पर्यावरण शिक्षा का अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र - Meaning, Nature and Scope of Environmental Education
पर्यावरण शिक्षा का अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र - Meaning, Nature and Scope of Environmental Education
यूँ तो हम तकनीकी तथा उद्योग के क्षेत्र में दिन दोगुनी एवं रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं किन्तु यह प्रगति कहीं-न-कहीं हमारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी कर रही है जिससे कई पर्यावरण संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं जो मानव जाति तथा अन्य जीवों के लिए प्राणघातक साबित हो रही हैं। अतः, आवश्यकता है कि लोगों को जागरूक किया जाए कि वे प्राकृतिक संसाधानों का उचित उपयोग करें, प्राकृतिक संसाधनों के विकल्पों की ओर ध्यान केन्द्रित करें प्रदूषण तथा मृदा-क्षरण जैसी समस्याओं से निदान हेतु स्थानीय स्तर पर आवश्यक प्रयास करें, प्राकृतिक आपदाओं को नियंत्रित करने के लिए अनवरत प्रयासरत रहें तथा तकनीकी एवं उद्योग के क्षेत्र में हो रहे विकास की निगरानी करें ताकि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न हो। इसके लिए विद्यालय तथा उच्च शिक्षा स्तर पर पर्यावरण शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की जानी चाहिए। इस उप इकाई में आप पर्यावरण शिक्षा के अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) के अनुसार पर्यावरण जल, वायु और भूमि के योग के रूप में, उनका आपस में तथा मनुष्य, अन्य प्राणियों एवं संपत्ति के साथ उनके अंतर्संबंधों के रूप में परिभाषित किया जाता है। पर्यावरण शिक्षा मूल रूप में पर्यावरण से जुड़ी होती है। इसे किसी भी एक विशेष अनुशासन की दृष्टि से समझा नहीं जा सकता वरन इसमें कई विषयों का समावेश है। इसमें पर्यावरण संबंधी घटनाओं तथा समस्याओं को राजनीतिक, सामजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक एवं जैव वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश होती है ताकि लोगों में इन समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक ज्ञान, समझ, कौशल एवं अभिवृत्ति का विकास हो तथा वे इन पर वैचारिक तथा व्यावहारिक रूप से उचित कार्यवाही कर सकें । पर्यावरण शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पर्यावरण संबंधी मुद्दों से परिचित होता है, उनका संलग्नता पूर्वक अध्ययन करता है तथा उनके समाधान हेतु उचित कार्यवाही कर पर्यावरण में सुधार लाने के लिए प्रयासरत रहता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति पर्यावरण संबंधी मुद्दों की गहरी समझ विकसित करता है तथा उन पर सूचित एवं जिम्मेदार निर्णय लेने हेतु आवश्यक कौशल अर्जित करता है।
पर्यावरण शिक्षा, सीखने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लोगों की पर्यावरण और उससे जुड़े चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ जाती है इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल, विशेषज्ञता, व्यवहार तथा मंशा का विकास होता है तथा सूचित निर्णय लेने एवं जिम्मेदारीपूर्ण कार्यवाही करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। ( UNESCO, 1978)
पर्यावरण शिक्षा की प्रकृति को समझने के लिए यह जानने की आवश्यकता है कि किस प्रकार 'पर्यावरण शिक्षा' 'पर्यावरण विज्ञान' से अलग है । व्यापक अर्थ में 'पर्यावरण विज्ञान' स्थलीय, वायुमंडलीय जैविक और मानववैज्ञानिक वातावरण के बीच होने वाले जटिल संबंधों का विज्ञान है।
यह रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान एवं मानव विज्ञान आदि विषयों को सम्मिलित करता है जो इन अंतर्संबंधों को प्रभावित करते हैं या इनका वर्णन करते हैं। वहीं पर्यावरण शिक्षा एक ऐसा विषय है जो पर्यावरण विज्ञान के आधारभूत तत्वों को समाहित करता है तथा विशेष रूप से यह लोगों को पर्यावरण संबंधी विमर्शों के प्रति जागरूक करता है तथा उनमें व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक ज्ञान कौशल, अभिवृति एवं मूल्यों का विकास करता है।
पर्यावरण शिक्षा न केवल पर्यावरण के भौतिक एवं जैविक विशेषताओं का अध्ययन करता है वरन यह मनुष्य के सामाजिक व सांस्कृतिक कारक को भी सम्मिलित करता है जो पर्यावरण को प्रभावित करते हैं
