बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप - Nature of Education in Hindi

बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप - nature of education in childhood


इस अवस्था में बच्चा विद्यालय में जाने लगता है और उसे नवीन अनुभव प्राप्त होते हैं। बाल्यावस्था शैक्षिक दृष्टि से बच्चे के निर्माण की अवस्था है। स्लेयर, जोन्स व सिम्पसन के अनुसार, बाल्यावस्था वह समय है, जब व्यक्ति के आधारभूत दृष्टिकोण, मूल्यों और आदर्शों का बहुत सीमा तक निर्माण होता है। अतः उसकी शिक्षा का स्वरूप निश्चित करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए.


1) भाषा के ज्ञान पर बल


बाल्यावस्था भाषा सीखने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काल होता है। अतः इस अवस्था में भाषा के ज्ञान पर अधिकाधिक बल देन चाहिए।


2 ) उपयुक्त विषयों का चुनाव


बच्चे के लिए लाभप्रद और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति कसे योग्य उपयुक्त विषयों का चुनाव दिया जाना चाहिए|

भाषा, अंकगणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, ड्राइंग, चित्रकला, पत्रलेखन, निबंध रचना आदि विषयों का समावेश होना चाहिये |


3) रोचक विषय-सामग्री


बच्चों की रुचियों को ध्यान में रखकर पाठ्य विषय और शिक्षण विधि में उसकी रुचियों के अनुसार परिवर्तन किया जाना आवश्यक है।


4) पाठ्य विषय व शिक्षण विधि में परिवर्तन


इस अवस्था में बच्चे की रुचियों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अतः पाठय-विषय और शिक्षण विधि में उसकी रुचियों के अनुसार परिवर्तन किया जाना आवश्यक है।


5) जिज्ञासा की संतुष्टि


बच्चे को इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे उसकी जिज्ञासा की संतुष्टि हो।


6) सामूहिक प्रवृत्ति का विकास


बच्चे में समूह में रहने की प्रबल प्रवृत्ति होती है। वह अन्य बालकों से मेलजोल और उनके साथ कार्य करना या खेलना चाहता है।


7) रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था


विद्यालय में विभिन्न प्रकार के रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था की जानी चाहिए क्योंकि बच्चे की रचनात्मक कार्यों में विशेष रुचि होती है।


8) नैतिक एवं संवेगात्मक विकास


पियाजे द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि आठ वर्ष की आयु के बालकों में नैतिक मूल्यों के विकास को सही दिशा दी जानी चाहिए।


9) संवेग के प्रदर्शन का अवसर


इस अवस्था में बालकों का संवेगात्मक विकास विशिष्ट रूप से होता है। कोल एवं बस ने बाल्यावस्था को संवेगात्मक विकास का अनोखा काल माना है। यह विकास का अनोखा काल माना जाता है। यह विकास तभी संभव है, जब बच्चे के संवेगों का दमन न किया जाए।


10 ) संचय प्रवृत्ति को प्रोत्साहन


बाल्यकाल में बच्चे में संचय की प्रवृत्ति होती है। उसे जो भी वस्तु अच्छी लगती है। उसी का वह संचय करता है। इसलिए शिक्षक का कर्तव्य है कि उसे शिक्षाप्रद वस्तुओं का संचय करने के लिए प्रोत्साहित करे।


11) विभिन्न सामाजिक गुणों का विकास करना


बालकों में विभिन्न सामाजिक गुणों का विकास होने के लिये विद्यालय में ऐसी क्रियाओं का अनिवार्य रूप से संगठन किया जाना चाहिए, जिनमें भाग लेकर बच्चे में अनुशासन, आत्मविश्वास, सहानुभुति प्रतिस्पर्धा, सहयोग आदि सामाजिक गुणों का अधिकतम विकास हो।