शिक्षा प्रक्रिया का स्वरूप - Nature of Educational Process

शिक्षा प्रक्रिया का स्वरूप - Nature of Educational Process


1) दिमुखी और त्रिमुखी प्रक्रिया


एडम्स के अनुसार शिक्षा एक दिमुखी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्तित्व दूसरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है जिसके फलस्वरूप उसके व्यवहार में परिवर्तन हो जाए। वह प्रक्रिया केवल चेतन ही नहीं अपितु उद्देश्य के साथ या विचारपूर्ण भी है। इसमें शिक्षक का एक स्पष्ट प्रयोजन होता है और वह उसी के अनुसार बालक के व्यवहार में विभिन्न साधनों के द्वारा परिवर्तन करता है।


एडम्स के उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिक्षा दो ध्रुवीय प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का एक ध्रुव शिक्षक है और दूसरा विद्यार्थी है। एडम्स के अनुसार शिक्षा प्रक्रिया में शिक्षक और बालक दोनों के बीच परस्पर आदान प्रदान होता है। रास भी इसी मत को मानने वाले हैं। वे कहते हैं कि शिक्षा चुम्बक की तरह दो ध्रुवीय होती है। शिक्षक को क्या पढ़ाना है और छात्र को क्या पढ़ना है यह संकेत पाठ्यक्रम से ही मिलता है| जॉन डीबी ने शिक्षा प्रक्रिया को तीन ध्रुवीय माना है जिसमें शिक्षक, छात्र और पाठ्यक्रम शामिल है। 


( 2 ) औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा


औपचारिक शिक्षा का जन्म अनौपचारिक शिक्षा की अपूर्णता को पूर्ण करने के लिए हुआ। अतः औपचारिक शिक्षा उस शिक्षा को कहते हैं, जिसमें शिक्षार्थी किसी कार्यक्रम के अनुसार नियंत्रित वातावरण में रहते हुए किसी पूर्वनिश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिनिश्चित पाठ्यक्रम (ज्ञान) को निश्चित शिक्षण पद्धति दद्वारा निश्चित स्थान पर निश्चित समय में समाप्त करके परीक्षा देकर उपाधि ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार औपचारिक शिक्षा कृत्रिम होती है तथा इसका मुख्य साधन तो स्कूल हैपरन्तु पुस्तकालय अजायबघर चित्रभवन तथा पुस्तकें आदि भी औपचारिक शिक्षा के ही साधन होते हैं।


अनौपचारिक शिक्षा वह है, जो आकस्मिक तथा स्वाभाविक होती है। ऐसी शिक्षा में ऑपचारिक शिक्षा की भांति निश्चित योजना तथा उद्देश्य के अनुसार पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति, स्थान, समय तथा शिक्षक आदि पूर्व निश्चित न होने अपितु उन्हें शिक्षा के अतिरिक्त किसी अन्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बनाया जाता है। यही नहीं अनौपचारिक शिक्षा में औपचारिक शिक्षा की भांति पहले से की हुई तैयारी की भी आवश्यकता नहीं होती।

कभी कभी तो सीखने और सिखाने वाले को यह भी पता नहीं चलता कि वह क्या सीख रहा है तथा उसे क्या सिखाया जा रहा है। वस्तुस्थिति यह है कि अनौपचारिक शिक्षा का सम्बन्ध बालक के विकास से होता है। ऐसी शिक्षा को बालक परिवार, समाज, धर्म तथा खेल के मैदानों आदि साधनों के द्वारा स्वतंत्र वातावरण में रहते हुए स्वाभाविक रूप से ग्रहण करके विकसित झा रहता है।


3) प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष शिक्षा


प्रत्यक्ष शिक्षा उस शिक्षा को कहते हैं, जिसमें शिक्षक और बालक एक दूसरे के आमने सामने हो तथा शिक्षक जानबूझकर पूर्व योजना के अनुसार किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक निश्चित शिक्षण पद्धति का अनुसरण करते ही बालक को निश्चित प्रकार का ज्ञान दे। ऐसी शिक्षा में शिक्षा के औपचारिक साधनों का भी प्रयोग किया जाता है। संक्षेप मेंजब बालक के समक्ष शिक्षक इस प्रकार का नियंत्रित बातावरण प्रस्तुत करे जिसमें रहते हुए उसके व्यक्तित्व का बालक के ऊपर सीधा प्रभाव पड़े तो ऐसी शिक्षा को प्रत्यक्ष शिक्षा कहते है।


