श्री. अरविन्द घोष - Mr. Arvind Ghosh
श्री. अरविन्द घोष - Mr. Arvind Ghosh
अरविन्द घोष का जन्म 15 अगस्त सन् 1872 ई. को कोलकाता में हुआ। उनके पिता कृष्णधन घोष पाश्चात्य सभ्यता से बहुत अधिक प्रभावित थे इसी प्रभाव के कारण अरविन्द को 7 वर्ष की आयु में ही शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया गया। वे बड़े ही प्रतिभाशाली छात्र थे। उन्होंने अपने अध्ययन काल में लैटिन ग्रीक तथा यूरोप की अन्य प्रमुख भाषाओं जैसे- जर्मन, फ्रेंच आदि भाषाओं का व्यापक ज्ञान प्राप्त किया। 1892 ई. में अरविन्द भारत लौटे और बड़ौदा राज्य के गायकवाड नरेश महाराज सयाजीराव के यहाँ तेरह वर्ष नौकरी करने बाद वे बड़ौदा कॉलेज में अध्यापन कार्य करने लगे तथा उस कॉलेज के बाइस प्रिन्सिपल के पद पर भी रहे।
1901 ई. में इनका विवाह मृणालिनी देवी नामक सुकन्या से हुआ। 1905 ई. में बंगाल विभाजन के विरोध स्वरूप उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया, और कलकत्ता आकर राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय हो गये।
4 मई सन् 1908 में 'अलीपुर बम काण्ड में भाग लेने के आरोप में उन्हें एक वर्ष के लिए अलीपुर जेल मेरखा गया। 13 अप्रैल 1909 को जेल से छूटने के बाद अरविन्द भारत छोड़कर 4 अप्रैल को फ्रेंच उपनिवेश पाण्डुचेरी चले गये। 1926 ई. में अरविन्द आश्रम की स्थापना हुई कुछ समय बाद इस आश्रम का नाम "आश्रम स्कूल" रखा गया और धीरे-धीरे अरविन्द विश्वविद्यालय के नाम से प्रख्यात हो गया, पाण्डुचेरी में ही श्री. अरविन्द चालीस वर्ष तक सर्वागयोग की साधना करते रहे। मानवता को आध्यात्मिकता का ज्ञान देते हुए तथा मानव जाति की सेवा करते हुए 5 दिसम्बर 1950 को इस महायोग ने महासमाधि ले ली।
श्री अरविन्द का सर्वाग दर्शन
श्री अरविन्द ने आध्यात्मिक साधना, योग एवं ब्रह्मचर्य को अधिक महत्व दिया। वे हमेशा विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते थे। श्री अरविन्द का मानना था कि मानवता विश्वात्मा एवं परमात्मा तीनों ही परम सत्य हैं। श्री अरविन्द ने दार्शनिक विचारों को निम्न प्रकार से व्यक्त किया।
1) अति मानव:- अन्य दर्शनों में जिसे परमतत्व ईश्वर एवं गीता में जिसे पुरुषोत्तम कहा गया है उसे ही अरविन्द ने अति मानव कहा है। इस अति मानव द्वारा सम्पूर्ण जगतमें होनेवाली प्रक्रिया का नियन्त्रण होता है। सामान्य मनुष्य मन, प्राण, आत्मा, शरीर आदि के भेदभाव के आवरण को हटाकर अपने में उपस्थित वास्तविकता को पहचान सकता है, और सत्, चित आनन्दस्वरूप अति मानव का साक्षात्कार कर सकता है।
2) पुरुष प्रत्येक मानव में एक आत्मा होती है जो अमर होती है। बार-बार जन्म लेकर मानव अति मानव की चेतना को प्राप्त करने का सतत् प्रयास करता है प्रत्येक मानव कीएक व्यक्तिगत आत्मा होती है जो कि परमात्मा का ही रूप होती है इसलिए पुरुष समाज की एकता को ध्यान में रखने वाला व्यक्ति है।
3) योग: अरविन्द ने अपनी पुस्तक 'लाइफ डिवाइन में लिखा है कि "योग व्यक्ति में छिपी हुई शक्तियोंद्वारा विधि और नियम के अनुसार आत्मपूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास करता है।"
मनुष्य और प्रकृति दोनों की उत्पत्ति समान रूप से हुयी है दोनों सत्य एवं वास्तविक है। मनुष्य एवं प्रकृति दोनों में योग सिद्धात उपलब्ध है। अरविन्द ने योग अष्टांग का अभ्यास आवश्यक बताया है। इसके द्वाराउच्चतर तत्व का आवरण होता है इसके लिए प्रेम, शक्ति, आत्म समर्पण, विवेक एवं कर्म करना आवश्यक है।
श्री अरविन्द का शिक्षा दर्शन
श्री अरविन्द का शिक्षा दर्शन आध्यात्मिक साधना ब्रहमचर्य तथा योग पर आधारित है। जिस शिक्षा पद्धति में तीनों पक्ष होंगे उसी से मनुष्य का पूर्ण विकास होगा।
