फर्म के मूल्यांकन की विधियाँ - Methods of Valuation of the Firm

फर्म के मूल्यांकन की विधियाँ - Methods of Valuation of the Firm


फर्म का मूल्यांकन करने की कई विधिया प्रचलित हैं। उनमें से, निम्नलिखित पाँच विधियाँ अधिक प्रचलित हैं:-


(1) आर्थिक चिट्ठा विधि


(2) शुद्ध संपत्ति मूल्य विधि


(3) तुलनात्मक फर्मों की मूल्यांन विधि


(4) मूल्य अर्जन अनुपात विधि


(5) अपलेखित रोकड़ प्रवाह विधि


इन विधियों का वर्णन अग्रलिखित है:


(1) आर्थिक चिठ्ठा विधि (Balance Sheet Method) -


इस विधि के अनुसार, फर्म के आर्थिक चिट्ठे में दिखाई गई संपत्तियों के पुस्त मूल्य के आधार पर फर्म का मूयांकन किया जाना चाहिए। फर्म की संपत्तियों पर, वास्तव में, फर्म के अंशधारियों तथा ऋणपत्रधारियों का ही दावा रहता है। अतः, फर्म का मूल्य कम से कम फर्म की संपत्तियों के पुस्त मूल्य के बराबर होना चाहिए। इस प्रकार यह फर्म के न्यूनतम मूल्य के निर्धारण के लिये अधिक उपयोगी व सहायक है। इस विधि को अपनाते समय, यह ध्यान में रखना चाहिए कि जिन मूल्यों पर संपत्तियों को आर्थिक चिट्ठे में दिखाया गया है, उनका मूल्य उतना ही होगा, यह आवश्यक नहीं। यह उससे कम या अधिक हो सकता है। अतः, यह अधिक उचित होगा कि इन संपत्तियों का वास्तविक मूल्य ज्ञात करके ही फर्म के मूल्य की गणना की जाये । इस दृष्टि से,

पुस्त मूल्य में समायोजन करके पुस्त मूल्य (Adusted book Value) के आधार पर फर्म के मूल्य की गणना की जानी चाहिए। इसके लिये अलग-अलग प्रकार की संपत्तियों का मूल्यांकन उनकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग ढंग से करनी चाहिए और फर्म का मूल्य ज्ञात करने के लिए संपत्तियों का पुनर्मूल्यांन किया जाना चाहिए। इसके लिए, उन संपत्तियों का चालू लागत या पुनर्स्थापन लागत ज्ञात करनी चाहिए भूमि एवं भवन की वर्तमान लागत प्रचलित दर के आधार पर किया जा सकता है। संयंत्र एवं मशीनरी की वर्तमान लागत ज्ञात करना कठिन है तथा इसके लिये किसी स्वतंत्र मूल्यांकन करने वाले की सेवायें ली जानी चाहिए। देनदारों की सही लागत ज्ञात करने के लिये डूबत एवं संदिग्ध ऋण संचय की उचित मात्रा से उसे समायोजित करना चाहिए। स्टॉक का सही मूल्य ज्ञात करने के लिए उसके चालू, लागत को ज्ञात करना चाहिए तथा निष्क्रिय स्टॉक के मूल्य से उसे समायोजित किया जाना चाहिए।


उसी प्रकार से, आर्थिक चिट्टे में कुछ अमूर्त संपत्तियाँ भी होती हैं जिनका सही मूल्यांकन किया जाना चाहिए। ये संपत्तियाँ हो सकती हैं - ख्याति ब्रांड इक्किटी, ग्राहकों की निष्ठा (loyalty), प्रबंधकों का कौशल या गुणवत्ता आदि। इनके मूल्यांकन की प्रचलित विधियों के आधार पर किया जाना चाहिए अथवा उनका सही मूल्य ज्ञात करने का प्रयास किया जाना चाहिए।


फर्म का मूल्यांकन करने के लिये, आर्थिक चिट्ठा विधि आसान है और प्रचलित भी है। किंतु उनमें दिखाई गई संपत्तियों के मूल्य में आवश्यक समायोजन करने के उपरांत ही फर्म के मूल्य का निर्धारण करना चाहिए।


(2) शुद्ध संपत्ति मूल्य विधि (Net Asset Value Method)


आर्थिक चिट्ठा विधि के अनुसार,

फर्म का मूल्य चिट्ठे में दी गई संपत्ति के पुस्त-मूल्य के योग के के शुद्ध संपत्ति मूल्य विधि के अनुसार, फर्म का मूल्य फर्म की शुद्ध संपत्ति के मूल्य के बराबर होता है। बराबर होगा। यहाँ पर शुद्ध संपत्ति का तात्पर्य, कुल संपत्ति तथा कुल बाह्य देयताओं के अंतर से है। दूसरे शब्दों में


शुद्ध सत्पत्तियाँ = कुल संपत्तियाँ - कुल ब्राह्म देयताये


या


Net Assets = Total external liabilities


कुल ब्राह्म देयताओं का तात्पर्य लेनदार,

देयतापत्र तथा अन्य देयताओं की राशि के योग से है। संपत्तियों का मूल्य, पुस्त-मूल्य, बाजार मूल्य अथवा समापन मूल्य (liquidation value), से हो सकता है। इस प्रकार से, संपत्तियों का शुद्ध मूल्य, इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्तियों के किस मूल्य को अपनाया गया है।


