कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध - Management of Working Capital

कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध - Management of Working Capital


प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को दो प्रकार की पूंजी की आवश्यकता होती है स्थिर पूंजी व कार्यशील पूंजी । व्यवसाय के संचालन में स्थायी रूप में प्रयोग हेतु कुछ सम्पत्तियों की आवश्यकता पड़ती हैं, जिन्हें स्थायी सम्पत्ति कहते हैं और इनमें लगायी गयी पूंजी स्थायी या स्थिर पूंजी कहलाती है। इसके विपरीत, व्यवसाय के संचालन सम्बन्धी दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु भी सम्पत्तियों की जरूरत पड़ती है, जिन्हें चल सम्पत्ति कहते हैं और इनमें लगायी गयी पूंजी को चालू पूंजी या कार्यशील पूंजी कहते हैं।


परन्तु तकनीकी दृष्टिकोण से कार्यशील पूंजी की परिभाषा के सम्बन्ध में एकमत नहीं है। वर्तमान में दो प्रकार की विचारधाराएं विशेषज्ञ हैं और इन्हें क्रमश: विस्तृत दृष्टिकोण (या सकल कार्यशील पूंजी दृष्टिकोण) व संकीर्ण दृष्टिकोण (या शुद्ध कार्यशील पूंजी दृष्टिकोण) कह सकते हैं। व्यापक दृष्टिकोण कार्यशील पूंजी के परिमाण पहलू पर बल देता है, जबकि सीमित दृष्टिकोण उसके गुणात्मक पहले को उजागर करता है ।


व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर कार्यशील पूंजी अल्पकालीन व दीर्घकालीन दोनों प्रकारों के दायित्वों द्वारा अधिग्रहित चल सम्पत्तियों के योग के बराबर होती है। इस प्रकार यह परिभाषा कार्यशील पूंजी की मात्रा या परिमाण पर अधिक जोर देती है। इस परिभाषा के पीछे दो तर्क निहित है। प्रथम, जब हम स्थायी सम्पत्तियों के अधिग्रहण में लगायी पूंजी को स्थायी पूंजी मानते हैं तो चल सम्पत्तियों के अधिग्रहण में लगायी गयी पूंजी को कार्यशील पूंजी मानना चाहिए। द्वितीय, चल सम्पत्तियाँ, चाहे वे किसी साधन क्यों न प्राप्त की गयी हों, दिन-प्रतिदिन संचालन सम्बन्धी क्रियाओं में प्रयुक्त होती है और उनका रूप परिवर्तित होता रहता है, अतः उन सबको कार्यशील पूंजी ही मानना चाहिए। इस दृष्टिकोण से प्रभावित होकर बानविले व डंबे ( Bonneville and Dewey ) ने कहा है कि किसी भी फण्ड की प्राप्ति को, जो चालू सम्पति को बढ़ाता है, कार्यशील पूंजी की संज्ञा दी जा सकती है।


संकीर्ण दृष्टिकोण के आधार पर चल सम्पत्तियों में से चल दायित्वों को घटाने के बाद जो शेष बचता है उसे ही कार्यशील पूंजी माना जा सकता है।

इस प्रकार यह परिभाषा कार्यशील पूंजी की मात्रा पर जोर न देकर उसके गुणात्मक पहलू पर जोर देती है। इस परिभाषा के अन्तर्गत कार्यशील पूंजी को शुद्ध कार्यशील पूंजी के रूप में भी समझा जा सकता है।


किसी भी संस्था की 'कार्यशील पूंजी' सामान्यतः कच्चे माल के स्कन्ध में, अंशतः तैयार माल के स्कन्ध में प्राप्त खातों में विक्रय योग्य प्रतिभूतियों में और रोकड़ में विनियोजित होती है। इस सभी रूपों में लगायी गयी पूंजी सतत रूप में नकद रोकड़ में परिवर्तित होती रहती है और यह रोकड़ पुनः कार्यशील पूंजी के अन्य प्रारूपों के बदल में बाहर चली जाती है। इस प्रकार यह सतत रूप में चक्र काटता रहता है । परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि रोकड़ या रोकड़ तुल्य सभी सम्पत्तियों के कुछ मूल्य को कार्यशील पूंजी का माप नहीं माना जा सकता है।


किसी भी संस्थान की 'कार्यशील पूंजी सामान्यतः कच्चे माल के स्कन्ध में, अंशतः तैयार माल के स्कन्ध में प्राप्त खातों में, विक्रय योग्य प्रतिभूतियों में और रोकड़ में विनियोजित होती है। इस सभी रूपों में लगायी गयी पूंजी सतत रूप में नकद रोकड़ में परिवर्तित होती रहती है और यह रोकड़ पुनः कार्यशील पूंजी के अन्य प्रारूपों के बदले में बाहर चली जाती है। इस प्रकार यह सतत रूप में चक्र काटता रहता है । परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि रोकड़ या रोकड़ तुल्य सभी सम्पत्तियों के कुल मूल्य को कार्यशील पूंजी का माप नहीं माना जा सकता है। चिट्टे के दूसरी तरफ दायित्वों का एक समूह होता है जिसमें मुख्य रूप से अधिविकर्ष, लेनदार, देय बिल व अन्य अल्पकालीन दायित्व होते हैं, जो इन सम्पत्तियों के मूल्यां में से अवश्य घटायें जाने चाहिए ताकि शुद्ध कार्यशील पूंजी निर्धारित की जा सके । यदि ऐसा नहीं किया जाय तो संस्था अपने आप को कार्यशील पूंजी से पूर्ण सुरक्षित समझ सकती है, जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि संस्था के पास कार्यशील पूंजी थोड़ी है या बिल्कुल नहीं है। इसलिए कार्यशील पूंजी को चालू सम्पत्ति का चालू दायित्व पर आधिक्य के रूप में परिभाषित करना यशोचित होगा।


इस विचारधारा के अनुसार यदि किसी संस्था की चल सम्पत्ति चल दायित्व से अधिक है, तो कार्यशील पूंजी के दृष्टिकोण से संस्था की स्थिति संतोषजनक व सुदृढ़ मानी जा सकती है। यदि संस्था की चल सम्पत्ति व चल दायित्व बराबर है, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि संस्था ने कार्यशील पूंजी के लिए पूर्ण रूप से अल्कालीन ऋणों का ही सहारा लिया है और दीर्घकालीन फण्ड के स्रोतों का प्रयोग स्थायी सम्पतियों के क्रय में ही किया है। स्पष्ट है कि वितीय स्थिति संस्था की वितीय सुदृढ़ता की परिचायक नहीं मानी जा सकती। यदि संस्था की चल सम्पत्ति चल दायित्व से कम है, तो यह वित्तीय संकट का प्रतीक माना जायेगा।


उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यावसायिक दृष्टि से चल सम्पतियों को कार्यशील पूंजी के रूप में माना जा सकता है, क्योंकि सम्पूर्ण चल सम्पत्तियां व्यवसाय के संचालन में प्रयोग होती है । परन्तु तकनीकी व लेखांकन दृष्टिकोण से कार्यशील पूंजी को चालू सम्पति व चालू दायित्व के अन्तर के बराबर ही मानना उचित होगा, क्योंकि यह अन्तर की मात्रा ही संस्था की वितीय सुदृढ़ता व सन्तोषप्रदता पर प्रकाश डाल सकती है।