संविलयन - Merger

संविलयन - Merger


जब दो या दो से अिधक कंपनियां आपस में संयोजन करती है तो उसे संविलयन कहते हैं। दोनों कंपनियों में से एक ही कंपनी चालू रहती है। उदाहरण के लिये, 'अ' कंपनी 'ब' कंपनी का संयोजन होता है तो उसमें से एक कंपनी चालू रहेगी तथा दूसरी समाप्त हो जायेगी या तो 'अ' कंपनी चालू रहेगी या 'ब' कंपनी । यदि अ कंपनी चालू रहेगी तो ब कंपनी का समापन हो जायेगा। यदि व कंपनी चालू रहेगी तो अ कंपनी का समापन हो जायेगा। संविलयन में कंपनी की संपत्तियों, दायित्वों तथा अंशधारियों के हितों का संयोजन हो जाता है। यदि संविलयन इस प्रकार से होता है कि एक नई कंपनी की स्थापना करके दोनों चालू कंपनियों को संयोजित कर लिया जाता है तो उसे एकीकरण (Amalgamation) कहते हैं। यदि अ कंपनी तथा ब कंपनी का संविलयन होता है और उसके लिये एक नई कंपनी स कंपनी स्थापित की जाती है तो उसे एकीकरण कहते हैं। भारत में कानून इसे ही मान्यता देती है। संविलयन तथा एकीकरण को समानार्थी भी माना जा सकता है।


संविलयन या एकीकरण के निम्नलिखित दो स्वरूप हो सकते हैं-


(अ) समावेशन के माध्यम से संविलयन।


(ब) समेकन के माध्यम से संविलयन।


(अ) समावेशन (Absorption) समावेश में दो या अधिक कंपनियों का संयोजन एक विद्यमान कंपनी से होता है। इसमें एक को छोड़ कर शेष कंपनियों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिये, अ कंपनी द्वारा ब कंपनी का समावेश किया गया। संविलयन के पश्चात अ कंपनी चालू रहेगी और ब कंपनी का समापन हो जायेगा।


(ब) समेकन (Consolidation)- समेकन के अंतर्गत दो या अधिक कंपनियों का संयोजन करके एक नई कंपनी स्थापित की जाती है। उदाहरण के लिये, ब कंपनी ब कंपनी का समेकन होता है तथा स कंपनी इसके लिये स्थापित की जाती है। इसके फलस्वरूप अ कंपनी तथा ब कंपनी का समापन हो जायेगा अंशों या रोकड़ के बदले अ कंपनी तथा ब कंपनी अपने संपत्तियों एवं दायित्वों को स कंपनी को हस्तांतरित कर देगी। समेकन तथा एकीकरण दोनों ही प्रकार के संयोजन मिलते जुलते हैं।