पुस्त-मूल्य की दशा में, आर्थिक चिट्ठे में दिखाये गये मूल्य को लिया जायेगा। बाजार मूल्य की दशा में, संपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन करने पर जो मूल्य आयेगा, उस मूल्य को लिया जायेगा। समापन मूल्य की दशा में यह, मान कर चला जायेगा कि यदि कंपनी का समापन हो जाये तो संपत्तियों से क्या वसूली होगी। वसूल की जाने वाली राशि ही संपत्तियों का समापन मूल्य होगा।


इस प्रकार से, भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में, अलग-अलग मूल्य को अपनाया जा सकता है।


(3) तुलनात्मक फर्मों की मूल्यांकन विधि ( Comparative Firm Valuation Method) 


फर्म के मूल्य गणना करने यह विधि भी उपयोगी है। इस विधि के अंतर्गत फर्म के मूल्यांकन के लिये, उसी प्रकार की फर्मों के मूल्यों को आधार बनाया जाता है। जब दो या अधिक फर्मों के मूल्यों को आधार बनाते हैं तो यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी प्रकृति एक समान हो तथा वे एक ही उद्योग में लगी अलग-अलग फर्मे हैं। यह इस मान्यता पर आधारित है कि एक प्रकार की फर्मों का मूल्य समान होगा। इस प्रकार से मूल्यांकन के लिये विभिन्न सुसंगत अनुपातों का सहारा लिया जाता है। जैसे, विक्रय के अनुपात में फर्म का मूल्य, स्वतंत्र रोकड़ प्रवाह (Free Cash Flows), संपत्तियों के के पुस्तक मूल्य का बाजार मूल्य पर अनुपात, ब्याज तथा कर से पूर्व अर्जन (Earning Before Interest and Tax या FBIT) आदि ।


मूल्यांक के लिये फर्मों का चुनाव करते समय, उसके आकार, आयु. विकास एवं लाभोत्पादकता उपनति (Trend) आदि को मानदंड माना जा सकता है।


इन सब अनुपातों की गणना करने के उपरांत फर्मों के अनुपात का औसत ज्ञात कर लेना चाहिए। इस औसतों के आधार पर फर्म की बिक्री स्वतंत्र नकद प्रवाह तथा ब्याज एवं कर से पूर्व अर्जन को समायोजित करना चाहिए।


(4) मूल्य अर्जन अनुपात विधि (Price Earning (P/E) Ratio) 


यह एक प्रचलित विधि है जिसके अंतर्गत मूल्य अर्जन अनुपात ज्ञात कर उसके आधार पर फर्म के मूल्य की गणना की जाती है।

अंशों के मूल्य ज्ञात करने की यह विधि अंशधारियों वित्तीय विश्लेषकों तथा वित्तीय प्रबंधकों को प्राय: स्वीकार्य होती है। इसके अंतर्गत, प्रति अंश अर्जन (Earning Per share of EPS) को पहले ज्ञात किया जाता है। प्रति अंश अर्जन या EPS को निम्नलिखित ढंग से ज्ञात किया जा सकता है:


प्रति अंश अर्जन = समता अशंधारियों को उपलब्ध अर्जन / समता अंशों की संख्या


EPS = Ramming Available to Equity shareholders / Numbers of Equity Shares


शुद्ध अर्जन अथवा लाभ का तात्पर्य, कर तथा पूर्वाधिकारी लाभांश का भुगतान करने के उपरांत लाभ से है। आवश्यकतानुसार, असाधारण मदों के विषय में, इसमें समायोजन भी कर लेना चाहिए।


समता अंशों का बाजार मूल्य ज्ञात करने के लिये प्रति अंश अर्जन या EPS को मूल्य/अर्जन अनुपात से गुणा करना चाहिए।


सूत्र के अनुसार,


प्रति अंश बाजार मूल्य = प्रति अंश अर्जन x मूल्य / अर्जन अनुपात


या MPS = EPS x P/E Ratio


यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मूल्य अर्जन अनुपात या P/E Ratio का प्रयोग फर्म का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कंपनी विशेष द्वारा प्रकाशित वित्तीय विवरण सही है या नहीं। प्रायः, कंपनियाँ इसमें हेर-फेर करके अपनी वित्तीय स्थिति को वास्तविकता से अधिक अच्छा दिखाने का प्रयास करती हैं जिससे उन्हें अपनी कंपनी का अधिक मूल्य प्राप्त हो सके। अतः, संबंध में, सावधानी बरतने की अधिक आवश्यकता है। इसके लिये कंपनी की गहन जाँच करने की आवश्यकता हैं।


(5) अपलेखित रोकड़ प्रवाह विधि (Discounted Cash Flow Method) -


इस विधि के अंतर्गत, भावी रोकड़ प्रवाहों के अनुसार फर्म का मूल्यांकन किया जाता है। इस विधि को, व्यवहार में, पूँजीगत व्यय संबंधी प्रायोजनाओं के मूल्यांकन के संबंध में अपनाया जाता है किंतु इसका उपयोग फर्म के मूल्यांकन के लिये भी अपनाया जाता है। वास्तव में, मूल्य अर्जन अनुपात (P/E Ratio) विधि के अंतर्गत, केवल वर्तमान वर्ष तथा एक-दो अगले वर्षों के अर्जन के आधार पर ही फर्म का मूल्यांकन किया जाता है परंतु अपलेखित रोकड़ प्रवाह विधि में कई वर्षों के भावी अर्जनों को मूल्यांकन का आधार बनाया जाता है।