विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा का अर्थ - Meaning of education according to Vivekananda
विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा का अर्थ - Meaning of education according to Vivekananda
स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कभी भी उसे परिभाषित नहीं किया। एक बार उन्होंने मुस्कराते हुए कहा था मैं किसी बात की कभी परिभाषा नहीं करता हूँ। फिर भी शिक्षा की व्याख्या शक्ति के विकास के रूप में की जा सकती है।" स्वामीजी के अनुसार मानव में कुछ शक्तियाँ विद्यमान रहती है। शिक्षा इन्हीं शक्तियों का विकास है। व्यक्ति के अन्दर उपस्थित गुणों का विकास करना ही तो बास्तबिक शिक्षा है। स्वामीजी ने शिक्षा का उद्देश्य निर्धारित करते हुए शिक्षा के सबसे अच्छी परिभाषा की शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति उनके ये शब्द आजभीशिक्षाशास्त्रियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं (Education is the manifestation of the perfection already present in man) यह पूर्णता बाहर से नहीं आती है बरन मनुष्य के भीतर छिपी रहती है। सब प्रकार का ज्ञान मनुष्य की आत्मा में निहित रहता है। शिक्षा उसका विकास एवं परिष्कार मात्र करती है। शिक्षा मानव को मानवीय गुणों से सम्पन्न करती है। शिक्षा के द्वारा ही मानव में देवत्व के गुणों का विकास होता है।
सच तो यह है कि शिक्षा मानव को पशु से अलग करती है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से जान लेना आवश्यक है कि शिक्षा मानव के अन्दर विचार एवं चिन्तन शक्ति का विकास करने में सक्षम है। पशु में विचार एवं चिन्तनशक्ति का सर्वथा अभाव होता है। मानव समुदाय में भी जो शिक्षित नहीं हैं उनमें चिन्तन शक्ति का विकास नहीं हो पाता। फलस्वरूप वे मनुष्य रूप में पशुवत् ही रह जाते हैं। इसके विपरीत सही रूप में शिक्षित मानव चिन्तन शक्ति से सम्पन्न होता है तथा वह जीवन के कार्यक्षेत्र में पूर्ण बिबेक से काम लेता है। इस प्रकार वास्तबिक शिक्षा विचार शक्ति एवं विवेक की जननी है।
सब मिलाकर मन, आचरण तथा घरित्र के परिष्कार का ही नाम शिक्षा है। परिष्कृत मन, आचरण तथा चरित्र ही तो सच्चे मानब का निर्माण करते हैं। वस्तुतः शिक्षा मानव जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाती है निम्नगामी नहीं। अतः स्वामीजी के अनुसार सहदय, सच्चरित्र, निर्भीक, सक्षम एवं विवेकशील मानव की निर्माण प्रक्रिया को ही वास्तविक शिक्षा की सजा दी जा सकती है।
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