दूसरे शब्दों में पर्यावरण शिक्षा यह बताती है कि पर्यावरण, वह भौतिक परिवेश जिसमें हम रहते हैं, किस प्रकार हमारे व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है तथा किस प्रकार हमारी व्यक्तिगत एवं सामाजिक गतिविधियाँ पर्यावरण की अन्तः क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। यह लोगों को स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यमान विभिन्न पर्यावरण संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूक करता है तथा इन समस्याओं के समाधान हेतु चल रहे कार्यक्रमों, परियोजनाओं एवं नीतियों से भी अवगत कराता है ताकि वे पर्यावरण की सुरक्षा हेतु जागरूक तथा संवेदनशील बन सकें। आज पर्यावरण सुरक्षा की प्राथमिकता को देखते हुए पर्यावरण शिक्षा शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर अनिवार्य कर दिया गया है। स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर तैयार किये गए पाठ्य-पुस्तकों में क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर विद्यमान पर्यावरण संबंधी समस्याओं को विशेष स्थान दिया जाता है।
पर्यावरण शिक्षा महत्वपूर्ण सोच, समस्या सुलझाने और प्रभावी निर्णय लेने के कौशल को बढ़ाती है
और पर्यावरण संबंधी विमर्श के विभिन्न पक्षों पर विचार कर उस पर सूचित एवं जिम्मेदारीपूर्ण निर्णय लेने के लिए तैयार करती है। पर्यावरण शिक्षा किसी व्यक्ति, समूह या समाज विशेष के दृष्टिकोण या कार्यवाही की वकालत नहीं करती वरन यह लोगों को समस्या के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने तथा सर्वाधिक उचित एवं समाज के सभी वर्गों के लिए हितकारी निर्णय लेने के लिए तैयार करती है यह निर्णय सूचित एवं जिम्मेदारीपूर्ण होता है क्योंकि यह ठोस प्रमाणों एवं तथ्यों से उद्धृत होता है तथा पर्यावरण के साथ-साथ समाज के प्रत्येक वर्ग के विकास के प्रति संवेदनशील होता है।
पर्यावरण शिक्षा एक जटिल प्रक्रिया है।
यह सिर्फ पर्यावरण संबंधी घटनाओं का संग्रह ही नहीं करती वरन यह समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाती है। यह लोगों में सहभागिता, नियोजन करना, समूह में कार्य करना, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, नेतृत्व, विभिन्न संगठनों के साथ संबंध स्थापित करना आदि कौशलों का विकास करती है जो समाज के निर्माण एवं प्रगति का सूत्रधार होता है। यह लोगों को किसी समस्या के समाधान में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतः क्रिया तथा कार्यप्रणाली से भी परिचित कराती है।
पर्यावरण शिक्षा व्यापक तथा सतत रूप से चलने वाली आजीवन शिक्षा है जो तेजी से बदलती दुनिया में परिवर्तन तथा समायोजन करने के लिए लोगों को तैयार करती है।
यह हमें समकालीन दुनिया की प्रमुख समस्याओं के प्रति संवेदनशील करती है तथा इनके प्रति जिम्मेदारीपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करती है। यह आलोचनात्मक समझ, समस्या समाधान कौशल के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का भी समुचित विकास करती है।
UNESCO ने पर्यावरण शिक्षा हेतु निम्नलिखित निर्देश दिए हैं-
1. पर्यावरण शिक्षा प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक अनिवार्य रूप से सम्मिलित की जानी चाहिए।
2. पर्यावरण शिक्षा में अंतरानुशासनिक उपागम को व्यवहार में लाना चाहिए जिसमें पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक, जैविक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक सभी पक्ष सम्मिलित हों ।
इसे विज्ञान एवं तकनीकी तथा समाज के बीच पुल का कार्य करना चाहिए ।
3. पर्यावरण शिक्षा में पर्यावरण समस्याओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर विशेष बल देना चाहिए ।
4. पर्यावरण सुरक्षा द्वारा सतत विकास की आवश्यकता एवं महत्व पर बल देना चाहिए अर्थात ऐसा आर्थिक विकास जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएं।
5. पर्यावरण शिक्षा द्वारा पर्यावरण समस्याएँ, विशेष रूप से जो वैश्विक स्तर पर विद्यमान हैं, उनसे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की आवश्यकता पर बल देना चाहिए।
6. पर्यावरण शिक्षा में प्रायोगिक तथा प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित क्रियाकलापों को विशेष स्थान देना चाहिए।
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