अप्रत्यक्ष शिक्षा उस शिक्षा को कहते है जिसमें शिक्षा किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति हेतु किसी निश्चित शिक्षण पद्धति के द्वारा नहीं दी जाती अपितु स्वतंत्र वातावरण में अप्रत्यक्ष साधनों द्वारा ग्रहण की जाती है उनकी रचना किसी अन्य प्रयोजन से ही होती है, भले ही लोग उनसे कुछ शिक्षा ग्रहण कर लें। 


4) सामान्य तथा विशिष्ट शिक्षा


सामान्य शिक्षा को उदार शिक्षा (Liberia Education) भी कहते है। ऐसी शिक्षा का लक्ष्य सामान्य होता तथा यह हर बच्चे के लिए निश्चित स्तर तक सामान्य रूप से अनिवार्य होती है। सामान्य शिक्षा केवल बौद्धिक क्षमता को तीव्र करने के लिए दी जाती है, जिससे बालक सामान्य जीवन के लिए तैयार हो सके। | बिशिष्ट शिक्षा का लक्ष्य विशिष्ट होता है। ऐसी शिक्षा विशिष्ट रुचि, योग्यता एवं क्षमता वाले बच्चे के लिए ही होती है।


विशिष्ट शिक्षा बच्चे को खास प्रकार के जीवन अथवा व्यवसाय के लिए तैयार करती है। प्रत्येक दशा में कुछ निश्चित अवस्था तथा निश्चित स्तर तक के बालकों को सामान्य शिक्षा देने के बाद उनकी रुचियों योग्यताओं, क्षमताओं तथा आवश्यकताओं के अनुसार प्रदान की जाय। ऐसी शिक्षा को प्राप्त करने के पश्चात शिक्षार्थी से यह आशा की जाती है कि वह एक विशिष्ट क्षेत्र में कुशलतापूर्वक कार्य करके अपनी तथा अपने देश की आवश्यकताओं को पूरा कर सकेगा। डॉक्टरी तथा इन्जीनियरी की शिक्षा विशिष्ट शिक्षा के उदाहरण हैं।


5) व्यक्तिकेन्द्रित तथा सामूहिक शिक्षा व्यक्तिकेन्द्रित शिक्षा उस शिक्षा को कहते हैं, जो किसी बच्चे को दूसरे बच्चेसे अलग रखकर उसकी रुचियों योग्यताओं क्षमताओं तथा आवश्यकताओं के अनुसार प्रदान की जाये व्यक्तिकेन्द्रित शिक्षा प्राप्त करते समय बच्चा स्वतंत्रता का अनुभव करता है। इससे उसे ज्ञान प्राप्त करने में सुविधा होती है। चूंकि व्यक्तिकेन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत हर बालक की खास व्यक्तिकन्द्रित आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है, इसलिए मनोवैज्ञानिक दृष्टिसे ऐसी शिक्षा अत्यंत लाभप्रद होती है।


सामूहिक शिक्षा वह है, जिसके द्वारा बहुत से शिक्षार्थियों को एक ही स्थान पर कुछ व्यक्ति केन्द्रित विषयों का ज्ञान दिया जाये। ऐसी शिक्षा का सबसे बड़ा दोष यह है किइस में प्रत्येक शिक्षार्थी की व्यक्तिगत आवश्यकताओं का ध्यान नहीं रखा जा सकता। सामूहिक शिक्षा प्रदान करते समय शिक्षक को प्रखर तथा मद बुद्धिवाले बच्चे की उपेक्षा करके सामान्य बुद्धि के बच्चों के साथ चलना पड़ता है। चूंकि सामूहिक शिक्षा में व्यय कम होता है इसलिए आधुनिक स्कूलों तथा कालेजों में शिक्षा के इसी रूप को अपनाया जाता है।