मीमांसा दर्शन - Mimamsa Darshan

मीमांसा दर्शन - Mimamsa Darshan


 महर्षि जैमिनी द्वारा प्रतिपादित मीमांसा का तात्पर्य उस दर्शन से है जो वैदिक कर्मकाण्ड विषक श्रुतियों के पारस्परिक विरोधों का परिहार करता है और इसके लिए सुनिश्चित सिद्धांत प्रस्तुत करता है। यह दर्शन वेदों के ज्ञान को कर्म के रूप में प्रस्तुत करता है। मीमांसा दर्शन के अंतर्गत जगत् को मिथ्या नहीं माना गया है यह दर्शन वस्तुवादी दर्शन है। जगत् की सृष्टि या रचना करने की शक्ति कर्म में है। इसमें ईश्वरको कोई अधिकार नहीं है। कर्म की अपनी स्वतंत्र शक्ति है जिसे अपूर्व की संज्ञा दी गई है। वही जगत् का संचालन करती है। इस प्रकार मीमांसा दर्शन एक औरईश्वर को नहीं मानता है तो दूसरी और वेदों में निहित, कर्मों को करने के लिए भी कहता है। कर्म से ज्ञान और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। शिक्षा लेना भी एक कर्म है जिससे ज्ञान रूपी फल की प्राप्ति होती है। मीमांसा दर्शन में कर्म एवं जान का समन्वय अपने उत्कृष्ट रूप में दृष्टिगत होता है।


शिक्षा की संकल्पना


मीमांसा का तात्पर्य है विवेचना। अतः मीमांसा दर्शन के अनुसार शिक्षा से अभिप्राय है-ज्ञान के विवेचना की प्रक्रिया ज्ञान को बोध भी कहते हैं।

वस्तुतः शिक्षा एक बोधात्मक जटिल प्रक्रिया है जिसमें बाह्य और अंतर्जगत का मेल होता है तथा इसके लिए जिज्ञासा को आवश्यक माना गया है।


शिक्षा के उद्देश्य


मीमांसा दर्शन शिक्षा को वैयक्तिक एवं सामूहिक हिल की क्रिया मानता है। वस्तुतः शिक्षा प्राप्त करना एवं प्रदान करना मानव धर्म है। इस दृष्टिकोण से मीमांसा दर्शन के शिक्षा संबंधी निम्न उद्देश्य स्पष्ट होते हैं-


• धर्म के स्वरूप की परीक्षा करना


• वैदिक धर्म के प्रति सत्यनिष्ठा उत्पन्न करना


• वैदिक धर्म का पुनरस्थान करना


• वेदों के विषय-विभाग एवं उनके अर्थ को समझने की योग्यता प्रदान करना


• भाषाशास्त्र व शब्द वाक्य का सही जान देना


• मनुष्य का सामाजिक व नैतिक कल्याण करना


शिक्षा की पाठ्यचर्या एवं पद्धति


दर्शन के अनुसार धर्म दर्शन, साहित्य, वेद, उपनिषद, भाषा और व्याकरण को शिक्षा की पाठ्यचर्या का अंग बनाया गया है।

मीमांसा की शिक्षा पाठ्यचर्या में यज्ञ अग्निहोत्र (हवन) एवं सामाजिक- सांस्कृतिक क्रियाएँ भी सम्मिलित है। सूत्र विधि, उपदेश प्रवचन -विधि, प्रयोग-परीक्षण-विधि, अभ्यास- विधि, तर्क-विधि, क्रिया-विधि आदि को मीमांसा दर्शन की शिक्षा की विधि के अंतर्गत स्थान दिया गया है।


अध्यापक एवं छात्र-संकल्पना


मौमांसा दर्शन के अनुसार विद्यार्थी ब्रह्मचर्य के अनुसार त्याग, तपस्या का जीवन व्यतीत करता है। गुरु के पास रहकर उसके आदेशों का पालन करके उपदेशों व प्रवचनों को सुनकर जीवन में उनका अभ्यास करता है। अध्यापक भी ब्रहमचर्य का पालन करता है और छात्र को भी आचारवान बनाने का प्रयास करता है। आचार्य स्वयमेव गुणी जानी तथा यज्ञ करने वाला होता है। अध्यापक शिष्य की धर्म जिज्ञासा को पूर्ण करता है। शिक्षक सद्पथ प्रदर्शक होता है और बिद्यार्थी को धर्म (कर्तव्य) तथा अधर्म (अकर्तव्य) का ज्ञान प्रदान कर मोक्ष का अधिकारी बनाता है। सार रूप में कहा जा सकता है कि मीमांसा दर्शन का केंद्रीय कथन धर्म या कर्तव्य का अनुशीलन है। धर्म या कर्तव्य पालन, सदाचार, सामाजिक कल्याण, नैतिक प्रगति आदि शिक्षा के केन्द्र-बिंदु कहे जा सकते हैं।