कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध - management of working capital

कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध - management of working capital


व्यवसाय के अन्तर्गत कार्यशील पूंजी की एक पर्याप्त मात्रा अपरिहार्य होती है । व्यवसाय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कार्यशील पूंजी की मात्रा न तो उसेस अधिक होनी चाहिए और न ही उससे कम दोनों स्थितियां व्यवसाय के लिए हानिकारक सिद्ध होती है। परन्तु कार्यशील पूंजी की मात्रा निर्धारित करने के साथ-ही-साथ हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि विभिन्न चल सम्पत्तियां में विनियोग हेतु अल्पकालीन व दीर्घकालीन दायित्वों में विनियोग का अनुकलतम स्तर क्या हो और उन विनयोग हेतु अल्पकालीन व दीर्घकालीन दायित्वों के बीच अनुकूलतम मिश्रण क्या हो। अन्य शब्दों में, हमें यह निर्धारित करना पड़ता है कि चल सम्पतियों एवं चल दायित्वों का मात्रा स्तर क्या होना चाहिए (क्योंकि इसी से कार्यशील पूंजी की मात्रा का स्तर निर्धारित होता है) इस प्रकार के निर्धारण में संस्था की तरलता और ऋणों की अदायगी के सम्बन्ध में मूलभूत निर्णय शामिल होते हैं। अन्य शब्दों में हमें यह देखना पड़ता है

कि संस्था की तरलता की आवश्यकता क्या है और विभिन्न चल दायित्वों का भुगतान कब और किस अन्तराल पर करना है। संस्था के पास जितनी चल सम्पत्तियां हैं उन्हें किस दर से या किस सीमा तक नकद में परिवर्तित कर सकते हैं; संस्था की साख नीति एवं विधि क्या है, स्कन्ध का प्रबन्ध व नियंत्रण किस प्रकार हो रहा है और स्थायी सम्पतियों का प्रबन्ध कैसा है।


यदि संस्था द्वारा स्थायी सम्पतियों का प्रबन्ध प्रभावशाली है; स्कन्ध पर नियमित नियंत्रण हो रहा है और साख नीति व विधि वैज्ञानिक है, तो यह कहा जा सकता है कि तरल सम्पतियों का कुल सम्पतियों में जितना ही अनुपात कम होगा, संस्था के कुल विनियोग पर प्रत्याय की मात्रा उतनी ही अधिक होगी।


दूसरी तरफ चल दायित्वों के द्वारा अर्थ प्रबन्धन करने पर लागत की मात्रा दीर्घकालीन फण्ड की लागत से कम होती है,

अतः लाभदायकता के दृष्टिकोण से संस्था के कुल ऋणों में चल दायित्वों का अंश या मात्रा अधिक होनी चाहिए । यही नहीं अल्कालीन फण्ड के प्रयोग से संस्था को अधिक लाभ मिल सकता है क्योंकि ऋण का उस समय भुगतान किया जा सकता है जब व्यवसाय में उसकी आवश्यकता न हो । लाभदायकता की मान्यता के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि कुल सम्पतियां में चल सम्पतियों का हिस्सा कम होना चाहिए और कुल दायित्वों में चल दायित्वों का हिस्सा अधिक होना चाहिए? परन्तु इस सिद्धान्त के पाल करने पर कार्यशील पूंजी की मात्रा न केवल होगी बल्कि नकारात्मक भी हो सकती है अन्य शब्दों में इस सिद्धांत के पालन में संस्था के सामने जोखिम उपस्थित हो सकती है। इस संदर्भ में जोखिम का अर्थ तकनीकी अशोधन क्षमता से है। कानूनी अर्थ में अशोधन क्षमता उस समय उदित होती है जब सम्पत्तियां दायित्व से कम हो। तकनीकी अर्थ में, अशोधन क्षमता का अर्थ उस स्थिति से है, जब संस्था अपने चल दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ हो । जोखिक का मूल्यांकन तभी संभव हो सकताहै, जब हम संस्था की तरलता का विश्लेषण करें। तरलता से आशय सम्पतियों को तुरन्त नकद रूप में परिवर्तित करने की योग्यता से है। इस प्रकार यदि हम चल सम्पतियों का हिस्सा कम रखना चाहें तो यह आवश्यक हो जाता है कि सम्पतियों में तरलता की मात्रा अधिक हो, तभी जोखिम की हानि से बचा जा सकता है। वस्तुतः कार्यशील पूंजी की मात्रा निर्धारित करते समय इन सभी पहुलओं पर एकग्रचित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पड़ती है।