शिक्षण प्रतिमान - Models of Teaching
शिक्षण प्रतिमान - Models of Teaching
शिक्षण प्रतिमान, शिक्षण सिद्धांत विकसित करने की ओर पहला कदम है। ये शिक्षण सिद्धांतों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। ये स्वयंसिद्ध कल्पनाएँ होती हैं, जिनका प्रयोग शिक्षक अपने शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए करता है। "Teaching model is a way of thinking about teaching."
परिभाषाएँ:
1. एन. के. जंगीरा एवं अजीत सिंह:- "शिक्षण प्रतिमान क्रमबद्ध एवं अंतर संबंधित तत्वों का वह समूह है जो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शैक्षिक क्रियाओं एवं वातावरणीय सुविधाओं की योजना बनाने एवं उन्हें क्रियान्वित करने में सहायता करता है। "
2. हायमान:- "शिक्षण प्रतिमान शिक्षण के बारे में सोचने-विचारने की एक रीति है, जो वस्तु के अंतर्निहित गुणों को परखने के लिए आधार प्रदान करती है। प्रतिमान किसी वस्तु को विभाजित तथा व्यवस्थित करके तार्किक रूप में प्रस्तुत करने की विधि है ।"
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षण प्रतिमान शिक्षण प्रक्रिया में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु, पूर्व निर्धारित प्रारूप के अनुरूप विभिन्न शिक्षण क्रियाओं, विधियों, नीतियों, प्रविधियाँ अथवा युक्तियों से युक्त एक मुक्त, गत्यात्मक एवं सुनियोजित बहुमुखी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत प्रेरक वांछित शैक्षिक वातावरण- विकास के साथ छात्रों में वांछित व्यवहार परिवर्तन लाने का प्रयास करता है । ( कुलश्रेष्ठ व सिंह 1980)
(A):- विकासात्मक प्रतिमान [Development Model] - इस प्रतिमान का विकास जीन प्याजे ने किया है। इसमें बौद्धिक तथा तार्किक क्षमताओं के विकास को विशेष महत्व दिया जाता है।
I. उद्देश्य (Focus):- इसका मुख्य उद्देश्य सामान्य बौद्धिक तथा तार्किक क्षमताओं का विकास करना है।
II. संरचना (Syntax) :- इसके अंतर्गत दो सोपान का अनुसरण किया जाता है-
प्रथम सोपान :- इसमें छात्रों को ऐसी परिस्थिति दी जाती है, जिसमें तर्कपूर्ण चिन्तन की आवश्यकता नहीं होती है जो छात्र के विकासात्मक स्तर के समान हो। छात्रों की परिस्थिति का पूर्ण बोध होना चाहिए, जिससे छात्र परिपक्वता की ओर बढ़ सकें ।
द्वितीय सोपान :- इसके अंतर्गत छात्रों को निर्देश दिया जाता है, जिससे छात्र परिस्थिति की समस्या तथा कमजोरियों को दूर कर सकें ।
III. सामाजिक प्रणाली (Social System) :- शिक्षक का कार्य छात्रों को निर्देश देना है। शिक्षक छात्र को अधिक क्रियाशील रखता है। शिक्षक ही क्रियाओं को आरंभ करता है। छात्रों को भौतिक तथा सांसारिक वस्तुओं से अवगत कराया जाता है।
IV. सहायक प्रणाली ( Support System):- इसका मूल्यांकन वातावरण के स्रोत तथा शिक्षक के विकासात्मक सिद्धांत की सार्थकता से किया जा सकता है। छात्रों की ज्ञानात्मक समस्या के समाधान की क्षमताओं को विशेष महत्व दिया जाता है। मूल्यांकन के लिए निबंधात्मक परीक्षाएं प्रयुक्त की जाती हैं।
V. उपयोग (Application):- 'प्याजे' के प्रतिमान का प्रयोग ज्ञानात्मक तथा सामाजिक क्षमताओं के विकास के लिए किया जाता है। अनुदेशन प्रणाली के निदान में भी प्रयुक्त किया है। तर्कपूर्ण चिंतन के विकास के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। बालक के ज्ञानात्मक विकास के लिए समुचित वातावरण उत्पन्न हुआ अथवा नहीं, इसके संबंध में निर्णय लिया जाता है।
(B):- संप्रत्यय उपलब्धि प्रतिमान (Concept Attainment Model) :- इस प्रतिमान का विकास जे. एस. ब्रूनर तथा उसके सहयोगियों ने किया। इस प्रतिमान का उपयोग करके शिक्षक, छात्रों को प्रत्ययों की प्रकृति की सही जानकारी प्रदान करता है।
इसमें दो या दो से अधिक वस्तुओं के मध्य समानता तथा असमानता का बोध कराते हुए, विभिन्न प्रकार के माध्यमों से तथ्यों का एकीकरण करते हुए प्रक्रिया को पूर्ण किया जाता है। इससे छात्रों में आगमन तर्क की योग्यता में वृद्धि करना होता है तथा छात्रों में संप्रत्ययों को विकसित करना होता है। सही संप्रत्ययों के विकास हेतु प्रशिक्षण आवश्यक हो जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों