मैसलो का आत्मीकरण का सिद्धान्त - Maslow's Theory of Self-actualisation
मैसलो का आत्मीकरण का सिद्धान्त - Maslow's Theory of Self-actualisation
मैसलो ने अभिप्रेरणा के मूल में मानव की आवश्यकताओं को रखा है। इन आवश्यकताओं को उसने मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए एक चढ़ते हुए क्रम में रखा है। सबसे निचले स्तर पर जैविक आवश्यकताएँ जैसे- भूख, प्यास, यौन तृप्ति आदि होती हैं और उसके आगे अन्य सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की तृप्ति के आगे की सीढ़ी अपनी •आत्मा की भूख मिटाने की आती है। कौन व्यक्ति किस स्तर की आवश्यकताओं को अधिक महत्व देना चाहेगा, यह परिस्थितियों और व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं पर निर्भर करता है। फिर भी जिस स्तर की आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं उसके आगे के स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति ही मानव व्यवहार को आगे की दिशा प्रदान करती है। सभी का अंतिम लक्ष्य अपने आत्म से साक्षात्कार करना होता है जो कुछ वह है उसी से अवगत होना तथा उसी को पूर्णता प्रदान करना उसके व्यवहार को नियंत्रित करता है। फलस्वरूप एक कलाकार मन अपनी कला को पूर्णता प्रदान कराने के लिए छटपटाता रहता है और एक शासक सब पर शासन करने की अभिलाषा को साकार करने के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देता है।
इस प्रकार मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित उपरोक्त विभिन्न सिद्धान्त अपने-अपने ढंग से यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि मानव व्यवहार के संचालन की वास्तविक कुंजी किसके हाथ में है। अभिप्रेरणा अगर यह कुंजी है तो इसके पीछे वास्तविक आधार क्या है? मूलभूत प्रवृत्तियाँ यह कार्य करती हैं अथवा जैविक तथा सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं का इसमें हाथ रहता है अथवा दमित इच्छाएँ या भावनाएँ ही अपनी तृप्ति के लिए हमें अभिप्रेरित करती हैं। बात केवल एक तरह से ही पूरी नहीं होती है। अतः सभी सिद्धान्तों का समन्वय ही हमें वास्तविक रूप से यह समझाने में सहायक हो सकता है कि हमारे व्यवहार को अभिप्रेरित करने में क्या-क्या बातें सहायक सिद्ध हो सकती हैं।
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