सच्ची शिक्षा वह है जो बालक के स्वतंत्र क्रियात्मक, बौद्धिक, नैतिक तथा सौंदर्यात्मक शक्तियों को विकसित करके उसके आध्यात्मिक विकास में सहायता प्रदान करे। सर्वाग शिक्षा का आधार :- श्री अरबिन्द की धारणा थी कि जीवन में ज्ञान सदा सुषुप्तावस्था में विद्यमान रहता है। शिक्षा का आधार अन्तःकरण है। अरविन्द के अनुसार अन्तःकरण के चार प्रकार है-
1) चित्त (Chitta)
2) मानस (Manas)
3) बुद्धि (Intellect)
4) ज्ञान (Knowledge)
1) चित्त - जब हम कोई बात याद करते हैं तो वह जाकर चित्त में एकत्र होती है। चित्त वह है जिसकी सहायता से क्रियाशील स्मरण शक्ति समय पर आवश्यक वस्तु की खोज निकालती है। कभी-कभी यह चुनाव सही भी होता है और कभी गलत भी।
2) बुद्धि- यह मस्तिष्क की तीसरी सतह है। इसका कार्य मस्तिष्क में एकत्रित हुयी ज्ञान सामग्री को सुनियोजित और सुव्यवस्थित करना है। इसके कार्य को रचनात्मक, आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक तीन वर्गों में बाँटा गया है। अरबिन्द बुद्धि को शिक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। अरविन्द का मानना है कि शिक्षकों का यह कर्तव्यों कि वे बच्चों की बुद्धि के इन दोनों अंगो कोसमान रूप से प्रशिक्षित व विकसित करें।
विकास के स्तर श्री अरबिन्द के अनुसार मनुष्य की उपर्युक्त शक्तियों से चित्त, मानस, बुद्धि तथा जान में क्रमिक विकास होता है। शिक्षा का स्तर ऐसा हो जो अन्तःकरण के इन चारों स्तरों का अधिक विकास कर सके।
अरविन्द के अनुसार केवल ज्ञान की प्राप्ति ही शिक्षा नहीं होती वरन सच्ची शिक्षा वह है जो मनुष्य की छिपी हुयी शक्तियों को विकसित करके उसका पूर्ण विकास करती है।
"एक आध्यात्मिक आन्तरिक स्वतंत्रता ही एक पूर्ण मानव व्यवस्था उत्पन्न कर सकती है।" सामाजिक विकास का आधार आध्यात्मिकता की प्राप्तिह। आध्यात्मिक जीवन जीने वाले पुरुष तो मिल जाते हैं, पर सम्पूर्ण समाज का आध्यात्मिक रूपान्तरण करने की आवश्यकता है।
अरविन्द के शिक्षा दर्शन के निहितार्थ
अरविन्द के शिक्षा दर्शन के निम्नांकित निहितार्थहो सकते हैं-
1) शिक्षा बालक की रुचियों और मनोवृत्तियों के अनुकूल होना चाहिए।
2) वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति में छिपी हुयी शक्तियों का समुचित विकास करने में सहायक हो।
3) मनुष्य की प्रकृति त्रिगुणात्मक है। (सत्व, रज, तम) सत्व एक प्रकाश है, जिसके द्वाराज्ञान का उद्घाटन किया जाता है। अध्यापक का कार्य है कि वह बालक के सत्व को उदघाटित करें, रज को अनुशासित करे और तम को दूर करे।
(4) शिक्षा का केंद्र बालक है। शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास द्वारा उसे पूर्ण मानव बनाना चाहिए।
(5) शिक्षक एक सहायक, पथप्रदर्शक एवं मित्र होना चाहिए।
6) जानेंद्रियों का प्रशिक्षण आवश्यक है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक शिक्षा बच्चे के स्वभाव तथा मनोविज्ञान के अनुकूल होनी चाहिए।
7) पूर्ण योग के लिए पूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है। पूर्ण शिक्षा प्राप्त मनुष्य जातिदेश आदि से ऊपर उठकर मानव जाति के कल्याण की कामना करने लगता है।
8) शिक्षा का मूल आधार ब्रहमचर्य है। इसके द्वारा तपस तेजस, विघुट एवं ओजस में जितनी ही वृद्धि होगी व्यक्ति उतना ही शरीर, मन, हृदय और आत्मा से शक्तिपूर्ण होगा।
9) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए।
10) शिक्षा में ऐसे विषय होने चाहिए जो बच्चों के व्यावहारिक जीवन को सफल बनाने में सहायक हो।
(11) जीवन का वास्तविक लक्ष्य अहम् भाव से ऊपर उठकर स्वयं को पहचानना है।
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