अभिप्रेरणा- सिद्धान्त - motivation theory
अभिप्रेरणा- सिद्धान्त - motivation theory
अभिप्रेरणा सिद्धान्तों से तात्पर्य उन विचारों तथा संगठित तथ्यों से है जिनके आधार पर अभिप्रेरणा के संप्रत्यय, उसकी प्रक्रिया तथा परिणामों को समझने में सहायता मिलती है। अभिप्रेरणा एक विस्तृत एवं जटिल विषय है जिसके अंतर्गत कई सिद्धान्त आते हैं। इनमें से कुछ सिद्धान्त प्रयोगशाला में जानवरों पर हुए प्रयोगों द्वारा विकसित किए गए हैं, तो कुछ विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य की प्रतिक्रिया पर आधारित शोध द्वारा विकसित हुए हैं जिनमें किसी व्यूहरचना या युक्ति का प्रयोग किया गया हो। मनोवैज्ञानिकों ने अभिप्रेरणा से सम्बंधित कई सिद्धान्त दिए हैं। अतः अब हम अभिप्रेरणा के इन विभिन्न सिद्धान्तों के विषय में अपना ज्ञानवर्धन करते हुए जानेंगे कि व्यवहारवाद, मानवतावाद, संज्ञानवाद एवं सामाजिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में इसकी क्या अवधारणायें हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का यहाँ हम विवेचन करने जा रहे हैं:
1. मैकडूगल का मूल प्रवृत्यात्मक सिद्धान्त (Me Dougall's Theory of instinct)
इस सिद्धान्त के अनुसार हमारे व्यवहार के मूल में हमारी मूल प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं। उदाहरण के रूप में एक माता के अपने बच्चों के लिए लालन-पालन में अथक परिश्रम के मूल में मातृत्व सम्बन्धी मूल प्रवृत्ति कार्य करती है। बच्चों द्वारा अपनी जेबों या थैलों में दुनिया भर की चीजें इकट्ठा कर लेने के पीछे संग्रहात्मक प्रवृत्ति कार्य करती है।
2. हल का प्रेरक आपूर्ति सिद्धान्त (Hull's Drive Reduction Theory)
मनोवैज्ञानिक हल के अनुसार अभिप्रेरणा के पीछे प्रेरकों का हाथ रहता है। भूख, प्यास, पीड़ा, मुक्ति तथा काम आदि जैविक प्रेरक व्यक्ति को कुछ-न-कुछ करने के लिए आगे लाते हैं। इनकी आपूर्ति होनी आवश्यक है। व्यक्ति इनकी आपूर्ति के लिए बेचैन रहता है।
भूख और प्यास से व्याकुल व्यक्ति से ऐसे सभी व्यवहार की आशा की जा सकती है जो इन प्रेरकों से जुड़ी हुई दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो सके। पीड़ा से मुक्ति भी इसी प्रकार की बात है। दैहिक कष्ट से बचने की में दृष्टि से कई तरह के व्यवहार किए जाते हैं। उसी प्रकार काम जैसी प्रेरक शक्ति के वशीभूत होकर और उससे उत्पन्न बेचैनी को कम करने के लिए भी मानव व्यवहार एक विशेष दिशा पकड़ लेता है और इस प्रकार प्रेरकों द्वारा उत्पन्न बेचैनी को कम करने के लिए अपेक्षित व्यवहार संपन्न होते रहते हैं।
3. फ्रायड का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Freud's Psychoanalytic Theory) -
फ्रायड के अनुसार हम जो व्यवहार करते हैं उसकी अभिप्रेरणा के स्रोत चेतन स्तर पर न होकर अचेतन ( Unconscious) और अर्धचेतन (Semi-conscious) स्तर पर ही अधिक उपस्थित होते हैं।
हमारी दमित इच्छाएँ तथा अतृप्त अभिलाषाएँ मन की भीतरी गहराइयों में छुपी रहती हैं और हमारा अचेतन और अर्धचेतन मन वहीँ से हमारे व्यवहार को इस तरह संचालित करता है कि हमारी दबी हुई इच्छाओं तथा अतृप्त अभिलाषाओं की पूर्ति होती रहे । यौनेच्छा ( Sex drive) व्यवहार के अभिप्रेरण में बहुत अधिक भूमिका निभाती है और जिस व्यवहार से काम यानी सुख और आनंद की अनुभूति होती है, मानव मन उसी को बार-बार करना चाहता है। इस प्रकार फ्रायड के इस सिद्धान्त को सुखवादी (Hedonistic Principle) भी कहा जाता है। दूसरी ओर, फ्रायड के अनुसार, मानव व्यवहार के मूल में मृत्यु नामक मूल प्रवृत्ति (Death instinct) का भी योगदान रहता है। जब सुख (Pleasure) नहीं मिल पाता है तो उसके विपरीत छोर पर पलायन की भावना जागती है और व्यक्ति मृत्यु के आलिंगन का प्रयास करता है। प्रेम में असफल व्यक्ति का आत्मघात का प्रयास करना इसी प्रकार के व्यवहार में आता है।
4. व्यवहारवादी अभिप्रेरणा सीखने का सिद्धान्त (Behaviourist Learning Theory of Motivation)-
