• बालक के वास्तविक जीवन से संबंधित शिक्षा


• स्वावलंबी बनाने वाली शिक्षा।


• सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास। 


• सुयोग्य चरित्रवान नागरिक बनाने वाली शिक्षा