सहसंबंध गुणांक ज्ञात करने की विधियाँ - Methods of Finding Correlation Coefficient

सहसंबंध गुणांक ज्ञात करने की विधियाँ - Methods of Finding Correlation Coefficient


वैसे तो दो चरों के बीच सहसंबंध गुणांक ज्ञात करने की अनेक विधियाँ हैं किंतु उनमें से केवल दो विधियाँ अधिक प्रचलित है-


1. श्रेणीक्रम सहसंबंध विधि


2. गुणनफल आघूर्ण सहसंबंध विधि


(1) श्रेणीक्रम सहसंबंध विधि (Rank Order Correlation Coefficient) - इस विधि का प्रतिपादन चार्ल्स स्पियरमैन ने किया था इसलिए इस विधि को स्पियरमैन सहसंबंध विधि भी कहा जाता है। साधारणतः इस विधि का प्रयोग अंको के रूप में प्राप्तांको की परिस्थिति में अधिक उपयोग किया जाता है। इस विधि में अंको को श्रेणी में बदल दिया जाता है। 

श्रेणी में बदलने की विधि इस प्रकार है-

समूह में जितने सदस्य होते हैं उतनी ही श्रेणियाँ (Ranks) होती हैं। सर्वोच्च अंको को प्रथम (1) श्रेणी, इसके बाद वाले को द्वितीय (2) श्रेणी और इसी क्रम के बाद के अंको को श्रेणियों में बदल दिया जाता है। न्यूनतम अंक के विद्यार्थी को अंतिम श्रेणी दी जाती है। जब दो या दो से अधिक विद्यार्थियों के अंक समान होते हैं उस समय श्रेणी बदलने में सावधानी बरतनी होती है। दो समान अंको के लिए आगे की दो श्रेणियों की औसत श्रेणी प्रत्येक को दी जाती है।


(2) गुणनफल आघूर्ण सहसंबंध विधि (Product Moment Correlation)


गुणनफल आघूर्ण विधि से सहसंबंध गुणांक ज्ञात करने की विधि का प्रतिपादन कार्ल पियरसन ने किया था, इसलिए इस विधि को कार्ल पियरसन विधि भी कहते हैं। इस विधि में दोनों चरों पर विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंको के सापेक्ष प्राप्तांको के गुणनफलों का आघूर्ण ज्ञात किया जाता है तथा यह आघूर्ण ही दोनों चरों के बीच सहसंबंध की मात्रा को प्रकट करता है. गुणनफल आघूर्ण सहसंबंध गुणांक को अंग्रेजी भाषा के अक्षर से प्रदर्शित करते हैं।