कुसमायोजन - misadjustment
कुसमायोजन - misadjustment
जब समायोजन स्थापित करने के लिए, व्यक्ति की आवश्यकताओं, उसकी क्षमताओं और विशेषताओं एवं परिस्थितियों के मध्य संतुलन स्थापित करने के लिए व्यक्ति के द्वारा किये गये व्यवहार अंततः विफल हो जाते हैं तब कुण्ठा की दशा उत्पन्न होती है । कुण्ठा की उत्पत्ति का कारण समायोजनात्मक प्रक्रिया के तीनों घटकों में से कहीं भी स्थित हो सकता है- आवश्यकताओं की तीव्रता, आवश्यकताओं का द्वन्द्व, या व्यक्ति की क्षमताओं और विशेषताओं में कोई कमियां, जैसे बुद्धि न्यूनता, आकर्षक न होना, अपने बारे में और अपनी सामर्थयों के बारे में प्रत्यक्षण का उपयुक्त न होना, अभिवृत्तियों का उपयुक्त न होना आदि अथवा, परिवेश में गंभीर बाधाओं की उपस्थिति, जैसे कानूनी बाधा, व्यक्ति के लिए अस्वीकार्य परम्पराएं, मूल्य या कार्य, दुर्घटना, आपदा आदि ।
कुसमायोजन व्यक्ति विशेष की वह अवस्था या स्थिति होती है जिसमें वह यह अनुभव करता है कि उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पा रही है और ऐसा होने की आगे भी कोई आशा नहीं है वह निश्चित रूप से अपने आप से तथा अपने वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में लगभग असफल ही रहा है। अपनी इस समायोजन संबंधी विफलता के कारण इस प्रकार एक कुसमायोजित व्यक्ति विभिन्न प्रकार की व्यवहार तथा समायोजन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त होकर अपने तथा दूसरों के विकास या प्रगति में सदैव बाधा बना हुआ ही नजर आता है।
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