इस सिद्धान्त के अनुसार हम वैसा ही व्यवहार करने को अभिप्रेरित होते हैं
जैसा कि हमने इसे सीखने के दौरान किया था। जिस प्रकार के उद्दीपन के प्रति हम जिस प्रकार की अनुक्रिया सीख लेते हैं उसी की पुनरावृत्ति करने की हमें अभिप्रेरणा प्राप्त होती है। एक बच्चा जो एक विशेष प्रकार के पुनर्बलन के प्रयोग द्वारा किसी विशेष प्रकार के व्यवहार का आदी हो जाता है वह वैसी ही परिस्थितियों में ठीक उसी प्रकार का व्यवहार करने के लिए उन्मुख रहता है।
5. वेनर का गुणारोपण सिद्धान्त (Weiner's Attribution Theory)
संज्ञानवादी मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य का व्यवहार सिर्फ दण्ड या पुरस्कार पर निर्भर न होकर उसके सोचने-विचारने एवं तर्क करने की क्षमता से भी प्रभावित होता है। योजना, उद्देश्य, स्कीमा (Schemas), अपेक्षाएँ एवं गुण व्यवहार की शुरुआत तथा नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होते हैं।
अभिप्रेरणा के संज्ञानात्मक सिद्धान्तों में मानव को जिज्ञासु एवं सक्रिय माना जाता है जो स्वयं की समस्याओं को हल करने के लिए सूचनाओं की तलाश में लगा रहता है। अभिप्रेरणा की संज्ञानवादी व्याख्या की शुरुआत इस अवधारणा से होती है कि मनुष्य अपने और दूसरों के व्यवहार के कारणों को खोजने में लगा रहता है। अतः संज्ञानवादी विचारकों ने आन्तरिक अभिप्रेरणा पर बल दिया है और इसे समझने के लिए बर्नार्ड वेनर का गुणारोपण सिद्धान्त बहुत उचित है। अभिप्रेरणा का गुणारोपण सिद्धान्त यह बताता है कि किस प्रकार व्यक्ति की स्वयं एवं दूसरों से सम्बंधित वर्णन, समर्थन, पक्षपात तथा क्षमा आदि अभिप्रेरणा को प्रभावित करते हैं। वेनर के अनुसार सफलता एवं असफलता के लिए अधिकृत कारणों की व्याख्या तीन आयामों में की जा सकती है:
• स्थिति या बिन्दुपथ (Locus)- अभिप्रेरणा के कारण की स्थिति व्यक्ति के अन्दर है या बाहर अर्थात् अभिप्रेरणा आन्तरिक है या बाह्य
• स्थिरता (Stability)- अभिप्रेरणा का कारण समान बना रहता है या परिवर्तित हो सकता है।
12335• नियंत्रण (Controllability)- क्या व्यक्ति अभिप्रेरणा के कारणों को नियंत्रित कर सकता है। प्रत्येक सफलता अथवा असफलता के कारणों को इन्हीं तीन परिमाणों में वर्गीकृत किया जा सकता है। वेनर का मत है कि अभिप्रेरणा के लिए इन तीन परिमाणों के महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं क्योंकि ये सम्भावना एवं उपयोगिता को प्रभावित करते हैं। उदाहरणार्थ- स्थिरता का आयाम भविष्य की संभावनाओं एवं अपेक्षाओं से निकटता से सम्बंधित है। यदि विद्यार्थी अपनी असफलता के लिए स्थिर कारकों जैसे विषय की कठिनाई को कारण मानते हैं तो भविष्य में भी उस विषय में उनके असफल होने की सम्भावना होगी। परन्तु यदि परिणामों के लिए अस्थिर कारकों जैसे भाग्य या मनोदशा को कारण माना जाए, तो भविष्य में अच्छे परिणामों की आशा रख सकते हैं। अभिप्रेरणा के कारणों की आन्तरिक या बाह्य स्थिति से स्व-सम्मान की अनुभूति गहन रूप से सम्बंधित है। यदि सफलता एवं असफलता को आन्तरिक कारकों से जोड़ा जाए तो सफलता से आत्मगौरव तथा संवर्धित अभिप्रेरणा की प्राप्ति होगी जबकि असफलता से आत्मसम्मान कम होगा। अभिप्रेरकों का नियंत्रण संवेगों जैसे क्रोध, दया, कृतज्ञता या लज्जा से सम्बंधित है। यदि हम अपनी असफलता के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानते हैं तो हमें ग्लानि की अनुभूति होती है। इसके विपरीत यदि हम सफलता के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हैं तो हमें गर्व महसूस होता है । परन्तु यदि हम किसी ऐसे कार्य में विफल होते हैं जिस पर हमारा कोई नियंत्रण ही नहीं है तो हमें क्रोध या शर्म आती है। इसलिए अगर असफलता के लिए सक्षमता की कमी को जिम्मेदार माना जाए, तो इसे हम नियंत्रित नहीं कर सकते हैं और इससे अभिप्रेरणा प्रभावित होती है।
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