अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री का निर्माण - Manufacturing of Programmed Instruction Materials
अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री का निर्माण - Manufacturing of Programmed Instruction Materials
अभिक्रमित अनुदेशन की रचना निम्न पदों में की जाती है-
(1) प्रकरण / शीर्षक का चयन- प्रकरण छात्रों की दृष्टि से सरल व उपयोगी होना चाहिए।
(2) छात्रों के पूर्वज्ञान की सूचना प्रोगाम का निर्माण- जिन छात्रों के लिए किया जाता है उनके मानसिक स्तर, रुचि, आयु, योग्यताएँ व पूर्वानुभव आदि का ज्ञान प्राप्तकर लेना चाहिए।
(3) उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखना- उद्देश्यों का लेखन विषयवस्तु के आधार पर उपयुक्त कार्यपरक क्रियाओं के आधार पर किया जाता है।
(4) विषयवस्तु की रूपरेखा का निर्माण- इसके अंतगर्त निर्धारित किए गए उद्देश्यों के आधार पर यह सुनिश्चित करते हैं कि संपूर्ण विषयवस्तु का समावेश किया जाय । विषय वस्तु की रूपरेखा तार्किक अथवा मनोवैज्ञानिक आधार पर बनानी चाहिए।
( 5 ) मानदण्ड परीक्षा निर्माण- इस परीक्षा के अंतर्गत उन सभी व्यवहारों एवं कौशलों का मूल्यांकन किया जाता है जिन्हें सिखाने के लिए प्रोग्राम बनाया है। यही परीक्षण मानदंड कहलाते हैं। इस परीक्षण में उद्देश्यों, कौशलों के मूल्यांकन के अनुरूप वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को पूछा जाता है। इन मानदंड परीक्षाओं की विश्वसनीयता व वैधता का परीक्षण भी किया जाता है।
(6) अभिक्रम लेखन
a) फ्रेमों की रचना - इस पद में विषयवस्तु को छोटे-छोटे पदों के रूप में लिखा जाता है जो तीन तत्वों के अंतर्गत होता है-
(i) उद्दीपन- इसमें नई विषयवस्तु को प्रस्तुत किया जाता है।
(ii) अनुक्रिया- इसमें उद्दीपन के आधार पर की गई प्रतिक्रिया आती है ।
(iii) पुनर्बलन सही अनुक्रिया मिलने पर पुनर्बलन दिया जाता है
b) फ्रेम के प्रकार
(I) शिक्षण फ्रेम- इसमें नई विषयवस्तु का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। किसी प्रोगाम में यह फ्रेम
60% से 70% तक होते हैं।
(II) अभ्यास फ्रेम प्राप्त ज्ञान को स्थायी बनाने हेतु अभ्यास कराया जाता है। यह फ्रेम 20-25% तक
होते हैं।
(।।।) परीक्षण फ्रेम - सीखे गए ज्ञान के मूल्यांकन हेतु ऐसे फ्रेम 10% से 15% तक रखे जाते हैं
c) फ्रेमों में उपक्रमक ( Primes ) तथा अनुबोधकों (Prompts) का उपयोग - छात्रों द्वारा सही अनुक्रिया प्राप्त करने हेतु सहायक शब्द व सूचनाओं का प्रयोग किया जाता है। पहले इनका प्रयोग अधिक किया जाता है तथा धीर-धीरे हटा दिया जाता है।
d) फ्रेमों को उचित क्रम देना- फ्रेम निर्माण के पश्चात उसे उचित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है।
(7) प्रारंभिक ड्राफ्ट लेखन- उचित प्रकार के फ्रेम का निर्माण करने के उपरान्त सम्पादन किया जाता हैं तथा त्रुटियों को दूर किया जाता है।
( 8 ) परीक्षण- इस पद के अंतर्गत निर्मित ड्राफ्ट का परीक्षण व मूल्यांकन किया जाता है।
(I) व्यक्तिगत परीक्षण- इसमें प्रोग्राम को 4-5 छात्रों पर प्रशासित करते हैं तथा कमियों का पता कर आवश्यक सुधार करते हैं।
(II) लघु-समूह परीक्षण- संशोधित प्रोग्राम को पुन एक लघु समूह (10-20 छात्रों) पर प्रशासित करते
हुए पुनः सुझावों के आधार पर संशोधन किया जाता है।
( III) क्षेत्र परीक्षण- पुनः संशोधन करने हेतु एक बड़े न्यायदर्श पर प्रोग्राम को प्रशासित करते हैं। इस परीक्षण के आधार पर पुनः संशोधन करते हैं तथा वैधता स्थापित की जाती है।
(9) मूल्यांकन तथा वैधीकरण -
(I) प्रोग्राम त्रुटि दर ( प्रतिशत में) = त्रुटियों का संपूर्ण योग x 100 / पदों की संख्या × छात्रों की संख्या
रेखीय प्रोग्राम में त्रुटि दर 5-10% तथा शाखीय प्रोग्राम में 20% तक हो सकती है।
(II) अभिक्रम घनत्व - इससे प्रोग्राम की कठिनाई स्तर का पता लगाया जाता है।
अभिक्रम घनत्व = छात्रों द्वारा विभिन्न प्रकार की अनुक्रियाओं की संख्या / कुल अनुक्रियाओं की संख्या
इसका मान 0.25 से 0.33 के मध्य रहना चाहिए।
(III) तारतम्य प्रवाह - तारतम्य प्रवाह स्केलोग्राम की सहायता से देखा जाता है। मानदण्ड परीक्षण के प्राप्ताकों के आधार पर 'स्केलोग्राम' तालिका बनाई जाती है तथा तालिका से क्रम व्यवस्था में सुधार किया जाता है।
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