सर्वांग शिक्षा का अर्थ - Meaning of holistic education
सर्वांग शिक्षा का अर्थ - Meaning of holistic education
अरविन्द का कहना है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय शिक्षा की रूपरेखा में परिवर्तन तो अवश्य हुआ है पर वह पर्याप्त नहीं है। शिक्षा की आवश्यकता भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार होनी चाहिए जो बालक की आन्तरिक शक्तियों का विकास करे। सर्वाग शिक्षा के उद्देश्य शिक्षा का लक्ष्य बालक की शक्तियों का विकास करते हुए व्यक्तिवाद और समाजबाद को निकालकर मानवतावादी एवं समग्रवादी बनाना है। इस विशिष्ट मस्तिष्क की अनुभूति करना शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। "शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए विकसित होने वाली आत्मा का विकास करना, जो उसमें उत्तम है, उसे व्यक्त करना तथा उसे श्रेष्ठ कार्य के लिए पूर्ण बनाना। अरविन्द के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1) शारीरिक विकास एवं शुद्धि - शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक विकास और शुद्धि है। उनका विश्वास था कि "शरीरमादय खलु धर्म साधनम् (शरीर के माध्यम से ही धर्म की साधना होती है।) इसलिए शरीर का सन्तुलित विकास और उनकी शुद्धि आध्यात्मिक विकास के लिए परम् आवश्यक है।
2) ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण: व्यक्ति की जानेन्द्रियों ज्ञान के प्रमुख स्रोत हैं। ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण उनके उचित प्रयोग पर निर्भर करता है। इसके निम्न तीन साधन अपनाये जा सकते हैं:
1. बालकों के ध्यान को विषय की ओर केन्द्रित करना।
2. तामसिक भाव को दूर करना
3. अभ्यास
3) मानसिक विकासः शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य मानसिक शक्तियों का विकास करना बालक की मानसिक शक्ति विशेष रूप से तर्क, कल्पना, स्मृति चिन्तन आदि का विकास बालक की रुचियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
4) नैतिक विकास नैतिक शिक्षा बालक के विकास में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब तक व्यक्ति का पर्याप्त नैतिक विकास नहीं होगा तब तक वह मानव जाति का कल्याण नहीं कर सकता। उन्होंने मनुष्य के नैतिक विकासको तीन भागों में बाँटा है: संवेग, आदते और संस्कार।
5) आध्यात्मिक विकासः आध्यात्मिक विकास के द्वारा ही मनुष्य पूर्ण मानव बन सकता है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्मा केरूप में ईश्वरीय अंश को खोजना, विकसित करना तथा पूर्णता की और ले जाना ही शिक्षा का उद्देश्य है।
6) विशिष्ट क्षमताओं का विकासः प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ विशिष्ट क्षमता या योग्यता अवश्य होती है। शिक्षा का उद्देश्य है। कि वह इन विशिष्ट क्षमाताओं का विकास करे।
शिक्षा का प्रारूप ऐसा होना चाहिए कि व्यक्ति में उपलब्ध क्षमताओं का स्वाभाविक रूप से विकास हो सके जिससे बालक अपने जीवन के हर लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सके। पाठ्यक्रम अरविन्द ने पाठ्यक्रम निर्माण के निम्न सिद्धांत बताये हैं,
1. पाठ्यक्रम रोचक हो तथा उसमें बालक को आकर्षित करने की शक्ति हो । 2. पाठ्यक्रम के विषयों में व्यावहारिकतथा आध्यात्मिक विकास की क्षमता हो साथ ही जीवन की क्रियाशीलता के गुण भी होने चाहिये।
3. पाठ्यक्रम का प्रारूप इस तरह का हो कि वह बालक की रुचि को विश्व ज्ञान की ओर प्रेरित कर सके।
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