अभिप्रेरणात्मक चक्र - motivational cycle
अभिप्रेरणात्मक चक्र - motivational cycle
अभिप्रेरणा प्राणी की वह अवस्था है जो उसे किसी आवश्यकता के कारण भीतर से संचालित करती है तथा किसी लक्ष्य की ओर उसे निर्देशित करती है ताकि आवश्यकता की संतुष्टि की ओर वह अग्रसर हो सके।
अभिप्रेरणा तथा अभिप्रेरणात्मक व्यवहार एक सतत प्रक्रिया है जिसका वर्णन एक चक्र के रूप में निम्न प्रकार से किया जा सकता है:
1. व्यवहार का जन्म किसी-न-किसी इच्छा, चाहत तथा आवश्यकता के फलस्वरूप ही होता है। अतः अभिप्रेरणात्मक चक्र का पहला सोपान व्यक्ति में किसी इच्छा या चाहत का जन्म होना है, अर्थात् वह अपनी आवश्यकता से अवगत हो। उसकी यह इच्छा या चाहत पूरी होनी चाहिए। अनुभव की गयी किसी आवश्यकता की संतुष्टि होनी चाहिए।
यह बात मन में आते ही उसके अन्दर एक अजीब-सी बेचैनी उत्पन्न हो जाती है। उसका आन्तरिक अथवा बाह्य संतुलन बिगड़ जाता है जिसके कारणवश वह अपने आप से या अपने वातावरण से समायोजित नहीं हो पाता है। यही अवस्था व्यक्ति में अंतर्नादों (Drives) तथा अभिप्रेरकों (Motives) को जन्म देती है।
2. अंतर्नोद या अभिप्रेरक अब एक शक्तिपुंज, चालक तथा प्रणेता के रूप में व्यक्ति के व्यवहार का संचालन करने के लिए आगे आते हैं। व्यक्ति का व्यवहार अभिप्रेरित व्यवहार बन जाता है। इस व्यवहार में तनाव का समावेश रहता है क्योंकि व्यक्ति को अपनी इच्छा या आवश्यकता पूर्ति की धुन लगी रहती है परन्तु जैसे-जैसे उसका यह अभिप्रेरित व्यवहार आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उसे अपनी आवश्यकताओं तथा चाहत के पूरी होने की आशा भी बढ़ती जाती है। फलतः उसके तनाव में भी कमी होती रहती है। धीरे-धीरे वह मंजिल पर पहुँच जाता है और अपने अभिप्रेरणात्मक व्यवहार के सम्पादन के फलस्वरूप उसे निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति होती है। उसके अन्दर जो भी उथल-पुथल, बेचैनी तथा तनाव था, अब वह इस लक्ष्य प्राप्ति के साथ ही समाप्त हो
जाता है। यहाँ उसके अभिप्रेरणात्मक व्यवहार को थोड़ा-सा विराम मिलता है।
3. अभिप्रेरणात्मक व्यवहार को जो विराम लक्ष्य प्राप्ति के साथ मिलता है, वह किसी भी तरह से पूर्ण विराम नहीं होता है। अभिप्रेरणात्मक चक्र रूपी यात्रा अपनी आगे की मंजिलों पर फिर चलना प्रारंभ कर देती है, क्योंकि जैसे ही व्यक्ति को लक्ष्य की प्राप्ति होती है तथा इसकी प्राप्ति से जो संतुष्टि तथा सुख मिलता है वह उसके व्यवहार को उसी दिशा में आगे पुनर्बलित (Reinforced) करने का साधन बन जाती है। दूसरे शब्दों में उसे अपने व्यवहार को आगे उसी दिशा में बढ़ाते रहने के लिए प्रलोभन तथा प्रोत्साहन (Incentive) की प्राप्ति होती है। इसी प्रोत्साहन के फलस्वरूप उसे फिर एक नई अभिप्रेरणा प्राप्त होती है तथा फिर एक दुगुने जोश और उमंग से भरे हुए अभिप्रेरक का प्रादुर्भाव होता है और उसके व्यवहार को अभिप्रेरित कर नए लक्ष्य की प्राप्ति में व्यक्ति फिर जुट जाता है। कई बार ऐसा होता है कि अभिप्रेरित व्यवहार से व्यक्ति की किसी एक आवश्यकता या इच्छा की पूर्ति हो जाती है, परन्तु यह पूर्ति उसमें किसी अन्य इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति को जन्म दे देती है। मानव इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता और आवश्यकताएँ भी एक के पूरा होने पर दूसरी के रूप में आगे खड़ी होती चली जाती हैं। इस तरह से जब व्यक्ति की एक आवश्यकता या इच्छा लक्ष्य प्राप्ति के साथ पूरी हो जाती है तो इससे उसके उत्साह में अपेक्षित वृद्धि हो जाती है और वह आगे किसी अन्य प्रलोभन का शिकार हो जाता है। इस तरह का प्रलोभन और प्रोत्साहन उसे आगे किसी अन्य तरह के अभिप्रेरकजन्य अभिप्रेरित व्यवहार को अपनाने के लिए विवश करता रहता है।
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