आधुनिकता की प्रकृति - nature of modernity

आधुनिकता की प्रकृति - nature of modernity


समाजशास्त्री योगेंद्र सिंह के अनुसार आधुनिकरण की प्रक्रिया का चरित्र व प्रकृति निम्नलिखित है-


• आधुनिकरण तर्कसंगत बुद्धिपरक संस्कृति संरचना पर सन्निकट होता है।


• वह द्योतक होता है तर्कसंगत आवृति का एवं वृहद् दृष्टिकोण का। 


• आधुनिक चरित्र यदि संवेग पर प्रत्रीक्रिया देता है तब वह पराभुनूतिपरक संवेग होतें हैं न की संकुचनशील सोच युक्त संवेग।


• आधुनिकरण का मूल वैज्ञानिक प्रकृति व वैज्ञानिक दृष्टिकोण में है।


• इसका धनात्मक सम्बन्ध है समाज में वैज्ञानिक प्रकृति, तकनीकी कौशल व तकनीकी संसाधनों के प्रसारण से जितना ज्यादा तकनीकी कौशल, संसाधन व वैज्ञानिक प्रगति समाज में होगी उतना ज्यादा आधुनिकरण उक्त समाज में होगा।


• जिस प्रकार संस्कृति उत्क्रांत होती है उस प्रकार आधुनिकरण का भी उत्क्रांत होता है व आधुनिकरण देश काल परिस्थिति के विषयांतर परिवर्तित होता व विकसित होता है। 


आधुनिकीकरण के अर्थ भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न हो जाते हैं, लेकिन वे सब मिलकर विकास और परिवर्तन की एक दिशा स्थिति को मूर्त करते हैं। अर्थशास्त्रियों के लिए आधुनिकीकरण का अर्थ है: मनुष्य द्वारा तकनीकी ज्ञान का प्रयोग। हाथ के स्थान पर मशीन द्वारा वह प्राकृतिक साधनों का उपयोग कर उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति करता है।' समाजशास्त्रियों या सामाजिक नृतत्वशास्त्रियों के लिए आधुनिकीकरण अवकलन की प्रक्रिया - प्रोसेस आव डिफ्रेन्शियेशन है जो आधुनिक समाज का लक्षण कहा जाता है।

उन्होंने उन पद्धतियों की खोज की जो नयी सामाजिक संरचना के उदय और नयी ज़िम्मेदारियों को वहन कर सकने में सक्रिय होती है। नये पेशों और धन्धों के उदय नयी और संश्लिष्ट शिक्षा द्वारा सामाजिक संरचना में अवकलन या नये समाज के उदय की प्रक्रिया को ही वे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। राजनीतिशास्त्री आधुनिकीकरण की चर्चा करते हुए उन प्रणालियों का ज़िक्र करते हैं जिनके द्वारा शासन, परिवर्तन और नवीनीकरण की अपनी सामर्थ्य में वृद्धि करता है ताकि उसकी नीतियाँ, सामाजिक कल्याण के हित में हो। इस प्रसंग में प्रजातंत्र को आधुनिक शासन प्रणाली कहा जाता है। अक्सर आधुनिकीकरण को स्तरीय शिक्षा, प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता जैसे विचारादर्श, राष्ट्रवाद, कुशल नेतृत्व और नियामक शासन से जोड़कर देखा जाता है और माना जाता है कि वृत्यात्मक तब्दीली और मूल्य-पद्धति में परिवर्तन आधुनिक समाज, अर्थव्यवस्था और राज्य के निर्माण की पूर्व शर्त है। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप औद्योगीकरण के साथ ही इस अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होता है, परिणामस्वरूप समाज व्यवस्था बदलती है

और उसके समानान्तर मूल्य व्यवस्था और जीवन-दर्शन में संक्रांति आ जाती है। तात्कालिक और ऊपरी दृष्टि से यह केवल एक आर्थिक प्रक्रिया नज़र आती है, लेकिन अपने गहन एवं संश्लिष्ट अर्थों में यह जीवन की अंतर्बाह्य संरचना के परिवर्तन की प्रक्रिया है। गाँवों का शहरीकरण या गाँव का शहर में स्थानांतरण सिर्फ ऊपरी रहन-सहन का नहीं, वरन् सारे आचार-विचार, दृष्टि और अनुभूति का परिवर्तन हो जाता है। इस दृष्टि से शहरीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण अन्योन्याश्रित माने गए हैं।


योगेंद्र सिंह का मत है की समाज में जितनी तकनीकी उन्नति हो जाये व चाहे जितना भी स्वचालन हो जाये पर यदि किसी भी समाज का दृष्टिकोण वैज्ञानिक व धर्म निरपेक्ष ना हुआ और उसमें अपेक्षित संवेगों की कमी रही तब वह समाज आधुनिक नहीं माना जायेगा। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया समाज की संस्कृति को भी बदलाव की लपेट में लेती है, किसी भी पारंपरिक समाज के लिए यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण होती है, संस्कृति में बदलाव उपसंस्कृति, पलट-संस्कृति, संस्कृति विलंबन जैसी स्थिति उत्पन्न करता है।