राष्ट्रीयता - nationality

राष्ट्रीयता - nationality


आधुनिक समय में राष्ट्र का अर्थ ऐसे व्यक्तियों के समूह से लिया जाता है, जो एक राज्य में रहते है। इसी आधार पर राज्य के द्वारा व्यक्ति को कुछ अधिकार प्रदान किए गए है। इसके साथ ही राज्य के प्रति व्यक्ति के कुछ कर्तव्य हो जाते हैं। इस प्रकार एक जाति को एक विशेष भौगोलिक सीमा में राष्ट्र के भीतर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए और बाहरी आक्रमण से अपनी स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए एकत्रित रखने वाली भावना को राष्ट्रवाद कहा जाता है। राष्ट्रीयता वह प्रवृत्ति है, जो जीवन के मूल्यों के तारतम्य में राष्ट्रीय व्यक्तित्व को एक उच्च स्थान प्रदान करती है।


हन्स कोहन ने राष्ट्रवाद को एक मानसिक वृत्ति' के रूप में परिभाषित किया है।' लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने राष्ट्र को धर्म से उच्च स्थान दिया है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार राष्ट्रवाद एक मनोदशा है, जिसमें मनुष्य अपने राष्ट्रीय राज्य के प्रति उच्चतम भक्ति का अनुभव करता है।

राष्ट्रवाद का प्रारंभिक स्वरूप पश्चिमी संदर्भ में मात्र राजनीतिक रहा है लेकिन भारतीय संदर्भ में इसका बहुआयामी विकास हुआ है। परम्परागत रूप से भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर उसे राजनीतिक की अपेक्षा सांस्कृतिक एकात्मकता का स्वरूप प्रदान करती रहती है।


राष्ट्रवाद में एकात्मकता की भावना अनिवार्य है, किन्तु यह भावना राष्ट्रीयता के प्रति होती है, कोई प्रत्यक्ष स्वरूप नहीं होता। इसमें समान उद्देश्य, के लिए कार्य करने की अच्छी इच्छा शक्ति का होना आवश्यक है। आधुनिक राष्ट्र राज्यों के ऐतिहासिक सर्वेक्षण से सर्वविदित है कि भाषायी, भौगोलिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक एकता राष्ट्रवाद को प्रेरित करती है। भारत के संदर्भ में अंग्रेजों की यह मान्यता रही है कि उनके आने से पूर्व भारत में एकता की भावना या राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था। लेकिन यह मान्यता सही नहीं है क्योंकि भारतीयों में सांस्कृतिक एकता सदियों से विरासत में मिली है।

महात्मा गांधी ने राष्ट्रवाद को नवीन परिप्रेक्ष्य में भारत की आजादी के लिए अपना कार्यक्षेत्र बनाया। वे संकीर्ण राष्ट्रवाद के खिलाफ थे, किन्तु उदार राष्ट्रवाद की आवश्यकताएं वे स्वीकारते थे। गांधी के राष्ट्रवाद के चिन्तन में अपने राष्ट्र को किसी अन्य राष्ट्र से हेय दृष्टि से देखना अनुचित था। उनका मत था कि राष्ट्र व्यक्ति से बढ़कर है। व्यक्ति की पहचान राष्ट्र से होती है न कि राष्ट्र की पहचान व्यक्ति से होती है। उनका यह भी मानना था कि कोई अन्य राष्ट्र भी उनके देश के प्रति हेय दृष्टि न रखे। वे राष्ट्र के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तैयार थे। उनका राष्ट्रवाद, अंतरराष्ट्रीय सद्भाव से प्रेरित था ।


राष्ट्रवाद व्यक्तियों के समूह की उस आस्था व अवस्था, का नाम है जिसके तहत वे खुद को साझा इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं। इन्हीं बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें आत्म-निर्णय के आधार अपने सम्प्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात 'राष्ट्र' की स्थापना करने का आधार है। राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है

