सूक्ष्म-शिक्षण , सूक्ष्म-शिक्षण का इतिहास , सूक्ष्म-शिक्षण की परिभाषाएँ - Micro-Teaching, History of Micro-Teaching, Definitions of Micro-Teaching

सूक्ष्म-शिक्षण , सूक्ष्म-शिक्षण का इतिहास , सूक्ष्म-शिक्षण की परिभाषाएँ - Micro-Teaching, History of Micro-Teaching, Definitions of Micro-Teaching


सूक्ष्म-शिक्षण एक प्रकार की प्रयोगशाला विधि है जिसमें छात्राध्यापक शिक्षण कौशलों का अभ्यास बिना किसी को हानि पहुँचाए करते हैं। यह विधि प्रयोगशाला की सभी शर्तों की पूर्ति करने में सक्षम है। 


सूक्ष्म-शिक्षण का इतिहास (History of Micro Teaching) - 


सूक्ष्म-शिक्षण का विकास स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में किया गया। 1961 में एचीसन, वुश, एलन ने सर्वप्रथम नियंत्रित रूप में 'संकुचित अध्ययन अभ्यास क्रम' प्रारंभ किए, जिसके अंतर्गत छात्राध्यापक 5 से 10 छात्रों को एक छोटा-सा पाठ पढ़ाता था। अन्य छात्राध्यापक विभिन्न प्रकार की भूमिका निर्वाह (Role Play) करते थे ।

बाद में वीड़ियो टेपरिकार्डर का प्रयोग भी छात्राध्यापकों के शिक्षण व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने के लिए करना शुरू कर दिया है। भारत में सर्वप्रथम डी. डी. तिवारी (1967) ने 'सूक्ष्म-शिक्षण' शब्द का प्रयोग शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र में किया। यद्यपि उनका 'सूक्ष्म-शिक्षण' का अर्थ आज के सूक्ष्म-शिक्षण से पृथक् था। सर्वप्रथम 1974 में पासी तथा शाह ने भारत में सूक्ष्म-शिक्षण के क्षेत्र में वैज्ञानिक जानकारी प्रदान की । सन् 1978 में इन्दौर विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम 'सूक्ष्म-शिक्षण' पर राष्ट्रीय प्रायोजना (Nat Tonal Proposal for the Project) का निर्माण किया गया। यह शोध योजना 'नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग' (NCERT) नयी दिल्ली के सहयोग से पूर्ण की गयी।


सूक्ष्म-शिक्षण की परिभाषाएँ (Definitions of Micro-Teaching):


प्रो.बी.के.पासी :- "सूक्ष्म शिक्षण एक प्रशिक्षण विधि है, जिसमें छात्राध्यापक किसी एक शिक्षण


कौशल का प्रयोग करते हुए थोड़ी अवधि के लिए, छोटे छात्र समूह को कोई एक सम्प्रत्यय पढ़ाता है " बी. एम. शोर:- "सूक्ष्म-शिक्षण कम समय, कम छात्रों, तथा कम शिक्षण क्रियाओं वाली प्रविधि है ।" डी.डब्ल्यू. एलन:- "सूक्ष्म शिक्षण सरलीकृत शिक्षण प्रक्रिया है जो छोटे आकार की कक्षा में कम समय में पूर्ण होती है।"


उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'सूक्ष्म-शिक्षण एक विकासशील प्रवृत्ति है, जिसके अंतर्गत पाठ्यवस्तु, पाठ्य-अवधि तथा पाठकों (छात्राध्यापक) को कम किया जाता है और छात्राध्यापक में क्रमशः शिक्षण-कौशल का विकास भली-भाँति किया जाता है।