मापन - Measurement
मापन - Measurement
थॉर्न डाईक ने ई. सं. 1904 में शैक्षिक मापन पर प्रथम पुस्तक प्रकाशित की। उसके बाद ई.सं. 1903 में उनके ही शिष्य स्टोन ने गणितीय तर्क के आधार पर प्रथम प्रमाणीकृत परीक्षण प्रकाशित किया। ई.सं. 1909 में थॉर्नडाइक ने बालकों के हस्ताक्षर लेखन के मापदंड को प्रकाशित किया। आज मापन शब्द सर्वत्र प्रचलित है। हर दिन प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षितः किसी न किसी प्रकार का मापन करता है। मापन एक ऐसी प्रक्रिया है; जो मापन करने योग्य वस्तु की संख्यात्मक मात्रा दर्शाती है। ठोस पदार्थ का किलोग्राम में मापन किया जाता है, द्रव पदार्थ का लीटर में मापन किया जाता है तथा लम्बाई का मापन मीटर में किया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है की मापन एक बहु परिचित शब्द है; तथा वह दैनिक जीवन के व्यवहार में अत्यन्त उपयोगी अवधारणा है।
अर्थात् मापन एक व्यवहारोपयोगी तथा बौद्धिक प्रक्रिया है। मापन की अवधारणा का संबंध केवल मूर्त वस्तु से ही नही; बल्कि अमूर्त अवधारणाओं से भी है। उदाहरण के लिए वर्तमान युग में बुद्धि का मापन, मानसिकता का मापन, अभियोग्यता, अभिरुचि, तथा विभिन्न प्रकार की क्षमताओं का मापन करने का कौशल भी मनुष्य ने प्राप्त किया है। आज मनोविज्ञान एवं शिक्षाशास्त्र में मापन शब्द का उपयोग अत्यन्त सामान्य रूप में किया जाता है।
1. महेश भार्गव:- मापन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत निरीक्षणों, वस्तुओं या घटनाओं को किसी सार्थक या एक जैसे ढंग से नियमानुसार कुछ प्रतीक या अंक प्रदान किए जाते हैं।
2. रेमर्स, गेज एंव रूमेल:- मापन से तात्पर्य ऐसे निरीक्षणों से है जिन्हें परिमाणात्मक रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता हो और जिनसे कितना कुछ' इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो
3. कैम्पबेल:- नियमों के अनुसार वस्तुओं एवं घटनाओं को प्रतीकों में व्यक्त करने की प्रक्रिया मापन कहलाती है। उपरोक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि मापन एक पारिमाणिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी निरीक्षण या परीक्षण के दौरान किसी वस्तु या व्यक्ति विशेष के व्यवहार या प्रकृति में जो भी विशेषताएँ दिखाई देती है उन्हें मापन इकाइयों या संख्यात्मक मूल्यों द्वारा व्यक्त करने का प्रयत्न किया जाता है।
मापन किसी कक्षा में कमजोर तथा होशियार विद्यार्थियों को पहचानने में सहायक होता है। यह विद्यालय में परीक्षार्थियों को अंक देने में, उनके वर्गीकरण तथा उन्नति में, अध्यापक की शिक्षण योग्यता का निर्णय करने में या शिक्षा पर होने वाले व्यय को निश्चित करने में सहायक हो सकता है। यह किसी शैक्षणिक अधिकारी के पर्यवेक्षण में चलने वाले कार्यक्रम की प्रगति का निरीक्षण या मूल्यांकन करने में भी उपयोगी है। यदि परीक्षण का निर्माण करने में शैक्षणिक उद्देश्यों को ध्यान में रखा गया है तो ये पाठ्यक्रम के विकास में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।
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