जब तक उसे एक राष्ट्र-राज्य का रूप नहीं दे दिया जाता। हालांकि दुनियां में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो इन कसौटियों पर पूरी तरह से फिट बैठता हो, इसके बावजूद अगर विश्व की एटलस उठा कर देखी जाए तो धरती की एक-एक इंच ज़मीन राष्ट्रों की सीमाओं के बीच बँटी हुई मिलेगी। राष्ट्रवाद का उदय अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के यूरोप में हुआ था, लेकिन अपने सिर्फ़ दो-ढाई सौ साल पुराने ज्ञात इतिहास के बाद भी यह विचार बेहद शक्तिशाली और टिकाऊ साबित हुआ है। राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों को अपने अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन, चिरंतन और स्थिर लगता है। इस विचार की ताकत का अंदाज़ा इस हकीकत से भी लगाया जा सकता है कि इसके आधार पर बने राष्ट्रीय समुदाय, वर्गीय, जातिगत और धार्मिक विभाजनों को भी लाँघ जाते हैं। राष्ट्रवाद के आधार पर बने कार्यक्रम और राजनीतिक परियोजना के हिसाब से जब किसी राष्ट्र-राज्य की स्थापना हो जाती है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर राष्ट्र के प्रति निष्ठा को ही अहमियत देंगे। वे राष्ट्र के कानून का पालन करेंगे और उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे देंगे। यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि आपस में कई समानताएँ होने के बावजूद राष्ट्रवाद और देशभक्ति में अंतर है। राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है, जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं है। 


सत्तर के दशक में होरेस बी. डेविस ने मार्क्सवादी तर्कों का सार-संकलन करते हुए राष्ट्रवाद के एक रूप को ज्ञानोदय से जोड़ कर बुद्धिसंगत करार दिया और दूसरे रूप को संस्कृति और परम्परा से जोड़ कर भावनात्मक बताया। लेकिन, डेविस ने भी राष्ट्रवाद को एक औज़ार से ज़्यादा अहमियत नहीं दी और कहा कि हथौड़े से हत्या भी की जा सकती है और निर्माण भी। राष्ट्रवाद के ज़रिये जब उत्पडित समुदाय अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष करते हैं तो वह एक सकारात्मक नैतिक शक्ति बन जाता है और जब राष्ट्र के नाम पर आक्रमण की कार्रवाई की जाती है तो उसका नैतिक बचाव नहीं किया जा सकता। राष्ट्रवाद की सभी मार्क्सवादी व्याख्याओं में सर्वाधिक चमकदार थियरी बेनेडिक्ट ऐंडरसन द्वारा प्रतिपादित 'कल्पित समुदाय' (इमैजिन्ड कम्युनिटीज़) की मानी जाती है। ऐंडरसन का मुख्य सरोकार यह है कि एक-दूसरे से कभी न मिलने वाले और एक-दूसरे से पूरी तरह अपरिचित लोग राष्ट्रीय एकता में किस तरह बँधे रहते हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को ज़बरदस्त चुनौती दी है। बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद कहा जा सकता है कि कम से कम दुनिया का प्रबुद्ध वर्ग एक सी भाषा बोलता है, एक सी यात्राएँ करता है,

एक सा खाना खाता है। उसके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई ख़ास मायने नहीं रह गये हैं। इसके अलावा आर्थिक भूमण्डलीकरण, बड़े पैमाने पर होने वाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन जैसी प्रौद्योगिकीय प्रगति ने दुनिया में फ़ासलों को बहुत कम कर दिया है। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने देश और सांस्कृतिक माहौल से दूर काम और जीवन की सार्थकता की तलाश में जाना चाहते हैं। यूरोप की धरती ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया था और वहीं अब यूरोपीय संघ का उदय राष्ट्रवाद का महत्त्व कम कर रहा है। इस नयी परिस्थिति में कुछ विद्वान कहने लगे हैं कि जिन ताकतों ने कभी राष्ट्रवाद को मज़बूत किया था, वे ही उसके पतन का कारण बनने वाली हैं। राष्ट्रीय संरचनाओं के बजाय राष्ट्रों से परे जाने वाले आर्थिक और राजनीतिक गठजोड़ आने वाली सदियों पर हावी रहेंगे।


