वित्तीय विवरणों की प्रकृति - Nature of Financial Statements

वित्तीय विवरणों की प्रकृति - Nature of Financial Statements


(1) वित्तीय विवरण ऐतिहासिक प्रलेख होते हैं। ये घटित घटनाओं के सारांश मात्र ही होते हैं।


(2) वित्तीय विवरण व्यापार की चालू अवधारणा' की मान्यता के आधार पर तैयार किये जाते हैं। इसलिये चिट्ठे में व्यवसाय की सम्पत्तियों को उनके लागत मूल्य पर दिखलाया जाता है, न कि बाजार मूल्य पर ।


(3) वित्तीय विवरण लेखा-वर्ष की समाप्ति पर तैयार किये जाते हैं। 


(4) वित्तीय विवरणों में प्रदर्शित समक तथ्यों, लेखांकन परम्पराओं तथा लेखापाल के व्यक्तिगत निर्णयों के सामूहिक परिणाम होते हैं।


लाभ - लाभ खाता और स्थिति विवरण तथ्य और मत दोनों ही दिखलाते हैं। 


AICPA के अनुसार “.... They (financial statements) reflect a combination of recorded facts, accounting conventions and personal judgements and the judgements and conventions applied affect them materially" अतः स्पष्ट है कि वित्तीय विवरणों में प्रदर्शित समक तथ्यों और व्यक्तिगत निर्णय दोनो पर आधारित होते हैं।


(1) लिपिबद्ध तथ्य ( Recorded Facts) वित्तीय विवरणों के सम्बन्ध में "लिपिबद्ध तथ्यों का आषय यह है कि इनमें दिखाये गये समक लेखा अभिलेखों (accounting records) में अभिलिखित वास्तविक घटनायें ही होते हैं। व्यावसायिक लेन-देन सबसे पहले हिसाब किताब की पुस्तकों में लिखे जाते हैं और फिर इन पुस्तकों में विभिन्न खातों के शेषों से ही वित्तीय विवरण तैयार किये जाते हैं।

इस प्रकार ये वित्तीय विवरण तथ्य ही प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के स्वरूप स्थिति विवरण में दिखाई गई हस्तस्थ रोकड़ (Cash in hand), बैंक में रोकड़ देनदार, देय बिल प्राप्य बिल, स्कन्ध, स्थायी सम्पत्तियों की लागत आदि सभी अभिलिखित तथ्य ही होते हैं। चूँकि ये मदें ऐतिहासिक अभिलेख के आधार पर दिखायी जाती हैं, अतः ये घटना के समय के मूल्यों पर ही दिखाये जाते हैं।


इसीलिये वित्तीय विवरणों में वर्तमान मूल्य (Current Value) या आर्थिक मूल्य (Economic value) का समावेश नहीं हो पाता है। वित्तीय विवरणों के तथ्यों पर आधारित होने का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह होता है कि ऐसे बहुत से महत्वपूर्ण कारक वित्तीय विवरणों में नहीं दिखलाये जाते हैं

जोकि लेखा अभिलेखों में नहीं लिखे गये हैं, जैसे अपूर्त आदेश (Unfilled Orders), क्रय-विक्रय के अनुबन्ध या वायदे, गारंटियाँ आदि। चिट्ठे में इन्हें टिप्पणियों के रूप में दिखलाया जा सकता है।


( 2 ) लेखांकन प्रथायें (Accounting Conventions) वित्तीय विवरणों की तैयारी में लेखाकन की प्रथायें पर्याप्त प्रभाव रखती हैं। व्यवसाय के व्ययों का पूँजीगत और आयगत में विभाजन, स्थायी सम्पत्तियों की लागत को विभिन्न लेखावधियों में फैलाना, ह्रास पद्धति का चुनाव, स्कन्ध का मूल्यांकन आदि लेखाकन प्रथाओं से प्रभावित होते हैं। लेखांकन की सारता की प्रथा (Materiality Convention) के कारण पेन्सिल, पैन आदि कम कीमत के माल को एक्सपेन्डीचर के वर्श का ही व्यय मान लिया बजाता है जबकि मशीन आदि कीमती माल को सम्पत्ति माना जाता है।

इन्हीं प्रथाओं के कारण लेखा वर्ष के अन्त में डाक टिकट के शेष को सम्पत्तियों में न दिखाकर उस अवधि का ही व्यय मान लिया जाता है। इसी तरह स्टेशनरी को लागत या बाजार में से जो भी कम हो, के आधार पर न मूल्यांकित करके लागत पर ही मूल्यांकित किया जाता है। इसी तरह ऐसे बहुत से क्षेत्र है जहाँ वित्तीय विवरणों की तैयारी में लेखांकन की सारता, रूढ़िवादिता तथा समरूपता की प्रथाओं का पालन किया जाता है।


(3) स्वयं सिद्ध (Postulates ) वित्तीय विवरणों को तैयार करते समय लेखापाल कुछ बातों को स्वीकृत मानकर चलता है, चाहे उनकी सत्यता संदेहजनक ही क्यों न हो। उदाहरण के लिये लेखापाल रुपये के मूल्य को स्थिर मानकर चलता है तथा विभिन्न तिथियों पर किये गये लेन-देनों में कोई अन्तर नहीं करता।

इसी प्रकार व्यवसाय की चालू स्थिति की मान्यता को लेकर यह स्थायी सम्पत्तियों को उनके लागत मूल्य पर दिखलाता है। इसी तरह आय वसूली के सम्बन्ध में यह बिक्री होते ही लाभ अर्जित मान लेता है, चाहे इस बिक्री के धन को वसूल करने में काफी लम्बा समय ही क्यों न लग जाये।


( 4 ) व्यक्तिगत निर्णय ( Personal Judgements) वित्तीय विवरणों पर लेखापाल के व्यक्तिगत मतों का भी प्रभाव पड़ता है। लेखाकन में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहाँ पर लेखांकन की कई वैकल्पिक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। इन पद्धतियों के परिणाम भी एक दूसरे से अलग होते हैं। किसी संस्था में कई वैकल्पिक रीतियों में से कौन-सी रीति प्रयोग की जाय, यह उस संस्था के लेखापाल के व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करेगा। उदाहरण के लिये स्कन्ध का मूल्यांकन प्राय: लागत या बाजार मूल्य में जो भी कम हो, के आधार पर किया जाता है।

स्कन्ध की लागत बिक्री, फिफो लीफो प्रमापित लागत, औसत लागत आदि किसी भी आधार पर ज्ञात की जा सकती है। किसी संस्था में इनमें से कौन सा आधार अपनाया जाये, यह संस्था के लेखापाल के मत पर निर्भर करता है। इसी तरह अशोध्य ऋण संचिति की राशि का निर्धारण, स्थायी सम्पत्तियों पर ह्रास गणना की पद्धति तथा ह्रास दर का चयन, व्ययों का आयगत और पूँजीगत में बँटवारा, कृत्रिम सम्पत्तियों के अपलेखन (write off) की अवधि का निर्धारण आदि मामलों में लेखापाल का मत प्रभाव डालता है और इस प्रकार वित्तीय विवरणों की मदें वास्तविकता से परे भी जा सकती हैं।


उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि वित्तीय विवरणों की मदें अभिलिखित तथ्यों, लेखांकन प्रथाओं और लेखापाल के व्यक्तिगत निर्णयों का सामूहिक परिणाम होती हैं तथा इसका वित्तीय विवरणों पर सामूहिक प्रभाव यह होता है कि ये विवरण जब तक विशिष्ट रूप से ही न तैयार किये जायें, चालू आर्थिक मूल्य नहीं दर्शाते हैं।