साम्राज्यवाद के युग में उपनिवेशों में धार्मिक एवं भाषाई विविधता के बावजूद सर्वोच्च सत्ता की स्थापना बलपूर्वक सम्भव थी। स्वाधीनता के बाद राज्य की सत्ता को बलपूर्वक थोपना सम्भव नहीं रहा है।

इसी कारण आधुनिक राज्य में राष्ट्रवाद की बुनियाद किसी धर्म विशेष या जाति अथवा भाषा पर नहीं रखी जा सकी। कुल मिलाकर राष्ट्र राज्य के नागरिक यह बात स्वीकार करते हैं कि उनके सामूहिक हित किसी दूसरे राष्ट्र राज्य के नागरिकों के सामूहिक हितों की तुलना में अधिक साम्यता रखते हैं और इनके संरक्षण के लिए परस्पर सहकार्य जरूरी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ घोषणा पत्र की धारा 14 में यह स्वीकार करता है कि राज्य आपसी सम्बन्धों की सम्प्रभुता के सिद्धान्त और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार संचालित करेंगे। राष्ट्र राज्य की अवधारणा में यह अन्तर्निहित है कि राज्य की पहचान के साथ राष्ट्रीयता का तत्व अभिन्न रूप से जुड़ा रहेगा। आधुनिक राज्य एक सम्प्रभु और स्वाधीन इकाई है, यह समझा जाता था और सम्प्रभुता शासक में ही मूर्तिमान, प्रत्यक्ष देखी जाती रही है। सम्प्रभुता के आधुनिक सिद्धान्त के जनक ज्यां बोदां का मानना है कि सम्प्रभुता का अर्थ प्रजा तथा नागरिकों के ऊपर ऐसी सर्वोच्च नियन्त्रण शक्ति से है, जिसे कोई भी सीमित नहीं करता। इसी तरह विधिवेत्ता ओपनहाइम का कहना है कि प्रभुसत्ता किसी भी अन्य सत्ता के नियन्त्रण से मुक्त स्वाधीन शक्ति है। यह बात सर्वविदित है कि ऐसी सत्ता का स्वामी राज्य ही हो सकता है, कोई एक व्यक्ति नहीं। हॉब्स ने ऐसे ही राज्य को लेवियान की संज्ञा दी है।


उद्देश्य -


-राष्ट्र गौरव की भावना को जाग्रत करना ।


-राष्ट्र के इतिहास और संस्कृति का अन्वेषण करना।


- जनता में राष्ट्रवाद की भावना चित्त में बैठाना।


- देश के नागरिकों में आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास जैसी भावनाओं को प्रोत्साहित करना। 


अनेकता में एकता' भारतीय राष्ट्रवाद की विशेषता है, अलग-अलग भाषा-भाषी, प्रान्तीय विभिन्नता होने के बावजूद उनके तीर्थ, सांस्कृतिक परिवेश, रीति-रिवाज उनमें एकत्व की भावना पैदा करते हैं। गांधी के राष्ट्रवाद का उद्देश्य विश्व मैत्री है, उन्होंने इसको व्यक्त करते हुए कहा कि 'मेरा लक्ष्य विश्व मैत्री है।, हम विश्वबन्धुत्व के लिए जीना और मरना चाहते हैं, मानवता की सेवा के लिए भारत को जीना सीखना होगा।" गांधी के अनुसार "मैं अपने देश की स्वतंत्रता इसलिए चाहता हूँ कि अन्य राष्ट्र मेरे राष्ट्र से कुछ सीखें तथा मेरी राष्ट्रीयता अन्तर-राष्ट्रीयता है। यदि आवश्यकता पड़े तो सारे देश मर जाएं ताकि मानवता जीवित रह सके। एक व्यक्ति के राष्ट्रवादी हुए बिना अंतर-राष्ट्रवादी होना असंभव है।' राष्ट्रवाद कोई बुराई नहीं है, बुराई तो संकीर्णता, स्वार्थ और एकाकीपन की भावनाएं हैं, जिनसे आज राष्ट्र ग्रसित है।